नमस्कार ,,
कल बाबा बुलेशाह का एक कलाम गुनगुना रही थी ,,,,,,,,,,,,,कितनी गहराई है उनकी बातों में ,,,,,,,सोचा आप सबके साथ बाँट लूँ ,,,,,,,," जाग बिना दुद जमदा नाहीं , पावें लाल होवे कड कड के ",,,,,,,,,बड़ी ही गहरी और सुन्दर पंजाबी की पंक्ति है जिसका अर्थ है चाहे दूध को आंच पर कितना ही लाल कर लेँ दही ज़माने के लिए उसमें थोड़ा दही मिलाना पड़ता है ,,,,,,,,,, आज दिन तक बहुत ज्ञान सुना ,,,,,,,भारी भरकम ग्रन्थ पढ़े ,,,,,नियमित रूप से मंदिरों में हाज़री लगाई ,,,,,,पूजा अर्चना की ,,,,व्रत रखें ,,,,,अपने अपने धर्म में बताये गए सभी नियमों का विधिवत पालन किया ,,,,,,फिर कैसे उस परमपिता से दूर हो गए ????,,,,,,कितनी ही कोशिश कर लें मक्खन से घी बनाने के लिए उसे आंच पर चढ़ाना ही पड़ता है ,,,,,,,,,,,उसी प्रकार कितना ही श्रेष्ठ ज्ञान सुन लें जब तक उसे जीवन में उतारने कीई क्षमता और साहस हम में नहीं है परमात्मा से दूरी बनी रहेगी ,,,,,,,,,,,आज हम गीता को सुनते हैं , गीता की नहीं सुनते ,,,,,,,महान ग्रंथों को सुनते हैं , महान ग्रंथों की नहीं सुनते ,,,,,माँ छोटे बच्चे को पढ़ा रही है " सदा सच बोलो " ,,,,और जैसे ही दरवाज़े पर दस्तक होती है हम उससे कहते हैं जाओ कह दो मम्मी घर पर नहीं है ,,,,,,,,,,उसके तुरंत बाद हम घर में जोत जगाते हैं ,,,,,,,,जितना श्रेष्ठ ज्ञान हमारे ग्रंथों में हैं उसकी एक बात को जीवन में उतारने में जन्मों बीत जाते हैं ,,,,,,,,,,,बचपन से सुनते सुनाते आये ,,,, सदा सच बोलो ,,,,,पर आज दूसरों से तो क्या ? खुद से भी सच नहीं बोल सकते ,,,,,,इसी लिए अपने आप से दूर हैं और सब कुछ होते हुए भी शांति और प्रेम का अनुभव नहीं करते और उसकी तलाश बाहरी चीज़ों में करने लगते हैं ,,,,,इसलिए जो भी सुनें और पढ़े उसे एक नियम समझ कर ना करें बल्कि उसपर वैचारिक मंथन ज़रूरी है अन्यथा यह स्वयं को ईश्वर को धोखा देना है ,,,,,,,,,
सिम्मी मैनी
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