नमस्कार ,,,,
कल कहीं से लौट रही थी तो मंदिर के बाहर फूल वालोँ को देखा ,,,,, फूल खरीदने वालों की लम्बी कतार थी ,,,,रंग बिरंगे फूलों में कमल के भी बहुत सुन्दर फूल थे ,,,,थोड़े महेंगे ,,,,कई लोग उन फूलों को खरीद रहे थे ,,,,श्रद्धा सुमन अर्पित करना चाहते थे परमात्मा को ,,,,मैं सोच रही थी कमल बाकी सभी फूलों से मेहंगा क्यों है ?,,,,,और हम इसे परमात्मा को क्यों अर्पित करते हैं जबकि यह कीचड़ की देन है ?,,,,,, शायद आज हम केवल एक रिवाज़ समझ कर पुष्प अर्पण करते हैं ,,,,,कमल एक ऐसा पुष्प है जो कीचड़ में पनपता है और अलग नज़र आता है ,,,,कीचड में रह कर भी वह अपनी पवित्रता और सुंदरता नहीं खोता ,,,,और इतना ही नहीं उसे देवी देवता के चरणों में अर्पित किया जाता है ,,,,,ठीक उसी तरह हमें भी किसी भी तरह के हालत और लोगों में अपनी अलग पहचान बनानी होती है ,,,,कमल बनना आसान नहीं ,,,,निंदा , दोषारोपण , सड़ी गली मान्यताओं और संकीर्ण सोच के कीचड में अपनी अलग पहचान बनाए रखना एक कठिन परीक्षा है ,,,,,जहाँ लोग सोचते कुछ और हैं और बोलते कुछ और हैं वहां हमारी चुप्पी हमें अकेला कर सकती है ,,,पर इसी में हम न्यारे और प्यारे बन सकते हैं कमल की तरह ,,,,अलग सोचने वाले ही अपना अलग मुकाम बना पाते हैं अन्यथा हम भी भीड़ का हिस्सा हैं ,,,,चूहों के रेस में अगर हम जीत भी गए तो भी चूहे ही रहते हैं ,,,,केवल वही बात कहें जो सोचते हैं अन्यथा चुप्पी बेहतर है और हर तरह की सड़ी गली बातें सुन कर स्वयं को कूड़ेदान ना बना लें ,,,,,आज सारा अटेंशन इस बात पर है की हम ऊपरी तौर पर कैसा व्यवहार करते हैं ,,,,कैसे शब्दों का चुनाव करते हैं ?,,,किस तरह चलते फिरते , उठते बैठते हैं ?,,,,,पर किस प्रकार सोचते हैं इस बात पर प्रश्नचिन्ह है ,,,,,,सोच ही व्यक्तित्व की जड़ है ,,,आज अगर हम किसी भी महान व्यक्ति को याद करते हैं तो उसकी सोच की वजह से करते हैं क्योँकि यह सोच ही है कर्म कराती है ,,,,,सोच एक ऐसी ऊर्जा है जो हमारे बोल से पहले सामने वाले तक पहुँच जाती है ,,,,और यही सोच या तो विध्वंस करती है और या तो निर्माण करती है ,,,,,,,,,,,,,,ईश्वर से सदा प्रार्थना करें की वह हमें इस कलयुगी कीचड में कमल बनने की शक्ति प्रदान करे,,,,
सिमी मदन मैनी
कल कहीं से लौट रही थी तो मंदिर के बाहर फूल वालोँ को देखा ,,,,, फूल खरीदने वालों की लम्बी कतार थी ,,,,रंग बिरंगे फूलों में कमल के भी बहुत सुन्दर फूल थे ,,,,थोड़े महेंगे ,,,,कई लोग उन फूलों को खरीद रहे थे ,,,,श्रद्धा सुमन अर्पित करना चाहते थे परमात्मा को ,,,,मैं सोच रही थी कमल बाकी सभी फूलों से मेहंगा क्यों है ?,,,,,और हम इसे परमात्मा को क्यों अर्पित करते हैं जबकि यह कीचड़ की देन है ?,,,,,, शायद आज हम केवल एक रिवाज़ समझ कर पुष्प अर्पण करते हैं ,,,,,कमल एक ऐसा पुष्प है जो कीचड़ में पनपता है और अलग नज़र आता है ,,,,कीचड में रह कर भी वह अपनी पवित्रता और सुंदरता नहीं खोता ,,,,और इतना ही नहीं उसे देवी देवता के चरणों में अर्पित किया जाता है ,,,,,ठीक उसी तरह हमें भी किसी भी तरह के हालत और लोगों में अपनी अलग पहचान बनानी होती है ,,,,कमल बनना आसान नहीं ,,,,निंदा , दोषारोपण , सड़ी गली मान्यताओं और संकीर्ण सोच के कीचड में अपनी अलग पहचान बनाए रखना एक कठिन परीक्षा है ,,,,,जहाँ लोग सोचते कुछ और हैं और बोलते कुछ और हैं वहां हमारी चुप्पी हमें अकेला कर सकती है ,,,पर इसी में हम न्यारे और प्यारे बन सकते हैं कमल की तरह ,,,,अलग सोचने वाले ही अपना अलग मुकाम बना पाते हैं अन्यथा हम भी भीड़ का हिस्सा हैं ,,,,चूहों के रेस में अगर हम जीत भी गए तो भी चूहे ही रहते हैं ,,,,केवल वही बात कहें जो सोचते हैं अन्यथा चुप्पी बेहतर है और हर तरह की सड़ी गली बातें सुन कर स्वयं को कूड़ेदान ना बना लें ,,,,,आज सारा अटेंशन इस बात पर है की हम ऊपरी तौर पर कैसा व्यवहार करते हैं ,,,,कैसे शब्दों का चुनाव करते हैं ?,,,किस तरह चलते फिरते , उठते बैठते हैं ?,,,,,पर किस प्रकार सोचते हैं इस बात पर प्रश्नचिन्ह है ,,,,,,सोच ही व्यक्तित्व की जड़ है ,,,आज अगर हम किसी भी महान व्यक्ति को याद करते हैं तो उसकी सोच की वजह से करते हैं क्योँकि यह सोच ही है कर्म कराती है ,,,,,सोच एक ऐसी ऊर्जा है जो हमारे बोल से पहले सामने वाले तक पहुँच जाती है ,,,,और यही सोच या तो विध्वंस करती है और या तो निर्माण करती है ,,,,,,,,,,,,,,ईश्वर से सदा प्रार्थना करें की वह हमें इस कलयुगी कीचड में कमल बनने की शक्ति प्रदान करे,,,,
सिमी मदन मैनी
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