Sunday, 28 December 2014

जाते हुए लम्हे


 
 जाते हुए लम्हे

वक़्त के गहरे सागर से
चंद लम्हे मैंने भी चुराये थे
और गत वर्ष
 मेह्मान बना
दिल  में सजाये  थे
समय की इस बंद  पुड़िया में
कैसे लम्हे कैद  थे कौन जाने ?
जब किस्मत ने उम्मीद से 
बंद पुड़िया को खोला 
तो जाना कि  ,,,,
हर लम्हा कितना अलग
कोई गुनगुनाता
कोई मुस्कुराता
कोई उदास
कोई कठोर
कोई चंचल
कोई संपन्न
कोई कितना अपना
तो कोई परया
अब जो बीते लम्हे
वक़्त की गहराई में
समाने को हैं  तो
हर मेहमान को
ख़ुशी  ख़ुशी विदा करना  है
शुक्राना करना है हर उस बीते पल का
जो अपनी मौजूदगी से
मेरे  वजूद के विस्तृत आकाश पर
अनुभव और सीख के
 कुछ और सितारे  जोड़ गया

सिमी  मदन  मैनी
29.11.2014



Tuesday, 11 November 2014

वक़्त

 
        वक़्त

किस धुन में भाग रहे हो ?
इतनी तेज़ रफ़्तार से

तुम्हारा हर कदम
एहसास दिलाता है कि
तुम कितने बलवान हो

सभी वायदों , कसमों
रिश्तों और सोच से बड़ा है
तुम्हारा अस्तित्व

पल भर  में
आसमान  की
बुलंदियों पर पहुँचा देते हो

और पल में
स्वर्ग को शमशान बना देते हो

तुम चाहो तो
ताश के पत्तों की तरह
ढेह जाता है अभिमान पल में

तुम मेहरबान होते हो तो
कबीर जैसा फ़क़ीर भी
दिलों की बादशाहियत पता है

और ,,,,,
रावण जैसा बलवान भी
खाक में मिल जाता है

क्षण भर में दिलों की दरार को
खाई बना  देते हो
और चाहो तो
नफरत की बंजर ज़मीन पर
प्यार के फूल खिला देते हो

कौन सिखाता है तुम्हे यह सब ?
और,,,,
कहाँ से आती है इतनी शक्ति तुममें ?

मुझे तो  लगता है कि
तुम परमात्मा के
सबसे करीब हो

तभी तो कर्मानुसार
किसके साथ कब , क्या , क्यों करना है ?
इस बात की पूरी
खबर है तुम्हे ,,,

सिमी  मदन  मैनी







Monday, 10 November 2014

नमस्कार ,,,,

मूसा वी ,ईसा वी , नानक वी , राम वी
जिदी गोदी विच खेड़े नवी ते इमाम वी

ऐसी का एक नारी की महिमा कि जिसकी गोद में देवी देवता  भी खेले ,,,,,नारी इंसानियत की जन्मदाता है ,,,,फक्र होता है स्वयं पर कि मैं  इस बार एक नारी के रूप में जन्मी ,,,,पर नारी होना सम्मान के साथ साथ एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है ,,,,,नारी एक information  bank  है ,,,,,वह सिर्फ एक घर का ही नहीं बल्कि पूरे समाज का निर्माण करती है ,,,,,जिस तरह के संकल्प (thoughts ) उसके  मन में आते हैं  वह साकार होने लगते हैं ,,,,,,,,जब बच्चा गर्भ में होता है तो माँ की  मनोस्थिति का बच्चे पर गहरा प्रभाव पड़ता है ,,,,,एक शरीर भोजन का सेवन  करता है पर एक आत्मा का भोजन उसके मन में जन्म लेने वाले विचार होते हैं ,,,,आत्मिक बीज  गर्भ में सिर्फ माता के  द्वारा परोसा गया विचारों का भोजन करता है ,,,,और भोजन पर ही उसकी सेहत निर्भर करती है ,,,,,आज बच्चे  भावनात्मक रूप से कमज़ोर (emotionally weak ) पैदा हो रहे हैं क्योंकि  माता के खान पान का , दवा दारु का ध्यान रखा जाता है पर उसकी मानसिक स्थिति नज़रअंदाज़ होती है ,,,,जो स्त्री घर चलाती है वह घर में भोजन पकाते और परोसते हुए अपने मन में उठने वाले सभी संकल्पों को परोसती है ,,,,,और कहते हैं ना जैसा अन्न वैसा मन ,,,,, सारा दिन टीवी सीरियल्स देखने के बाद उसका मन बहुत ही नकारात्मक information से भर जाता है और फिर उसी सामान से वह वैचारिक मंथन कर आत्मिक भोजन बनती है ,,,,,,अब उसके मन में उठने वाले विचार इस बात पर निर्भर करते हैं कि वह अपने मन को किस प्रकार की information  से भर रही है ,,,,,निंदा , चुगली , ईर्ष्या , अपमान , दोषारोपण आदि वह सड़ी गली सामग्री  है जिससे बना भोजन विनाशकारी है ,,,,,,,,,और यह भोजन सिर्फ स्त्री की ही नहीं अपितु पूरे परिवार की सेहत ख़राब करता है ,,,,,,,,,,,,,कहते हैं हम जैसा सोचते हैं वैसा ही बनते हैं ,,,,,,एक अच्छी सोच की जन्मदाता है नारी ,,,,,,,,उसके विचारों की सही और सकारात्मक दिशा इस धरती को स्वर्ग बना सकती है ,,,,पर उसके लिए ज़रूरी है कि हर स्त्री इस बात का पूरा ध्यान  रखे कि वह स्वयं किस तरह की बातें सुनती और करती है और किस प्रकार के लोगों और माहौल में उसका अधिकतर समय बीतता है ,,,,,,,,,,,,,

सिमी  मदन  मैनी 

Sunday, 9 November 2014

जीवन ग्रन्थ

नमस्कार ,,,,

कल मेरा जन्मदिन था ,,,,हर बार की तरह एक खास दिन ,,,जिस पर वैचारिक मंथन करना ज़रूरी है ,,,कल मन में उपजे कुछ भाव आपके साथ बाँट रही हूँ ,,,,,,,,,,,,,,

    जीवन ग्रन्थ


एक दिन तुम्ही ने भेजा था
जाओ अपना जीवन ग्रन्थ लिखो
हाथ में थमाई थी कलम संस्कारों की
और बुद्धि की स्याही से डुबो  कर
जीवन के एक खाली पृष्ठ को भरना था

कल इस जीवन ग्रन्थ का
एक और अधूरा पन्ना पूरा हुआ
अब तक के 46 पन्नों में
समाये है जाने
कितने अनुभव ,ख़ुशी  और गम
कितनी  उपलब्धियाँ और गलतियाँ
आते जाते रिश्ते और बनते बिगड़ते काम

कौन जाने ? कितने पन्ने जुड़ने बाकी है
इस जीवन ग्रन्थ में
बहुत मुमकिन है कि
आज का यह संकल्प
इस जीवन ग्रन्थ पर लिखा
आखरी संकल्प हो

अब तक जो लिख डाला
उस पर तो कोई ज़ोर नहीं
पर आगे जो लिखना है
वो मेरे बस में है
आज से अपने मन से वादा है कि
 उसमें उपजा  हर संकल्प शुद्ध होगा
जो मेरे जीवन ग्रन्थ को
सुन्दर बना देगा
और
हर  कर्म परमात्मा को समर्पित  होगा

यह एक जीवन ग्रन्थ नहीं बल्कि
एक बैलेंस शीट है
जो लिखी है
अपने ही हाथों
पूरी ईमानदारी से
और इस लाभ हानि के खाते की
चैकिंग करने वाला
और कोई नहीं
परमात्मा है ,,,
सो इन्साफ भी सच्चा होगा

सोचती हूँ क्यों ना ?
वक़्त रहते अपनी कमज़ोरियाँ
सुधार लूँ
ताकि सही समय आने पर
अपने ही हाथों से
यह बही खाता बड़ी शान से
प्रभु को सौंप दूँ
इस उम्मीद के साथ कि
परिणाम अच्छा ही होगा
क्योंकी ,,,,,,,,,
मैंने इस ग्रन्थ का हर लफ्ज़
पूरी अटेंशन के साथ लिखा है

सिमी  मदन  मैनी
10/11/2014








Thursday, 6 November 2014

नमस्कार ,,,,

कल कहीं से लौट रही थी तो मंदिर के बाहर फूल वालोँ को देखा ,,,,, फूल खरीदने वालों की लम्बी कतार थी ,,,,रंग बिरंगे फूलों में कमल के भी बहुत सुन्दर फूल थे ,,,,थोड़े महेंगे ,,,,कई लोग उन फूलों को खरीद रहे थे ,,,,श्रद्धा सुमन अर्पित करना चाहते थे परमात्मा को ,,,,मैं  सोच रही थी कमल बाकी सभी फूलों से मेहंगा क्यों है ?,,,,,और हम इसे परमात्मा को क्यों अर्पित करते हैं जबकि यह कीचड़ की देन है ?,,,,,, शायद आज हम केवल एक रिवाज़ समझ कर पुष्प अर्पण करते हैं ,,,,,कमल एक ऐसा पुष्प है जो कीचड़ में पनपता है और अलग नज़र आता है ,,,,कीचड में रह कर भी वह अपनी पवित्रता और सुंदरता नहीं खोता ,,,,और इतना ही नहीं उसे देवी देवता के चरणों में अर्पित किया जाता है ,,,,,ठीक उसी तरह हमें भी किसी भी तरह के हालत और लोगों में अपनी अलग पहचान बनानी होती है ,,,,कमल बनना आसान नहीं ,,,,निंदा , दोषारोपण , सड़ी गली मान्यताओं और संकीर्ण सोच के कीचड में अपनी अलग पहचान बनाए रखना एक  कठिन परीक्षा है ,,,,,जहाँ लोग सोचते कुछ  और हैं और बोलते कुछ और हैं वहां हमारी  चुप्पी हमें अकेला कर सकती है ,,,पर इसी में हम   न्यारे और प्यारे बन सकते हैं कमल की तरह ,,,,अलग सोचने वाले ही अपना अलग मुकाम बना पाते हैं अन्यथा हम  भी भीड़ का हिस्सा हैं ,,,,चूहों के रेस में अगर हम जीत भी गए तो भी चूहे ही रहते हैं ,,,,केवल वही बात कहें जो सोचते हैं अन्यथा चुप्पी बेहतर है और हर तरह की सड़ी  गली बातें सुन कर स्वयं को कूड़ेदान ना बना लें ,,,,,आज सारा अटेंशन इस बात पर है की हम ऊपरी तौर पर कैसा व्यवहार करते हैं ,,,,कैसे शब्दों का चुनाव करते हैं ?,,,किस तरह चलते फिरते , उठते बैठते हैं ?,,,,,पर किस प्रकार सोचते हैं इस बात पर प्रश्नचिन्ह है ,,,,,,सोच ही व्यक्तित्व की जड़ है ,,,आज अगर हम किसी भी महान व्यक्ति को याद करते हैं तो उसकी सोच की वजह से करते हैं क्योँकि यह सोच ही है कर्म कराती है ,,,,,सोच एक ऐसी ऊर्जा है जो हमारे  बोल से पहले सामने वाले तक पहुँच जाती है ,,,,और यही सोच या तो विध्वंस करती है और या तो निर्माण करती है ,,,,,,,,,,,,,,ईश्वर से सदा प्रार्थना करें की वह हमें इस कलयुगी कीचड में कमल बनने की शक्ति प्रदान करे,,,,

सिमी  मदन  मैनी


Wednesday, 5 November 2014

 नमस्कार ,,,


प्रत्येक व्यक्ति गुणों और अवगुणों का संगम है ,,,,कोई भी इंसान कभी बुरा नहीं होता ,,बुरे  होते हैं उसके कर्म ,,,,,,और कर्म संस्कारों पर आधारित होते हैं ,,,,,,,,,,कोई भी एक ऐसी आदत जिसे वक़्त रहते रोका  ना जाये  और जो हमें विनाश की और अग्रसर करे ,,,हमारा कड़ा संस्कार है ,,,,ऐसा कोई भी कड़ा संस्कार हमारी सभी अच्छाईयों पर पानी फेर देता है ,,,,,,उनमें से ज़िद एक है ,,,,,मुझे आज भी याद है जब मेरे  बच्चे  छोटे थे तो अक्सर दूसरों की देखा देखी कई बार ऐसी ज़िद कर बैठते थे जिसे उस समय पूरा करना उनका ही नुकसान करना था ,,,,,,,,,जिद करने का हर एक का तरीका अलग होता है ,,,,,,,,,जब हम बहला फुसला कर अपनी बात मनवाते हैं वह भी ज़िद है ,,,,या फिर हम कई बार झगड़ा कर बैठते हैं ,,,,,,,,,बच्चा दुकान पर खिलौने को देख कर उसे पाने के लिए या तो माँ से झगड़ता है और या फिर उसके पैरों से लिपट जाता है और चूमा चाटी करता है ,,,,,दोनों ही सूरतों में उसका लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ उस खिलौने को पाना होता है ,,,,पर एक माँ अपने बच्चे की ज़िद से भली भाँती परिचित होती है ,,,,,वह जानती है की उस समय उसे वह चीज़ लेकर देना एक और बड़ी ज़िद को जन्म दे सकता है और उसका ज़िद करने का संस्कार और कड़ा हो जायेगा ,,,,,,,ज़िद सदा विनाश की और अग्रसर करती है ,,,,,,,,,,,,,,रावण के पास अर्थ, ज्ञान , बल और भक्ति देवताओं से कई अधिक थे पर सीता को पाने की ज़िद ने ना सिर्फ उसका अस्तित्व मिटा दिया अपितु जन्म जन्मांतर उसके नाम पर धब्बा लगा दिया ,,,,,,,,,,,,,,,आज कोई अपनी संतान का नाम रावण नहीं रखता ,,,,,,,,,,कई बार हम भी अनजाने में परम पिता से किसी गलत चीज़ की ज़िद कर बैठते हैं ,,,,,पर हमें यह विशवास होना चाहिए की सही समय आने पर हमारा पिता हमें स्वयं आवश्यकता  के सभी स्थूल और सूक्ष्म साधन उपलब्ध कराएगा ,,,,,,नाम , मान , रिश्ते , सुख सुविधाएँ खुद हमारे पास चल कर आएँगी ,,,,,,,,,,,,,,इंतज़ार  और विश्वास करना सीखना भी ज़रूरी है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,सब्र का फल सदा मीठा ही होता है

सिमी  मदन मैनी  

Tuesday, 4 November 2014


नमस्कार ,,

कल  बाबा  बुलेशाह  का एक कलाम  गुनगुना रही थी ,,,,,,,,,,,,,कितनी  गहराई है उनकी बातों में ,,,,,,,सोचा आप सबके साथ बाँट लूँ ,,,,,,,," जाग  बिना दुद जमदा नाहीं , पावें  लाल  होवे  कड  कड  के  ",,,,,,,,,बड़ी ही गहरी और सुन्दर  पंजाबी की पंक्ति है जिसका अर्थ है  चाहे दूध को आंच पर कितना ही लाल कर लेँ दही ज़माने के लिए उसमें थोड़ा  दही  मिलाना पड़ता है ,,,,,,,,,, आज दिन तक बहुत ज्ञान सुना ,,,,,,,भारी  भरकम ग्रन्थ पढ़े ,,,,,नियमित रूप से मंदिरों में हाज़री लगाई ,,,,,,पूजा अर्चना की ,,,,व्रत रखें ,,,,,अपने अपने धर्म में बताये गए सभी नियमों का विधिवत पालन किया ,,,,,,फिर कैसे उस परमपिता  से दूर हो गए ????,,,,,,कितनी ही कोशिश कर लें मक्खन से घी बनाने के लिए उसे आंच पर चढ़ाना ही पड़ता है ,,,,,,,,,,,उसी प्रकार  कितना ही श्रेष्ठ ज्ञान सुन लें जब तक उसे जीवन में उतारने कीई  क्षमता और साहस हम में नहीं है परमात्मा से दूरी बनी  रहेगी ,,,,,,,,,,,आज हम गीता को सुनते हैं , गीता की नहीं सुनते ,,,,,,,महान ग्रंथों को सुनते हैं , महान ग्रंथों की नहीं सुनते ,,,,,माँ छोटे  बच्चे को पढ़ा रही है  " सदा सच  बोलो " ,,,,और जैसे  ही दरवाज़े पर दस्तक होती है हम उससे कहते हैं जाओ कह दो मम्मी घर पर नहीं है ,,,,,,,,,,उसके तुरंत बाद हम घर में जोत जगाते हैं ,,,,,,,,जितना श्रेष्ठ  ज्ञान हमारे ग्रंथों में हैं उसकी एक बात को जीवन में उतारने में जन्मों बीत जाते हैं ,,,,,,,,,,,बचपन से सुनते सुनाते आये ,,,, सदा सच बोलो ,,,,,पर आज दूसरों से तो क्या ? खुद से भी सच नहीं बोल सकते ,,,,,,इसी लिए अपने आप से दूर हैं और सब कुछ होते हुए भी शांति और प्रेम का अनुभव नहीं करते और उसकी तलाश बाहरी  चीज़ों  में करने लगते हैं ,,,,,इसलिए जो भी सुनें और पढ़े उसे  एक नियम समझ कर ना करें बल्कि उसपर वैचारिक मंथन ज़रूरी है अन्यथा यह स्वयं को ईश्वर को धोखा देना है ,,,,,,,,,


सिम्मी मैनी 

Sunday, 2 November 2014

जीवन का हर एक क्षण कुछ ना कुछ झोली में डाल जाता है ,,,,इस जीवन रंग मंच पर घटने वाला हर पल कल्याणकारी है ,,,,,,,,हम कई बार इस गूढ़ रहस्य को समझ नहीं पाते और व्यर्थ चिंतन करते हैं ,,,,,,,बीता  हुआ हर पल या तो हमें खुद से मिला देता है और या फिर सामने वाले व्यक्ति को परखने की क्षमता को बढ़ता है ,,,,,,,, अकसर जो घटना हमें अप्रिय लगती है उसके घटित होने के पीछे कोई ऐसा भेद होता है जिसे खुली आँखों से नहीं देखा जा सकता ,,,,,,यदि हमारा ईश्वर पर अटूट विश्वास होता है तो हमें हर पल को उसका प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लेना  चाहिए ,,,,कठिन परिस्थितियों में ही व्यक्ति को अपनी क्षमता का एहसास और अपने और पराये की परख  होती है ,,,,,,कभी यह ना कहें की समस्या बड़ी है बल्कि समस्या से कहें कि मेरा प्रभु बड़ा है ,,,,,,,,,,जीवन में हम अक्सर ऐसे लोगों से रिश्ता कायम करते हैं जो धन , मान , ओहदे में हमसे अधिक बलशाली हों ,,,,,,,,,,,,हम उनकी ताकत को अपनी ताकत समझ बैठते हैं और उसके बल पर अनैतिकता के मार्ग पर कब कदम बढ़ जाते हैं पता ही नहीं चलता ,,,,हम धन और ताकत के बल में चूर स्वयं से दूर हो जाते हैं ,,,,,,,,,,,,,,रिश्ते कभी भी किसी शर्त और मतलब की नींव  पर नहीं पनपते ,,,,,,,,,,,,,रिश्ते तो दिल से बनते हैं ,,,,,,,,,,,,,,,दुनिया में किसी इंसान की इतनी हैसियत नहीं की वह हमारे लिए कुछ कर सके ,,,,,,,,,,,,मदद भी ईश्वर का इशारा होने पर ही नसीब होती है ,,,,,,,,,,,,,,सबसे बड़ा मददगार वो है ,,,,,,,मदद लेने की क्षमता हममें खुद में होनी ज़रूरी है ,,,,,,,,,,,,,,कहते हैं शेरनी का दूध केवल सोने के बर्तन में रख सकते हैं अन्यथा वह बर्तन फाड़ देता है ,,,,,,,ईश्वर से मदद हासिल करने की लिए हमें उस सोने के पात्र  की तरह बनना होता है ,,,,,,, आडंबर  करने की जगह उससे रिश्ता कायम करना पड़ता है ,,,,,,,,,,,,एक बार एक व्यक्ति ने एक पहलवान से दोस्ती की जोकि  बहुत बलशाली था ,,,,,,,,,,,,,,,,,और अपने  सच्चे मित्र को सदा अनदेखा किया ,,,,,,उसे सदा लगता की कठिन हालत में पहलवान से मदद मिलेगी ,,,,,,,,,,,,,,,,,एक दिन इस व्यक्ति के घर में आग लग गयी ,,,,,ईश्वर की  माया देखिये  उस दिन पहलवान घर पर नहीं था ,,,,,,,,,,,,,,,,,कमज़ोर मित्र   चीखें सुन कर पानी की बाल्टी लेकर  भागा ,,,,वह घर तो ना बचा  सका पर उस दो बाल्टी पानी ने उस व्यक्ति की जान बचा दी ,,,,,,,और उसे ईश्वर ने एक अनमोल पाठ पढ़ा दिया कि उसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता  और मित्रता का आधार रुतबा या शानो शौकत नहीं बल्कि प्रेम है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


सिमी  मदन  मैनी

Monday, 27 October 2014

कुछ दिन पहले पड़ोस में एक जवान मौत हुई ,,,,बहुत दुखद घटना थी ,,,,अकस्मात् जीवन से यूँ ही किसी का चले जाना दुःख को और भी बढ़ा देता है और एक अपनों का जीवन एक खालीपन से भर जाता है  ,,,,,लोगों की आँखों में आँसू और दिवंगत आत्मा के लिए दुआएँ थी ,,,,पूरा माहौल शोकग्रस्त था ,,,,,हममे से कभी भी कोई भी इस तरह जीवन के रंगमंच को छोड़ कर जा सकता है ,,,,जब कोई जाता है तो हम उसका शोक तो करते है लेकिन क्या हम उससे कुछ सीखते है ? ,,,,,शरीर का छूट जाना किसी के बस में नहीं फिर भी हम उसका शोक मनाते  हैं ,,,,  लेकिन जो रिश्ते हमारे जिन्दा रहते हुए हर घडी मर रहे हैं ,,,,क्या हमें उसका कोई अफ़सोस होता है ? ,,,,क्या हम उसकी जिम्मेदारी उठाते हैं ?,,,,,शायद नहीं ,,,,,,,इन्हे सहेज कर रखना सिर्फ और सिर्फ हमारे बस में होता है ,,,,,,ज़रूरी है की सिर्फ हम मौत पर आँसू बहाने की जगह जिन्दा लोगों से रिश्ते मज़बूत करें ,,,,,कम  से कम टूटते हुए रिश्ते को जोड़ने की पहल करें ,,,,,,,,,पहल करने से इंसान छोटा नहीं बड़ा होता है ,,,,कर्मों के अनुसार यूँ तो हर रिश्ते का समय है ,,,,,,फिर भी उस रिश्ते में हमारा जो रोल है उसे ईमानदारी से निभाएं ,,,,,,,,बाकि सामने वाले और ईश्वर पर छोड़ दें ,,,,,,,,कल को   अगर किसी वजह से रिश्ता मर  भी जाता है तो कम से कम आपको अफ़सोस नहीं होगा की आपने उसे बचाने  का प्रयास नहीं किया ,,,,,अपने अहं को एक तरफ रख दें ,,,,,,,,,आपको हिम्मत अपने आप मिल जाएगी ,,,,,सामने वाले का इंतज़ार ना करें ,,,,,,,,इंसान छोटा या बड़ा अपने संस्कार और सोच से होता है ,,,,अगर आप पहल करते हैं किसी रिश्ते को जोड़ने की तो आप अपनी नज़रों में ऊपर उठ जाते है ,,,,,,,आज तक तो हर कार्य सिर्फ दूसरों की नज़रों में ऊपर उठने के लिए किया पर सच्चा सुख अपनी नज़रों में ऊपर उठने में है ,,,,,,,,,,,हर रोज़ रात को ईश्वर से कहना मैंने अपना होमवर्क पूरा किया ,,,,उसका परिणाम आप पर और वक़्त पर छोड़ते हैं ,,,,,,,,,,हम मृत शरीर में तो नहीं पर मृत रिश्तों में प्राण फूँक सकते हैं ,,,,और ऐसा करने से हम महान कलाकार बनते हैं क्यूंकि अब हम एक सुखद और प्रेममयी कल को आकार दे रहे हैं ,,,,,,,,,,

सिमी  मदन  मैनी    

Wednesday, 22 October 2014

दिवाली


इस दिवाली आपको
कुछ  खास देना चाहती हूँ
बहुत ढूंढा बाजार में पर
ख़ोज अधूरी रही

तभी ख्याल आया
क्यों ना आपको
अपनी दुआओं का वारसा सौंप दूँ
इस खास मौके पर
शायद आपको
दुआओं का यह तोहफा
पसंद आये
प्रार्थना है प्रभु से
कि इस दिवाली

आपके मन मंदिर में जलें
ज्ञान का दीपक
जो नफरत का मैल  मिटा दे

उम्मीद की लड़ियों से सजे
आपकी सोच
जो आपका भविष्य दमका दे

प्रेम और शांति की रंगोली से
सजे आपका अनमोल जीवन
और आपको इंसान से फरिश्ता बना दे

पवित्रता और ख़ुशी की वंदनवार
सजे आपके दरवाज़े
और आपके घर को स्वर्ग बना दे

माँ लक्ष्मी और सरस्वती
खुद चल कर आये आपके घर
और आपकी जीवन बगिया  को
अपनी  रेहमत से महका दे

अपनों की  फुलजडियों  से
आबाद रहे आपका जीवन
और रिश्तों को मज़बूत बना दे


"सिम्मी ' और क्या दे सकती है ?
इस दुआ के सिवा
कि ,,,,,
परमात्मा हर कदम पर
आपका साथ निभा दे


दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएँ

सिमी  मदन   मैनी

Friday, 17 October 2014

सीलन



                      सीलन


कुछ दिन बाद
दिवाली दस्तक देगी दरवाज़े
उसके स्वागत को घर में
पुताई का काम जारी है

इस दीवार को जाने
कितनी बार रंग डाला
पर रह रह कर पपड़ी
झड़ने लगती है ,,,,
सफेदी वाला बोल उठा
मैडम !,,,ऊपर ऊपर
रंग पोतने से कुछ ना होगा
रंग कितना ही अच्छा हो
जड़ में मरमम्त चाहिए
यह सीलन है जो रह रह कर
दीवार को खोखला कर देती है
और सुन्दर दिखने वाले घर में
पुरानी सीलन के यह पैबंद
छुपाये नहीं छुपते ,,,,,,


"सच कहते हो भैया ",,,
जैसे हमारी व्यवहार कुशलता
और खोखली हंसी  का रंग रोगन
दूसरों को छल नहीं सकता
और कड़े संस्कारों  और
छोटी सोच की सीलन
हमारी  असलियत
बयां कर देती है
और हमारे व्यक्तित्व पर
लगा पैबंद साफ़ छलकने लगता है

चलो ,,,,प्लास्टर छील  कर
जड़ से मरम्मत करो
और रंग दो इस दीवार को
एक सुन्दर रंग से
क्योंकि
मैं  नहीं चाहती कि
मेरे विचारों की सीलन
इस घर को मकान बना दे




सिमी  मदन  मैनी




Thursday, 16 October 2014

प्रेशर कुकर

               

                 प्रेशर कुकर

गैस चूल्हे पर सीटियाँ  बजाता
कुकर
शायद कोई सन्देश देना चाहता है
आंच पर चढ़ा कुकर
मुझे आवाज़ लगता है
दौड़ कर जाती हूँ मैं
और आँच धीमी कर देती हूँ
उफ्फ !!!!!!!
गर भूल जाती तो ?
फट जाता कुकर
एक बादल की तरह
और बिखर जाता
तहस नहस होकर
मेरी रसोई में

कितना मिलता है ना कुकर
मेरे मन से ,,,,
जब भी पकते हैं नकारात्मक विचार
इस भोले मन में ,,,
कुछ देर तो मन
चुप रहता है
फिर बजती है सीटी
परेशानी और टेँशन  की
गर ना दिया ध्यान
और ना  किया  इन विचारों की
आंच को कम  तो
कुछ और तेज़ सीटियाँ
किसी बिमारी की
सारी ऊर्जा खींचते हुए
और अंत में
 डिप्रेशन का एक धमाका
और बिखर जाता है
अस्तित्व और आत्म सम्मान
चिथड़े चिथड़े होकर


जल जाती है ख़ुशी
लापरवाही की आग में
और हम सोचते हैं
कि ,,,,
काश वक़्त रहते
मन की आवाज़ को सुन लेते
और धधकते मन
पर आध्यातम का पानी डाल देते
तो नकारात्मक विचारों की आंच
कुछ शांत हो जाती और
यह भोला मन बच जाता

सिमी  मदन मैनी





Saturday, 11 October 2014

मेहंदी

नमस्कार

कल करवाचौथ के दिन सभी के हाथ मेहंदी से सुर्ख लाल थे,,,,,सुन्दर डिजाइन और महकते हाथ ,,,,इन हाथों को देख जो भाव मन में उपजे ,,,,,आपके साथ बाँट रही हूँ ,,,,


                      मेहंदी


सुहागनों के हाथों में रची मेहंदी
रिश्तों के रंग को फिर गहरा गई
खुद पिसी और पिस कर भी
किसी का जीवन सजा गई
उम्मीद और दुआ के ऐसे रंग भरे
इन दो हाथों में कि ,,,,,
जीवन का सार सीखा गई ,,,

यूं  ही नहीं लगती नव वधु के हाथों में
शायद कुछ कहना चाहती है ,,,
एक रिश्ते से कितने और नए रिश्ते
पनपते हैं ,,,,
दुल्हन को आईना  दिखला गई
रिश्तो को जोड़ के किस तरह रखना है
पवित्र बंधन का पहला सबक सीखा गई

पति से जुड़े हर रिश्ते को किस तरह
प्रेम और समझदारी से संवारे यह हाथ
कानों  में होले से बतला गई
जीवन में खुशियों का रंग सदा बना रहे
और जीवन साथी की हर जिम्मेदारी अपनी हो
हाथों को महकाते हुए
यह शिक्षा सुना गई

मेहंदी सिर्फ फ़ैशन या श्रृंगार की वस्तु  नहीं
नए बंधन जोड़ने की कड़ी है
प्रेम और त्याग से जीवन किस तरह रंगना है
और किस तरह मेहकाना है घर आँगन
आज अपना अस्तित्व मिटा कर
सबको यह हुनर सीखा गई
हुनर सीखा गई

सिम्मी  मदन मैनी






Saturday, 4 October 2014


नमस्कार

आज अपने विचार आपके साथ बाँटते  हुए मन कुछ भारी  है ,,,,शायद लिखने से या बाँटने  से कोई जवाब मिल जाये ,,,," एकता में बड़ी शक्ति है " ,,,,सुनने में बहुत अच्छा लगता है ,,,,शायद सच भी है ,,,,पर सिर्फ आसामाजिक  तत्वों के लिए , अशिक्षित लोगों के लिए ,या फिर कट्टरवादी लोगों के लिए ,,,,आप सोचेंगें ऐसा क्यों ? सो आज सुबह की एक घटना आपके साथ बांटती हूँ ,,,, हर रोज़ की तरह कल प्रेस के लिए कपडे दिए ,,,सुबह कपडे टाँगते हुए देखा की एक कपडा हमारा नहीं है ,,,प्रेस वाले से बात कर रही थी तो वह साफ़ मुकर गया और कहने लगा कि यह कमीज तो किसी दूसरे है पर आप के कपडे इतने ही थे ,,,,,मैं जानती हूँ उसमें एक कपडा कम  है ,,,,उसके गैर जिम्मेदाराना रवैये से मेरा पर चढ़ गया ,,,, जोकि शायद गलत है ,,,,यह व्यक्ति हमेशा से कपडे गुमाता  आ रहा है पर फिर भी कोई ठोस कदम उसके खिलाफ नहीं लिया जा सकता ,,,, मैं जब उससे बात कर रही थी तो वह अनगिनत लोग थे जो हमें जानते थे ,,,,हर कोई उस बहस का लुत्फ़ उठा रहा था ,,,,और मुझे समझा रहा था ,,,,यह तो ऐसा ही है ,,,,क्या करें बरदाश्त करना ही पड़ता है ,,,,यह किसी और को काम भी तो नहीं करने देते ,,,,और मुझे यह बिन मांगा  ज्ञान देकर धोबी को अपनी कपड़ों की गठरी पकड़ाते  और आगे बढ़ जाते ,,,धोबी कहने लगा ज्यादा से ज्यादा क्या करोगे ?????? complaint  करोगे ? ,,,,उससे क्या होगा ? ? ,,,,उसकी आदत इतनी पक चुकी है और वह इस बात को अच्छी तरह समझ चुका  है कि  एक अकेला क्या कर लेगा ?????? मैं  किसी एक ऐसे व्यक्ति का इंतज़ार कर रही थी जो सही का साथ दे सके ,,,,पर अफ़सोस हम जितने अधिक शिक्षित और साधनों  से भरपूर हो गए  हैं उतने ही अधिक स्वार्थी हो गए हैं ,,,,हमे सिर्फ और सिर्फ अपने आराम से मतलब है ,,,,,क्या फर्क पड़ता है की पडोसी पर  क्या बीतती है ,,,,,हम सरकार को कोसने के हकदार कैसे हुए ?,,,जब हम अपनी छोटी सी जिम्मेदारी नहीं समझ सकते ,,,,,,,,,  सड़े गले सिस्टम बनाये हम और बदले सरकार ,,,,,इसी घटना का अब दूसरा रुख देखिये ,,,,,अगर आज चार लोग मेरे साथ उसे  उसकी जिमेदारी का एहसास दिलाते तो वह पूरी कॉलोनी में किसी का नुकसान करने की हिम्मत नहीं होती ,,,,,,,,यही छोटी बातें आगे चल कर बड़ी हो जाती हैं ,,,,,,,,यह समझना ज़रूरी है  कि  अगर आज पडोसी के घर में आग लगी  है तो  मेरा घर भी उस तपन से ज़्यादा नहीं बचेगा ,,,,,,,,,,,,सिर्फ किताबें  पढ़ना काफी नहीं सही मायनों में ज्ञान को जीवन में धारण करना ज़रूरी है ,,,,वक़्त पर सही का साथ देना ज़रूरी है ,,,,,,,,,,देश और सामज के सुधार  की शुरुवात घर से होती है ,,,और चूहे बिल घर की उसी दीवार पर बनाते हैं जो कमज़ोर है ,,,,,,,,,,ध्यान रहे हम वो कमज़ोर दीवार ना बन जाएँ ,,,,,,,,,,,,बड़े शर्म की बात है अशिक्षित हो कर भी इन लोगों में एकता है और वो हमें हमारे कमज़ोर होने का एहसास दिलाती है ,,,,,,,,,,,,हमारे सुख ,सुविधा और आराम ने हमें  इन लोगों का गुलाम बना दिया है  और हम एकता के बल को भुला बैठे हैं ,,,,,,


सिम्मी मैनी 

Wednesday, 1 October 2014




सुप्रभात मित्रों

आज गाँधी जयंती के अवसर पर बापू के अनेकों अनेक गुण दिल पर दस्तक दे रहे हैं ,,,,एक व्यक्ति जो शारीरिक रूप से शायद इतना आकर्षक नहीं था ,बहुत कम ज़रूरतें ,और सादा जीवन ,,,,,एक ऊँची सोच ,अलग नज़रिया और लोगों को स्वयं से जोड़ लेने की अद्धभुत क्षमता ,,,,जाने कितनी ही ऐसी बातें हैं इस महान व्यक्तित्व के बारे में जिन्हे याद कर के सर क्ष्रद्धा से झुक जाता है ,,,,आज जहाँ व्यक्ति लम्बे भाषण ,नाम और रुतबे के दम पर अपनी पहचान बनाना चाहता है उन्होंने अपनी सादगी ,अहिंसा और धृण निश्चय के बल पर पूरे देश को अपने पद चिन्हों पर चलाया और हमें गुलामी की ज़ंजीरों से मुक्त कराया ,,,,वह एक निडर व्यक्तित्व के मालिक थे ,,,कितनी आसानी से सभी सुख सुविधाओं का परित्याग कर दिया और सिर्फ एक धोती और लाठी ने वह कमाल कर दिखाया जो बेशुमार दौलत और रुतबा नहीं कर सकता ,,,,आज इस अवसर पर भारत में स्वछता अभियान का आरम्भ हो रहा है ,,,,देश की सफाई के साथ साथ मन की सफाई भी आवश्यक है ,,,,आज भारतीय नोट पर जब गांधी जी का चित्र देखती हूँ तो मन विचलित हो जाता है ,,,,हर बार जब पैसा हाथ में होता है तो
संकल्प आता है मन में ,,,,क्या यह कमाई मेह्नत  की है ? ,,,क्या जो पैसा में घर में अपनी संतान के पालन पोषण में इस्तेमाल कर रही हूँ वह ठीक तरीके से कमाया गया है ,,,क्योंकि धन एक भी एक महत्वपूर्ण साधन है जो हमारा चरित्र निर्माण करता है ,,,,इसी के कारण इंसान सभी दुष्कर्म करता है और दलदल में धंसता चला जाता है ,,,,,इसी प्रकार जब पैसा खर्चना होता है तो मन खुद से सवाल करता है ,,,क्या इतने महत्वपूर्ण साधन का इस्तेमाल सही स्थान पर और सही तरीके से किया है ,,,और इस खर्च से चरित्र निर्माण  होगा ?सफाई का आरम्भ मन से करें देश स्वयं ही पवित्र हो जायेगा ,,,,स्वछता एक संस्कार है ,,,जब इसकी आदत पड़ जाती है तो मन , स्थान और सोच सब पवित्र हो जाता है ,,,,गांधी जी का चित्र मुझे हर बार यह सन्देश देता है की धन का सदुपयोग यदि हर व्यक्ति करे तो हमारा देश संसार के शीश पर कोहिनूर की तरह जगमगाता रहे ,,,,,,,

सिम्मी मैनी


good morning friends

on this auspicious occasion of gandhi jayanti i am thinking of bapu,s strengths and qualities ,,,i am bound to bow my head in front of a great personality  who was physically not very strong and attractive but had limited needs , simple living and high thinking was his motto , owner of different and unique thought process , and person who had great ability to enroll people ,,,,in present times which money , authority and power can not create , he created with his simplicity ,,,,the whole nation was being enrolled and india was declared as a free nation ,,,,he was a fearless personality who left all his comforts easily and his lathi and dhothi created what financial treasures and ultimate authority could  never create ,,,,,today cleanliness campaign has been declared  in our country on this occasion ,,,,but i think before we work on physical cleanliness it is important to clean our thoughts ,,,,whenever i look at bapu,s image on indian currency ,,,it reminds me of  his great character , qualities and strengths ,,,i am bound to think that is it my hard earned money? and how i have earned this most important resource? because this
 will built my children character, future and destiny ,,,,similarly whenever i spend money  i thought  comes to my mind weather this will be used in constructing or destructing my qualities and character ? cleanliness is a deep rooted sanskar ,,,,once we have this sanskar of purity  it is present in all areas of our life ,,, in our thoughts , environment  and country ,,,, image of gandhi ji always tells me that if each one of us use our financial resources in right way our country will surely make its  own mark world wide

simmi maini 

Tuesday, 30 September 2014

सुप्रभात मित्रों

अभी रविवार को मुझे एक विवाह में जाने का मौका मिला ,,,अपने ही करीबी  रिश्ते में यह विवाह था ,,,, मेरी अपनी बहिन की शादी ,,,, सभी से लम्बे अरसे बाद मिलना हुआ ,,,, खूब रौनक थी ,,, दुल्हन की आँखों में कई बड़े सपने तैरते दिखाई दिए ,,,, हर कोई अपनी अपनी सलाह से दुल्हन की झोली भर रहा था और उसके उज्जवल भविष्य की कामना कर रहा था ,,,, मैं चुपचाप बैठी सभी की बात सुन रही थी और विचारों का मंथन निरंतर चल रहा था ,,," सास ठीक लग रही है ,,,,लगता है ध्यान रखेगी ,,,सोच कर बोलना ,,,,डरना मत ,,,,नन्द भी पढ़ी लिखी है ,,,,लगता तो नहीं interfere करेगी ,,,,माँ और बहिन ही समझना उन्हें भी ,,,,जेठानी थोड़ी चालाक  लगती है ,,,,सोच समझ कर बात शेयर करना ,,,,",,,,,,ऐसी ना जाने कितनी ही बातें दुल्हन को समझाई जा रही थी और दुल्हन सब कुछ समझने का प्रयास करने में व्यस्त थी ,,,,,यक़ीनन हर कोई उसका भला चाहता था ,,,,,पर क्या हमने कभी यह सोचा है की हम दहेज़ में किस तरह के विचारों के साथ बेटी को विदा करते हैं ?,,,, दहेज़ में दिए हुए सामान को तो बहुत परखते हैं और विचारों को ?,,,," सास भी माँ की तरह और नन्द और जेठानी भी बहिन की तरह होती है ",,,,यह सुनने में जितना सुन्दर लगता है वास्तविकता में उतना ही नकारात्मक है ,,,,जब हम कहते हैं माँ की तरह तो इसका अर्थ हो जाता है माँ नहीं है ,,,,बहिन की तरह यानि बहिन नहीं है ,,,,,अनजाने में हम एक  भय से  बेटी के मन को भर देते हैं ,,,,ससुराल शब्द उसे एक भयानक परीक्षा की तरह लगने लगता है ,,,,और भय में दी हुई परीक्षा का परिणाम कैसे अच्छा हो सकता है ?,,,,हम जैसे खाद्य पदार्थों  का प्रयोग करेंगें भोजन वैसा ही बनेगा ,,,,,हमारी सड़ी गली पुरानी मान्यताएं बेटी के मन में भय और अविश्वास का ऐसा बीज बो देती हैं की जिससे केवल कड़वे रिश्तों की ही फसल पैदा हो सकती है ,,,,माता पिता होने के नाते हम में से हर एक का दायित्व बनता है कि केवल अपनी मान्यताओं ,अनुभव और अनुमान का बोझ बेटी के काँधों पर डालने की  बजाए  उसे इतना सशक्त  बनाएँ  की वह अपनी बुद्धि  का सही प्रयोग कर सके ,,,,,,,अपनी स्वयं की परखने और निर्णय लेने की शक्ति से सही दिशा का चुनाव कर सके ,,,,,आध्यात्मिक तौर पर उसे विवाह और  भावी  रिश्तों का महत्व  समझाएँ ,,,,,,हर भावी रिश्ता उसका एक विशेष  कार्मिक  खाता है ,,,,,,,जिसे उसे निभाना है ,,,,,,,यह ज़रुरी नहीं जो आपके साथ हुआ वह आपकी बेटी के साथ भी हो ,,,,,,,,कुछ अलग सोच के व्यक्ति ही अपना एक अलग मुकाम बनाते हैं ,,,,,एक सुन्दर सोच ही सुन्दर भविष्य का निर्माण करती है ,,,,,,बेटी के दहेज़ को सुन्दर विचारोँ से सजाएँ  और उसे फलते  फूलते  देखें ,,,,,,,,उसे अकेलेपन का नहीं परिवार का तोहफा दें ,,,,,,

सिम्मी मैनी


Good morning friends


Last sunday i got a chance to attend my cousin  sister wedding ,,,,,i met all my relatives after a long time ,,,,everyone was very excited and enjoying ,,,,in this environment of celebration i saw everyone busy in giving their wise and valuable suggestions to the bride and the concern was her beautiful married life ahead ,,,,i could see big dreams floating in beautiful eyes of bride ,,,,i was sitting aside and listening silently to everyone advises ,,,,so many thoughts were churning in my mind ,,,,"mother in law seems to be wise ,,,sister in law is also educated and seems to be non interfering,,,,they both will take good care of bride i guess,,,don't be scared ,,,,watch your words before you speak,,,, sister in law is bit clever,,, think before you share something,,,mom in law is like mother only and sister in law are like sisters ',,,,there was a huge list of such advises which bride was trying to register ,,,i am  sure everyone concern was her better and bright future only,,,but have we ever noticed that with what kind of thoughts we send the bride?  ,,,,  we do take good care of material things to be given as dowry but what about the thoughts that  will create her destiny?,,,,mom in law is like mom and sis in law is like sister is actually a negative statement which states that they are not mother and sister,,,we actually fill bride's intellect with fear and lot of negativity,,,in laws word become an ugly and dangerous test  for bride ,,,,exam given in fearful state brings only bad results ,,,, quality of food  depends on kind of ingredients we use to cook the food ,,,,we put seed of fear and distrust in girl's  intellect due to our own hard and ugly beliefs about in laws ,,,,and  sooner or later  she gets  crop of stained relationships,,, as  a parent it is our prime duty  to see that we should not over burden our daughter with our own belief systems , judgement and experiences,,,, make her strong and capable enough to use her own intellect and strengthen the power of discrimination and decision and choose right direction ,,,,make her understand spiritual importance of marriage and relationships ,,,,she has a strong karmic bonding and account with her in laws family ,,,and they all have to clear their karmic debts with this association ,,,,it is not necessary that what has happened to you will happen to your daughter ,,,,she is a different entity ,,,,,those who think differently create their own mark  ,,,,a beautiful thinking creates beautiful destiny ,,,,decorate your daughters dowry with finest and most beautiful thoughts ,,,,bless her with beautiful relations and not lonliness,,,,

simmi maini











Saturday, 26 July 2014

" तुम्ही हो माता,  पिता  तुम्ही हो ,तुम्ही हो बंधु , सखा तुम्ही हो "  यह पंक्ति बचपन से सुनते आ रहे हैं ,,पर क्या इस बात  पर अटूट विश्वास भी है हमारा ? ,,,,वो हमारे मात पिता का भी मात पिता है ,,,,क्या हम उससे बिना सवाल किये उसकी दी हुई हर चीज़ को दिल से अपनाते हैं ,,,,बचपन की एक घटना मुझे याद है ,,,मुझे कुछ  skin  problem  हो गयी थी और मेरी माँ " साफी  " जो की एक कड़वी दवा है मुझे ज़बरदस्ती पिलाती थी ,,,,मैं पूरा घर आसमान पर उठा लेती ,,,पर माँ को जैसे कभी रहम नहीं आता ,,,,,,मैं घंटों उससे बात ना करती थी ,,,,,,,,माँ प्रेम करती थी सो जानती थी कि कब कितना मीठा देना है और कब कितना कड़वा ,,,,,,यदि माँ मोह वश बच्चे को दवा ना दे ,,,तो बिमारी अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाए ,,,,,माँ का निस्वार्थ प्रेम ही हमें हर दुःख से दूर रखता है ,,,हम ज़िन्दगी के सभी पाठ आसानी से पढ़ लेते हैं और एक कामयाब व्यक्ति बनते हैं ,,,,,,परमात्मा से बेहतर कोई नहीं जानता कि हमें कब ,क्या चाहिए ,,,,,,हम ही उस पर विशवास नहीं करते ,,,,जीवन के इस विशाल दरिया में वक्त आने पर वो हमें धक्का दे देता है ,,,,शायद वो जानता हैं की अब  हम   मुश्किलों की विशाल लहरों पर जीत पाने को तैयार हैं ,,,,वो एक कोच की भाँति हमें तैयार करता है ,,,,कसरत करना किसे अच्छा लगता है ? ,,,,पर यही कसरत हमारा स्टेमना बनाती है ,,,,जब हम परिस्थितियों के विशाल दरिया में होते हैं तो डर  जाते हैं ,,,,,पर भूल जाते हैं की किनारे पर वो खड़ा है और हमारे पार होने का इंतज़ार कर रहा है ,,,,,,इसी तरह एक एक करके जीवन का हर पाठ वो हमें पढता चला जाता है ,,,,इसलिए वो जब भी , जो भी , जितना भी दें ,,,,उसे सर माथे लगाएँ ,,,

Wednesday, 23 July 2014

एक बहुत जानी पहचानी कहावत है  " चिंता  चिता  समान ",,,,,सब जानते हैं ,,,सुनते हैं  पर चिंता की दलदल में फिर भी धँसे चले जाते हैं ,,,,,कल क्या होगा? ,,,कैसे होगा ?,,,,और भी ना जाने कितने सारे प्रशन दिमाग पर जैसे पहरा देते हैं ,,,,कठिन हालात में यह प्रश्नों का बवंडर दिलो दिमाग का सुकून हर लेता है और हम खुशी से कोसों दूर हो जाते हैं ,,,,,,,,भूत और भविष्य जैसे वर्तमान को निगल जाते हैं ,,,,सब कुछ होते हुए भी व्यक्ति निर्धन हो जाता है क्योंकि वह प्रेम, शांति, शक्ति ,पवित्रता , ज्ञान और ख़ुशी किसी भी गुण का अनुभव नहीं कर पाता ,,,,,,,,,चिंता तन और मन दोनों को घायल कर देती है और इंसान अपनी सोचने , समझने ,निर्णय लेने और परखने की शक्तियाँ खो बैठता है ,,,,,,,,,,,,और इसके कारण उसका जीवन अंधकारमय हो जाता है ,,,,,,,,चिंता एक ऐसा चश्मा है जो व्यक्ति को दृष्टिहीन बना देती है और जीवन में कोई   आशा की किरण दिखाई नहीं देती  ,,,,,,चिंता एक ऐसा विष है जो अंतर को खोखला कर देती है ,,,,,,,,,चिंता हमारे बहुमूल्य समय को निगल जाती है ,,,,जितना समय हम चिंता में बिताते हैं यदि प्रभु के चिंतन में बिताएँ  तो कठिन से कठिन समस्या का समाधान हो सकता है ,,,,परमात्मा का स्मरण हमें कष्ट से उभरने की शक्ति प्रदान करता है ,,,,,,और हम पहाड़ जैसी समस्या को एक छोटे स्पीड ब्रेकर की तरह पार कर लेते है ,,,,,,,,,,,,,,,,,


Thursday, 17 July 2014

हम अक्सर जीवन में एक शब्द का प्रयोग निरंतर करते हैं,,,,अटैचमेंट (attachment ),,,,,i am very attached to my husband, parents, son , daughter and even sometimes material things and ideas,,,,,यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि वो किसी से भी अटैच नहीं है तो उसे insensitive कहते हैं ,,,,पर क्या वास्तव में ऐसा है ,,,,अटैचमेंट यानी मोह ,,,,,,,प्रेम और मोह में एक पतली लकीर है जो की जीवन का रुख पूरी तरह से मोड़ देती है ,,,,जब हम किसी से अटैच होते है तो दुःख का जन्म होता है ,,,सामने वाला रोता है तो हम रोते  हैं ,,,हँसता है तो हँसते हैं ,,,,हमारी सोचने और समझने की शक्ति जैसे समाप्त हो जाती है ,,,किन्तु जब हम किसी से प्रेम करते हैं तो हम संतुलित रहते हैं ,,,हमारी स्थिति सुख और दुख में एक समान रहती है ,,,,और हम सामने वाले को सही सलाह भी दे सकते हैं और संभाल  भी सकते हैं,,,,

मोह वश ही हम सभी कुकर्म करते हैं ,,,,गलत रास्ते  का चुनाव करते  हैं ,,,,किन्तु जीवन के अंतिम सत्य को भुला बैठते हैं ,,,, हम किसी वस्तु , रिश्ते  ,  रुतबे , धन  सम्पती , सोच से भले ही कितने  attach हों ,,,अंतिम यात्रा अकेले ही करनी है ,,,,और साथ कुछ नहीं जाने वाला,,,,यहाँ तक की अपना शरीर भी मिटटी में मिल जाना है ,,,,,यदि साथ कुछ जाना है तो वह केवल हमारे कर्म हैं ,,,,कर्म यानि जो बोला , जो किया और जो सोचा ,,,,हमारी सोच ही हमारा सबसे बड़ा कर्म है ,,,,हम पहले सोचते है ,फिर बोलते हैं और उसके बाद action होता है ,,,,,,इसलिए ज़रूरी है की हम अपने विचारों पर नज़र रखें क्योंकि  यही  एक ऐसा सामान है जो अंतिम  यात्रा 
में साथ जाएगा ,,,,,,,,,,,,,जाने क्या ले जाएँगे  हम इसी अटूट सत्य को सामने लाता है ,,,,,,,


सिमी मदन मैनी 

Monday, 14 July 2014

                                  शिकवे  से  शुक्राने  तक  का  सफर


पूजा अर्चना तो हम सभी करते हैं ,,,,वो पिता है तो दिल की हर बात भी उससे होती है,,,,मुझे याद है कि  अक्सर मैं उसे एक छोटा थैंक्स कह कर मन की बात को आगे बढाती थी ,,,,ऐसा क्यों होता है ? वैसा क्यों हुआ? उसने ऐसा क्यों किया? यह वक़्त पर क्यों नहीं हुआ ? ,,,,,और भी ना जाने क्या क्या ,,,,,मुझे कभी महसूस नहीं हुआ था कि यह बातें शिकायत हैं ,,,,मैं  तो इन्हें दिल की बात समझती थी ,,,,,,,,बस बात कहती चली जाती और लिस्ट बढ़ती चली जाती ,,,,जीवन प्रश्नों  से भर गया ,,,,,,,,और जवाब देने वाला कोई नहीं ,,,,,या फिर अप्रत्यक्ष रूप में सभी जवाब मिल रहे थे ,,,पर मेरी खुद की क्षमता उन्हें देखने , सुनने, और समझने की नहीं थी ,,,,,फिर जीवन में एक मोड़ आया ,,,,मैंने  सिस्टर शिवानी का कार्यक्रम आस्था चैनल पर देखा ,,,,और उस  बीस मिनट के कार्यक्रम ने जीवन , आत्मा और ईश्वर के प्रति मेरे दृष्टिकोण को बदल दिया ,,,,दिन के  तीन से चार घंटे यह कार्यक्रम देखना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया ,,,,,,,,अब तन की सफाई से पहले मन की सफाई नित नियम बन गया ,,,,मैंने महसूस किया की परमात्मा चाहे तो किसी यंत्र  को भी  जरिया बना कर आपकी मदद कर सकता है ,,,,,,,बस आपकी चाह सच्ची होनी चहिए ,,,,


परिस्थितियाँ  वहीँ थी पर देखने और समझने का नज़रिया  बदल चुका  था ,,,,,जान चुकी थी कि  बदलाव मुमकिन है ,,,,,,अब  कुछ भी अप्रिय घटता तो मुख से यही निकलता " परमात्मा तेरा शुक्र है " ,,,,,

when someone  criticizes me i overcome criticism
when someone insults me i overcome insult
when someone ignores me i overcome ignorance
when someone hurts me i overcome pain
when someone is jealous of me i overcome  jealousy  and feeling of competition
when i loose a  close relation or possession   i overcome attachments
when i or  my idea is being rejected i overcome rejection
when i am  not able to achieve,,,may be it is not the right time

ऐसे जाने कितने ही पाठ हैं जो वक़्त और परमात्मा ने पढ़ाए ,,,,,,शुक्राना सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि ऊर्जा है जो ब्रह्मांड में वेग से बहती है ,,,पिता से कहती है शुक्रिया तुमने जो भी दिया , जब भी दिया ,,,,तुमसे बेहतर कोई नहीं जानता संतान को कब , क्या  और कितना देना है ,,,,,,,,,

इसी शुक्राने का जादू जीवन में फ़ैल गया  और " रब्बा तेरा शुक्राना "  भजन बन गया ,,,,,,,,,,,,,,




Sunday, 13 July 2014

                     
                                                               सपने

अक्सर आस पास सुनने को मिलता है ,,,अब हमारा क्या है ? ,,,,हमारा वक़्त बीत गया ,,,,अब तो बच्चे ही कुछ करेंगें ,,,,my son or daughter is living my dream ,,,,,पर क्या यह सच है ? क्या हमारी संतान हमारे सपनो को पूरा करेगी ? क्या यह सोचना जायज़ है ? मुझे लगता है जब हम अपने सपनो की ज़िम्मेदारी खुद नहीं ले पाते तो अपने सपनो का बोझ अपने बच्चों पर लाद देते हैं बिना यह विचार किये कि बच्चों की अपनी ख़्वाहिशें हैं अपने ख़्वाब हैं ,,,,या फिर हम अपने सपने को खुद ही नहीं पहचान पाते ,,,,,,,,,क्या हम जानते हैं हम किस काम की लिए बने हैं?  ,,,,किस काम में बेस्ट हैं  ? ,,,या फिर रोज़ी रोटी और लोकचारी  हमारे काम को तय  करती है ? ,,,क्या हम अपने सपने का सम्मान करते हैं ? अगर हाँ ,,,,तो दुनियाँ  की कोई ताकत उसे पूरा होने से नहीं रोक सकती ,,,,,अपने सपनो से कभी समझौता मत करो ,,,,यह सपने ही हैं जो कभी हकीकत बात जाते हैं ,,,,,,


एक दिन मैंने भी एक ख़्वाब देखा ,,,,,,रास्ता मुश्किल था ,,,,कोई short cut नहीं था ,,,पर मंज़िल तय थी ,,,,सपना शिक्षा का ,,,,शिक्षा सिर्फ किताबों को रट लेना नहीं है बल्कि जीवन में हर हालत में आगे बढ़ना है ,,,,आप जिस भी काम में अच्छे हैं उसमें महारत हासिल करना है ,,,,,,मुझे याद है मैंने जब संगीत सीखना शुरू किया तो घर में कई बार सब मज़ाक भी उड़ाते थे ,,,,पर मुझ पर वो शब्द कभी हावी नहीं हुए ,,,,सपने की शील्ड होती ही इतनी मज़बूत है ,,,,सपनो के  मैदान में में दौड़ तो नहीं पायी पर कदम कभी रुके नहीं ,,,,बस चलती रही ,,,,कई बार कई बार सब पूछते  " यह जो सब सीख रही हो बरसों से ,,करना क्या चाहती हो ? " अंतर से हर बार आवाज़ आती मैं  अपना सपना पूरा कर रही हूँ ,,,मैं  इसी के लिए बनी   हूँ ,,,,,RESPECT YOUR DREAMS,,,,,,DARE TO DREAM ,,,,,अपनी एक रचना आप सब के साथ बाँट रही हूँ ,,,,,

Thursday, 10 July 2014

सभी मित्रों को मेरा प्यार भरा  नमस्कार ,

कहते हैं खुशियाँ बांटने से बढ़ती हैं तो मैंने सोचा की क्यों ना मैं  भी आप के साथ अपने दिल की बात और एक छोटी सी सफलता बाँट लूँ ,,,, मैं  सिम्मी मैनी एक ग्रहिणी ,माँ , पत्नी ,बेटी ,बेहन , बहु और दोस्त हूँ ,,,,,जाने कितने ही रिश्ते है जो शब्दों  में बाँधे नहीं जा सकते ,,,,,इन्ही रिश्तों को निभाते हुए अपनी आम सी ज़िन्दगी में मैंने एक खास सपना देखा जो अपनों की दुआओं और परमात्मा की असीम कृपा से पूरा हुआ ,,,,मेरी एक ऑडियो cd  जिसमें की नौ भजन हैं वीनस कंपनी द्वारा रिलीज़ की गयी है ,,,यह भजन मैंने ही लिखे हैं ,,,इनकी धुन भी मैंने ही बनायीं है ,,,और परमात्मा की दया से यह गीत गए भी मैंने ही हैं ,,,,संगीत जसपाल मोनी जी ने दिया है और वीडियो यशुदास जी ने बनाया है ,,,,,इस एल्बम का नाम है  "जाने क्या ले जाएँगे  हम "  the ultimate truth of life 

इस एल्बम के सभी गीत अपने आप में जीवन दर्शन को समेटे हुए हैं ,,,,,यह दरअसल मेरे अनुभव हैं जो ईश्वर  के दिशा निर्देश  से भजन बन गए  ,,,यह भजन आप वीनस के offical site पर देख सकते हैं ,,,,इसके लिए आपको you tube पर simmi maini टाइप करना होगा ,,,,चाहें तो jane kya le jayenge hum भी टाइप कर सकते हैं ,,,,मुझे उम्मीद है की मेरी यह छोटी सी कोशिश आपके पसंद आएगी और शायद आपके जीवन में कोई सकारात्मक बदलाव ला सकेगी ,,,,,,,कृपा इस एल्बम को अपनी दुआएँ  और आशीर्वाद दें 

धन्यवाद 
सिम्मी मैनी 

Wednesday, 9 July 2014

                           
                                                 संगीत और लेखन की शुरुवात

इस जीवन यात्रा में हम सभी कोई ना कोई लक्ष्य अपने सामने लेकर चलते हैं ,,,, यही छोटे छोटे लक्ष्य जब पूरे होते  हैं तो हमारी यात्रा हमें आसान लगने लगती है ,,,, यह सपने ही हमें हमारी सम्पूर्णता , ताकत और गुणों  का  अहसास दिलाते हैं ,,,,इस जीवन में सुख , दुःख के कई स्टेशन आते हैं और हर स्टेशन पर  हम कोई एक पाठ  पढ़  लेते हैं ,,,,,मेरी जीवन यात्रा भी कुछ ऐसी ही है ,,,,मैं  सिम्मी मैनी एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी ,,,खेलते कूदते , पढ़ते लिखते जीवन तेज़ गति से भाग रहा था ,,,,छोटी छोटी आँखोँ में बड़े बड़े सपने थे ,,,किताबों से मुझे विशेष लगाव था ,,,,मैं  london  school of economics में पढ़ना चाहती थी ,,,,संगीत  बचपन से सदा दिल पर दस्तक देता  रहा पर  संगीत की कोई formal tranning नहीं थी ,,,,एक भावुक व्यक्ति होने के कारण विचारों का मंथन सदा मन में चलता रहा और बहुत बार कागज़ पर भी फ़ैल गया ,,,,मेरा संगीत और लेखन से सिर्फ इतना ही नाता था ,,,


बहुत बार हम जो सोचते हैं वैसा हो यह ज़रूरी तो नहीं ,,,,मेरी किस्मत और कर्म मुझे किसी और ही दिशा में लेजा रहे थे ,,,,कई नए रिश्ते मेरा इंतज़ार कर रहे थे और मात्र बीस वर्ष की आयु में मेरा विवाह हो गया ,,,,एक संयुक्त परिवार में अपने शिक्षा के सपने को अंजाम देना आसान नहीं था ,,,,साधन थे पर पढ़ने का वक्त नहीं था ,,,,वक्त बीतता चला गया और बीतते वक़्त के साथ में पत्नी से माँ बनी ,,,जिम्मेदारियां हर दिन वक़्त के साथ बढ़ रही थीं ,,,,किसी चीज़ की कमी नहीं थी पर अधूरी शिक्षा का सपना हर रोज़ भीतर से आवाज़ लगा रहा था ,,,विवाह को दस वर्ष बीत चुके थे ,,,एक दिन मेरे बच्चों के संगीत शिक्षक से बात करते हुए मैंने उन्हें बताया कि  मैं भी संगीत सीखना चाहती थी ,,,,बस वहीँ से मेरी संगीत की शिक्षा आरम्भ हुई ,,,शिक्षा और संगीत की तरफ रुझान इस यात्रा को रोमांचक बना रहा था ,,,रायज़ का बहुत वक़्त तो नहीं मिलता था पर चलते फिरते , खाना बनाते , उठते बैठते कुछ ना कुछ गुनगुनाती रहती थी ,,,आज सोलह वर्ष हो गए संगीत से जुड़े और वक़्त का पता ही नहीं चला ,,,,


                                                        लिखने  की प्रेरणा

हर व्यक्ति की जीवन में एक ऐसा मोड़ आता है जब वो स्वयं को भीड़ में अकेला पाता  है ,,,और वो समय खुद से बात करने का होता है ,,,भीतर झाँकने का होता है ,,,और यही  सब करते हुए हम उस परमपिता परमात्मा से कैसे जुड़ जाते हैं पता ही नहीं चलता ,,,,,मेरा ऐसा मानना है की जीवन के सबसे कठिन दौर और परिस्थितियों में हम सबसे अधिक सफलता पा सकते हैं ,,,,इस समय में या तो हम बन जाते हैं और या फिर हम बिगड़ जाते हैं ,,,,यह इस बात पर निर्भर करता है की हम किस दिशा का चुनाव करते हैं ,,,,,,मेरे जीवन में भी एक ऐसा वक़्त आया जब स्वयं को परखने का मौका मिला ,,,,हर चीज़ जैसे हाथों से फिसल रही थी ,,,,,,कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या करना चाहिए ,,,,निर्णय लेना कठिन था ,,,,कड़वे सच का एक एक पन्ना  धीरे धीरे नज़रों के सामने खुल रहा था ,,,,और इसी समय में जैसे हर पल उससे बात होने लगी ,,,लगता की जैसे वो अदृश्य होकर  भी सामने है और मार्गदर्शन कर रहा है ,,,,जैसे भीतर बैठ कर वो हर बात का जवाब दे रहा था ,,,,,यही बातचीत कब भजन बन कर कलम के ज़रिये कागज़ पर उतर गए ,,,,मैं खुद नहीं जानती ,,,दरअसल यही बातचीत आप इस एल्बम में सुन पाएंगे  जिसका नाम है  "जाने क्या ले जाएँगे हम ",,,,सो ईश्वर ने स्वयं जैसे मेरा हाथ थाम  लिया  और लिखने को प्रेरित करते रहे ,,,,,,,,,,,



                                                 एल्बम बनाने का ख्याल कैसे आया ?

बहुत  अरसे  से गुनगुना भी रही थी और लिख भी रही थी ,,,संगीत और लेखन मेरे जीवन का अटूट हिस्सा बन चुके थे पर cd  बनाने का ख्याल कभी मन में नहीं आया था ,,,कुछ रोज़ इस तबियत बिगड़ रही थी ,,,मैं एक दिन डॉक्टर के पास गयी और उन्हें बताने लगी की मेरा वज़न १० किलो बढ़ गया है ,,,शायद बढ़ती  उम्र के साथ कोई harmonal disbalance है ,,,अभी मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी की डॉक्टर साहिब ने पूछा  "आप क्या करती हैं ?",,,,,मैंने जवाब में उन्हें बताया कि  मैं एक house wife हूँ ,,,,डॉक्टर साहिब मुझे इस तरह देखने लगे जैसे मैंने कोई पाप कर दिया हो और छूटते ही  बोले " बस करना क्या है सारा दिन ,आराम करो ,खाना खाओ और बेकार के टीवी  सीरियल  देखो ,,,,,वज़न तो बढ़ना ही है ",,,,,,,,,,,डॉक्टर साहिब ने जैसे किसी घाव को कुरेद दिया था ,,,,मैंने उनकी फीस दी और क्लीनिक  से बाहर निकल आई ,,,,मन में हलचल थी ,,,और अतीत की फिल्म मन की परदे पर चल रही थी ,,,,मैं सोचने लगी की क्या मैं घर पर इसलिए हूँ की काबिल नहीं हूँ ? या फिर इसलिए की दूसरों को काबिल बनाने की क्षमता है मुझमें ? लोग इतनी आसानी से कुछ भी कह देते हैं ,,,,,एक औरत अपने सपने , सोच सब कुछ पीछे छोड़ देती है क्योंकि वो दूसरे  के सपनो को अपने पसीने और मेहनत  से  सींचती है ,,,,,,,,,,,,,डॉक्टर साहिब से यह मुलाकात मन में चुपचाप बैठे सपने को आवाज़ लगा गयी ,,,,और मैंने महसूस किया की आती जाती हर सांस के साथ शायद मैं उस सपने को जी रही थी ,,,,और एल्बम बनाने की सोच ने जड़ें पकड़ ली ,,,,क्योंकि आपसे दिल की  बात बाँट रही हूँ तो अपनी एक प्रिय  रचना आपके साथ   शेयर कर रही हूँ -


                                             आम ग्रहिणी

आएँ  मुझसे मिलें
मैं हूँ एक आम ग्रहिणी
रसोई में काम करती
पसीने में तरबतर
राजमां और पालक पनीर की सुगंध
मुझे कई बार स्वपनलोक में ले गई
मैंने कई बार बेलन को माईक
और थाली को ढफ़ली बनाया
जब बच्चों को सच बोलना सिखाया
तो देश के आने वाले सुन्दर भविष्य की
कल्पना की मैंने
घर में झाड़ू लगाते हुए '
कई बार पाया
जैसे मैं  समाज की बुराइयों को
दूर हटा रही हूँ
निचुड़ते कपड़ो से निकली
पानी की धार
और झाड़पोंछ  से उड़ती मिट्टी  में
मैंने जो सपने संजोये
आज उन्हें  हकीकत में बदल डाला
क्योंकि आज होंसला है मुझमें
सपने देखने का
आगे बढ़ने का
और कुछ कर दिखाने का
आएँ मुझसे मिलें
मैं हूँ
एक आम ग्रहिणी

सिम्मी मैनी







Sunday, 6 July 2014

नमस्कार

आज आप सभी के साथ अपनी एक छोटी सी  उपलब्धी  बाँटना  चाहती हूँ ,,,,बरसों की मेहनत  के बाद मेरी  एक  cd   वीनस कंपनी ने रिलीज़  की है ,,,,इसमें नौ  आध्यात्मिक गीत है ,,,,यह भजन मैंने ही लिखे हैं ,धुन भी मेरी है और गाए भी मैंने ही हैं ,,,,,यह सभी गीत आप you tube पर भी देख सकते हैं ,,,,इसके लिए आपको you tube  पर simmi maini टाइप करना होगा ,,,,इस एल्बम का नाम है  " जाने क्या ले जायेंगे हम ",,,,,,इसी एलबम का एक गीत  आपके साथ बाँट रही हूँ ,,,,शायद आपको पसंद आये ,,,,,,


                             जाने क्या ले जायेंगे हम


जाने क्या ले जाएंगे हम
जब इस दुनियां  से जायेंगे
बंद मुठ्ठियाँ खुल जाएँगी
कोई बोल बोल ना पाएँगे
जाने क्या ,,,,,,जाने क्या


ढूंढेगे  हम तब कुछ ऐसा
जो अपने संग जाए
महँगे कपडे या गहने ले लें
जो थे मन को भाए 
ना संग चलेंगे महल चौबारे
ना ही भाई बहनें
जाने क्या ,,,,,जाने क्या


जिस तन का श्रृंगार किया था
जिस घर को कभी संभाला था
जिस धन को कभी समेटा था मैंने
जिन रिश्तों में रस डाला था
देखो सब कुछ छोड़ चले हम
कोई काम ना आया
जाने क्या ,,,,,जाने क्या


सत्संग किया होता हमनें
तुमनें तो बहुत समझाया था
तेरा नाम लिया होता हमनें
यह जग तो बहुत पराया  था
अब संग चलेंगे कर्म हमारे
अपना साथ निभाने

बस यही ले जायेंगें हम
जब इस दुनियां से जायेंगें
बस यही ले जाएंगें हम
बस कर्म ले जायेंगे हम

 सिम्मी मैनी



Friday, 13 June 2014

फिल्म (film)



                     फिल्म (film)


ज़िन्दगी के इस बड़े परदे पर 
अनगिनत कलाकार हैं ,,,,
कहानी के आधार पर 
हर किसी का आना जाना 
पहले से तय है 
कुछ  कलाकार लीड रोल (lead role ) में 
तो कुछ गेस्ट एपियरन्स(guest appearance)
मुझे मिला है मेन  रोल (main role)
सभी कहानी के मुताबिक 
सिर्फ अपना पाट बजाते हैं 
कहीं कोई कमी नहीं 
कोई फरेब करता है 
तो कोई राजनीति 
कोई सहारा देता है 
तो कोई साँसे भी 
छीन लेता है 

पर गुस्सा और गम कैसा ?
ज़िन्दगी की फिल्म मनोरंजक हो 
इसलिए इसमें 
हर पात्र ज़रूरी है 
मज़े की बात यह है 
की इस फिल्म में 
मैं अपना रोल 
अपनी सोच से गढ़ सकती हूँ 

अगर मैं एक 
कामयाब कलाकार हूँ 
तो क्रियेटिव (creative)  भी हूँ 
और जानती हूँ 
सामने वाले कलाकार को 
कैसे संभालना है 
अगर मेरा डील (deal) करने का तरीका 
घिसा पिटा नहीं है 
और रास्ता सही है 
तो  मेरी  ज़िन्दगी की फिल्म 
सुपर डूपर हिट है 

सिम्मी मैनी 
13/06/2014

 

Sunday, 8 June 2014

कठिन परिस्थितियाँ (difficult situations)


       कठिन परिस्थितियाँ  (difficult situations)

परिस्थितियाँ  भी अजीब हैं
एक तिलस्मी आईने की तरह
जब सहज हैं
तो मेरा अक्स धुँधला है
और ,,,,
जब कठिन हैं
तो मेरा अक्स
साफ़ नज़र आता है

इस कठिनाई में
पहचान हो जाती है खुद से
अपनी हर खूबी और खामी से
अपनी परखने
और ,,,
निर्णय करने की शक्ति से
अपने हर रिश्ते से
और अपनी ताकत से

यह जादुई परिस्थितियाँ
कहीं कर्मों के खाते में
कैद होती हैं शायद
और सही वक़्त आने पर
जीवन के सहज रूप से
बहते दरिया में
चट्टान बन कर आती हैं
और,,,,,
 हिम्मत की छलाँग  लगाकर
 हम पार होना
सीख जाते हैं

सिम्मी मैनी
08/06/2014

Friday, 6 June 2014

ज्वालामुखी ( volcano)

   

    ज्वालामुखी ( volcano)

हम शान्ति   की खोज
करते  करते
 कई बार
खामोश हो जाते  हैं
इस चुप्पी में ढूँढ़ते हैं
असीम शान्ति  को
हाँ ,,,,,,
मौन तो ज़रूरी है
शांति के लिए
पर ज़ुबाँ का नहीं
बल्कि मन का

सिर्फ शब्द नहीं
मन में निरंतर बात करते
संकल्प  सोने चाहियें
जानते हैं उनके सोते ही
भीतर से फूटेगी
शांति की अमृतधारा
और ये आत्मा
पवित्रता में नहा जाएगी
वरना तो ,,,
 खामोश शब्दों का ज्वालामुखी
धधकता रहेगा  अंतर में
और मन और आत्मा
दोनों को सुलगाता रहेगा

सिम्मी मैनी
06/06/2014



Friday, 30 May 2014

कहानीकार ( scriptwriter)

 

                 कहानीकार ( scriptwriter)

हम सभी
कहानियाँ  गढ़ने में माहिर हैं
सबके अंदर एक कहानीकार
छिपा  बैठा है
जो अंदाज़े लगाता  है
वो ऐसा होगा,,,,,
वो वैसा होगा ,,,,,,
ऐसा ही हुआ होगा ,,,,,
वो ऐसा सोचता होगा,,,,
जान बूझ कर ऐसा किया होगा ,,,,
सभी तो अपनी सोच के घोड़े
दौड़ते हैं ,,,
कल्पनाओं की कच्ची धरातल पर

और इसी बेबुनियाद फ़र्ज़ी ज़मीन पर
ज़िन्दगी के कड़े फैसले होते है जब
तो,,,,,,
सिवाय दुःख के
और कुछ नहीं देते
कहानियाँ जो बड़े परदे पर हिट होती हैं
वास्तविक जीवन में
पैरों तले  की ज़मीन खींच लेती हैं
और इंसान
टूटे रिश्तों की बंजर ज़मीन पर
अकेला हो जाता है

सिम्मी मैनी
30/05/2014

Tuesday, 27 May 2014

   

               मसाले  (spices)

वही  रसोई में
तेज़ी से काम करते हाथ
और मसालों की शेल्फ पर
कुछ मसाले ढूँढ़ते नज़रें
हर रोज़ वही बोर खाना
कहाँ रख दिए वह खास मसाले ???
जो कभी कभी काम आते हैं
अस्त व्यस्त इस शेल्फ में
भला अब कहाँ मिलेंगे


शेल्फ की सफाई करते
 सोच  रही हूँ
मंन की शेल्फ को भी कभी
साफ़ नही किया
उसमें भी  तो दुःख ,दर्द
नफरत,नाराज़गी और
ईर्ष्या के मसाले सबसे आगे हैं
शायद तभी ज़िंदगी नीरस है

कहीं पीछे धूल  में छिपे बैठे हैं
प्रेम,शांति ,पवित्रता और
ख़ुशी की मसाले
चलो कुछ पल एकांत में बैठ
मन की शेल्फ को साफ़ कर लूँ
और इन सभी खोए मसलों को ढूँढ कर
सुख के ऐसे व्यंजन बनाऊँ  कि
जीवन स्वादिष्ट हो  जाए

सिम्मी मैनी
28/05/2014


Sunday, 25 May 2014

 
हमेशा से सुनते आये कि अपने शब्दों का चुनाव समझदारी से करो क्योंकि यह शब्द ही है जो किसी को पल में अपना और पल में परया कर देते हैं ,,,यह शब्द ही है जो किसी  को  आकाश की ऊँचाइयों में तो किसी को पाताल की  गर्द  में पहुँचा  देते है ,,,,यह शब्द ही हैं जो किसी को कामयाब तो किसी को नाकामयाब बना देते हैं ,,,,हर  शब्द अपने आप में हमारी सोच  की ऊर्जा समेटे हुए है ,,,,

       बाँध ( DAM )

जब किसी की ज़ुबाँ  से
फिसलते हैं शब्द
तो क़यामत आती है
आत्म नियंत्रण की
कच्ची दहलीज़ को तोड़ते
जा गिरते हैं वक्त की
गहरी खाई में
और किसी अपने के मन को
घायल करते हैं
तीर की तरह भेद देते हैं
दिलों को ,,,
और लाख चाहने पर भी
कमान में वापिस नहीं आते
यूँ तो मन में बहुत से शब्द रहते हैं
और बड़ी रफ़्तार से दिन रात
नदी के तेज़ धारे  से बहते हैं
पर यदि ,,,
धीरज और समझदारी का बाँध पक्का हो
तो विकराल बाढ़  का रूप लेकर
रिश्तों की फसल को
बर्बाद नहीं करते

सिम्मी मैनी
26/05/2014

Saturday, 17 May 2014

रिश्ता दोस्ती का

   
    रिश्ता  दोस्ती का

सुना है ,,,
रिश्ते ऊपर से बन कर आते हैं
जो  जीवन का अटूट हिस्सा
हो  जाते हैं,,,
और खून के रिश्ते कहलाते हैं
पर एक रिश्ता
जो इनसे भी ऊपर है
जो मेरे ख्यालों में  रहता है
जिसे में खुद ढालती हूँ
और सजाती ,सँवारती  हूँ
बन जाता है ,,,,
रिश्ता दोस्ती का

जाने क्यों ?
तुम्हारी हर बात प्यारी लगती है
तुम में कभी कोई कमी नज़र नहीं आती
बिना रुके घंटों
तुमसे दिल की हर बात कर सकती हूँ
जानती हूँ कोई मुझे भी  सुनता है
 ठीक और गलत के तराज़ू में तोले  बिना
जाने कैसे तुम कैसे ?
मेरे दिल की हर बात
मेरी सांसों से पहचान  लेती हो

कभी मेरी छोटी सी गलती पर
गुरु की तरह करारी फटकार लगाती हो
तो कभी ,,,,
मेरी छोटी से उपलब्धी पर
माँ की तरह  पीठ थपथपाती हो
कैसे तुम मुझे मेरी ही नज़रों में
ऊँचा उठा देती हो

यह अटूट विशवास ही तो है तुम पर
कि  बिना सोचे और सवाल किये
तुम्हारे एक इशारे पर
 अंगारों पर भी चल सकती हूँ
ऐ दोस्त !
तुम्हे बस इतना कहना है कि
तुम मेरे कई जन्मों के
श्रेष्ठ कर्मों का फल हो ,,,,,

सिम्मी मैनी
17/05/2014





Friday, 16 May 2014

काहे चिंता करे तू प्राणी

      काहे चिंता करे तू प्राणी

काहे  चिंता करे तू प्राणी
अपने चिंतन में उसको बसा ले

बीती बातों की धूल उड़ा दे
कल क्या होगा ये कौन जाने
आज तेरा है
क्यों तू गवाएँ
अपने जीवन को जन्नत बना ले

क्यों घायल है यह मन बता दे
दर दर पे सुकून तलाशे
सच्चे मन से तू चल साथ उसके
भर अपना तू उसको थमा  दे

जो लुटा  है वो तेरा नहीं था
जो तेरा है मिलना है तुझको
बीज जैसा भी बोया था तूने
फल वैसा ही तू आज पा ले


काहे  चिंता करे तू प्राणी

सिम्मी मैनी
16/05/2014 ( एक पुराना  गीत जो मेरे दिल के बहुत करीब है )

Thursday, 15 May 2014

मेकअप

   
          मेकअप

कल रात पार्टी में मुलाकात हुई
चलते फिरते मोम के पुतलों से
मुस्कुराते चेहरे और उन पर
मेकअप की गहरी परते
त्वचा के हर श्वास छीनता 
और
चेहरे के दाग धब्बों को छिपाने की
नाकामयाब कोशिश करता पाउडर
पसीने से लड़ कर बाहर झांकती त्वचा
जो शायद आज़ादी की सांस लेना चाहती है

सोचती हूँ यह मेकअप शायद पल भर को
 चेहरे की कुरूपता को ढक भी ले
पर आत्मा पर जो
दान,ढोंग ,ध्यान ,राजनीति और धर्म का
मेकअप लगाया है
वो भला
 ईर्ष्या , नफरत ,दिखावे और द्धेष के धब्बों  को
कब तक और कैसे छिपा  पाएगा ?
कभी तो सच के पसीने से
दिल दहला देने वाली असलियत से
सामना हो ही जाएगा
इसलिए चेहरे और आत्मा पर
जितना मेकअप कम हो उतना ही  अच्छा
क्योंकि
कृत्रिम सुंदरता शरीर और आत्मा दोनों को
और अधिक कुरूप बना देती है शायद ,,,,

सिम्मी मैनी
16/05/2014

Monday, 12 May 2014

ऊर्जा (energy)



        ऊर्जा ( energy)

आज फिर एक नई सुबह
 चाय के प्याले के साथ
सोफे पर बैठी मैं
और
वही अनगिनत विचारों की
उठती तरंगें
लगता है जैसे
हर दीवार ,फर्नीचर , झूमर
और तस्वीर
मुझसे बात करने लगी है
कुछ प्रेम और सुकून कि तरंगें हैं
जो बह कर मुझ तक आ रही हैं
मैं हैरान सी
उन सब को देखती हूँ
ऐसा भी होता है कभी ?
भला ईंट , पत्थर , लकड़ी
और कांच भी  कभी बात करते हैं ?
तभी दीवार मुस्कुरा कर कह्ती  है
क्यों नहीं ?
जो विचारों की  ऊर्जा तुम हमें देती हो
वही लौट कर तुम तक वापिस जाती  है
तभी तो मन्दिर ,मस्जिद ,गुरूद्वारे में
तुम्हे सुकून मिलता है
हम भी भाव  और सोच पढ़ लेते हैं
अगर तुम्हारी सोच पवित्र है
तो तुम्हारा घर ही  मन्दिर है
मेरा  श्रद्धा से नतमस्तक  हो जाती हूँ
जैसे घर में उस  प्रभु से मिलन हो गया

सिम्मी मदन  मैनी 
13/05/2014



Sunday, 11 May 2014

दरिया

 

          दरिया

आज फिर एक  ख्याल ने
दिल पर दस्तक दी है कि
गर में इक दरिया हूँ
तो मेरा काम बहना है
बिना रुके ,बिना थमे
हर पल , हर क्षण
सिर्फ मंज़िल कि और बहना
इस बहते जीवन में
रिश्तों के  कई मुकाम आते हैँ
कुछ चट्टान बन राह रोकते है
और कुछ
लक्ष्य कि ओर  पहुँचाते हैं
कर्मानुसार इन रिश्तों से
मिलने और बिछड़ने का समय
पहले से निर्धारित है
उसमें कोई चूक नहीं
हर रिश्ता मुसाफिर  के सफ़र मेँ
आने वाला एक स्टेशन है
बस घडी भर रुकना है और
आगे  बढ़ जाना है
यह जान कर भी
इन रिश्तों में मोह
और दोषारोपण कैसा ?

सिम्मी मैनी
12/05/2014

Wednesday, 7 May 2014

माली

कई बार सोचती हूँ कि हम जीवन में आगे बढ़ जाते है , किसी बडे मुकाम पर भी पहुँच  जाते है और प्रशंसा और रुतबे को गले से लगा  लेते है पर उस मुकाम तक पहुंचने के लिये जिन सीढ़ियों का इस्तेमाल करते है क्या हम  उन्हे याद रखतें हैँ l हमारे जीवन में कई रिश्ते हमें प्रेम, सहायता और समझदारी  से सींचते है जैसे माँ बच्चे को निस्वार्थ प्रेम के झूले में झुलाती है ,गुरु शिष्य को आगे बढ़ाने में अपना सर्वस्व ज्ञान उस पर लुटा देता है और सच्चे दोस्त सदा  होंसला  बढाते  हैं और बिना कहे ही  दिल की छोटी से छोटी  बात समझ लेते हैं l मेरी यह रचना इन्ही महान रिश्तों को समर्पित --

                     माली

फूल की खुशबू
बिखर जाती है सदाओं में
और हर कोई उसे देख
मंत्रमुग्ध  हो जाता  है
प्रभु के चरणों में
चढ़ जाता है गर्व से
और
अपने अस्तित्व पर इतराता है
नाम और मान का चाँद भी  चमकता है
इस पुष्प के जीवन में
और उसकी चांदनी में
चुपके से अमर हो जाता है
पर जो सींचता है
अपने खून पसीने से
इस सुन्दर वृक्ष को
ताकि
यह सुमन जन्म ले सके
जाने वो माली
प्रशंसा की भीड़ में
कहाँ खो जाता  है ?

सिमी मदन  मैनी
08/05/2014






Monday, 5 May 2014

जवाबदारी


     
जवाबदारी

आप ही बतलाईये ज़रा
भला प्रेम और डर भी क़भी
एक मायन में रह सकते हैं ?
फिर क्यों कहते हैं हम कि
कुछ  भी करने से पहले
उस ऊपर वाले से डरो

कमाल है
उससे डरे ,,वो जो
पिता है
दया का सागर है
बिना किसी शर्त के
आपार प्रेम करता है हमसे
सच मानिए
यदि ऐसा है तो
पिता और सन्तान के सम्बन्ध पर
एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है

जहाँ डर है
वहां कैसे होगी
उससे दिल की  बात
और फिर रिश्ते में
दरार तो आ ही  जाएगी
इसलिए डरो मत
बस इतना सोचो कि
अपने हर कर्म की जवाबदारी
अपने उस पिता को देनी है
फिर देखना
हमारी यही सोच हमे सदा
सही रास्ता दिखलाएगी
और उसके साथ हमारा रिश्ता
अमर हो जाएगा

सिम्मी मदन  मैनी 
06/05/2014

Friday, 2 May 2014

ज़िंदगी एक पैकेज

         
       
ज़िंदगी एक पैकेज
   

ज़िन्दगी एक पैकेज है
अच्छे और बुरे का
इसमें खटास है उन परिस्थितियों की
जो मुझे पल में गिरा दें
और मिठास उन घटनाओं की
जो सातवें आसमान पर बिठा देँ
कुछ रिश्ते जो अंतर को
प्रेम से भर दें
और कुछ लोग जो
भीतर तक खोखला कर दें

बड़ा गहरा संतुलन है
सुख और दुख का
और यह तराज़ू परमात्मा के हाथ
जो मेरे कर्मों के बेहिसाब खातों को
शिद्दत से संभालता है
जब दुख से सामना होता  है
और साँस घुटने लगती है तो
सुख का मरहम लग कर
रिसते घाव भर देता  है


पिता है तो सब जानता है कि
बारी बारी से
मेरे कर्मों के खाते से
कब , क्या  और कितना देना  है
क्योंकि
इस शरीर में उसे मुझे तब तक
ज़िंदा रखना है
जब तक
मैं  इस जीवन का अन्तिम पाठ
ना  पढ़ लूँ

सिम्मी मदन  मैनी 
03/05/2014


ध्यान


 
     
ध्यान

हर दर पर जाकर
अपने प्रश्नों के उत्तर ढूँढे
और हर दर से ख़ाली लौटी हूँ
पल भर को शांती  से बैठ
अंतर में उठते इस शोर को
सुनने लगती हूँ
तो जान  जाती हूँ कि
विचारों की इस तेज़ आंधी मेँ ही
छिपा है सत्य कहीं

संकल्पों के इस बवंडर के
मध्य में जाकर टिक जाती हूँ
ध्यान में बैठ
विचारों का मंथन करती और
इनकी रफ़्तार को कुछ धीमा करती हूँ
तो अपने हि अस्तित्व की परतों के
पार निकल जाती हूँ
जहाँ असीम शांती है
प्रेम है
और मानस पटल पर
उन सभी सवालोँ के जवाब
साफ़ साफ़ दिखाई देने लगते हैं
जिनकी मुझे कब से तलाश थी

सिम्मी मदन  मैनी  
02/05/2014

Thursday, 1 May 2014

मंजिल

 
   
मंजिल


भागती  दौड़ती  इस भीड़  में
जहाँ सब एक दूसरे  को  देख कर
कदम बढ़ाते हैं
पास हो कर भी
इकदूजे  से दूर होते हैं
वहां मैं कई बार
अकेली पड़ जाती हूँ

ख़ामोशी से सभी को
बहाव के साथ
बहते देखती हूँ
रस्ता आसान लगता हैं
पर चाह कर भी मैं
उस पर चल नहीं पाती
जाने क्यों हर बार
विपरीत दिशा में बहने का
चुनाव कर लेती हूँ मैं

अकेले बहना आसान नहीं होता
चुप्पी  डसने लगती  हैं
और मैं अंतर में उतर कर
अपनी कमी खोजने लगतीं हूँ
बार बार बात करती हूँ ख़ुद से
कहीं साथ चलने में मुझे
परहेज़ तो नहीं
और तभी भीतर से एक आवाज़ आती हैं


किन हँसते मुखौटों को  देख़ विचलित  हो
ग़ौर से देखो उन्हें
 उन सबने  किसी हौड़ मेँ
अपने अस्तित्व को  खो दिया
और रहा सवाल तुम्हारे रास्तें क़ा
कठिन रास्तों पर चलने वाले ही
ख़ूबसूरत मंज़िलों के मालिक होते हैं

सिम्मी मदन  मैनी