Thursday, 17 July 2014

हम अक्सर जीवन में एक शब्द का प्रयोग निरंतर करते हैं,,,,अटैचमेंट (attachment ),,,,,i am very attached to my husband, parents, son , daughter and even sometimes material things and ideas,,,,,यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि वो किसी से भी अटैच नहीं है तो उसे insensitive कहते हैं ,,,,पर क्या वास्तव में ऐसा है ,,,,अटैचमेंट यानी मोह ,,,,,,,प्रेम और मोह में एक पतली लकीर है जो की जीवन का रुख पूरी तरह से मोड़ देती है ,,,,जब हम किसी से अटैच होते है तो दुःख का जन्म होता है ,,,सामने वाला रोता है तो हम रोते  हैं ,,,हँसता है तो हँसते हैं ,,,,हमारी सोचने और समझने की शक्ति जैसे समाप्त हो जाती है ,,,किन्तु जब हम किसी से प्रेम करते हैं तो हम संतुलित रहते हैं ,,,हमारी स्थिति सुख और दुख में एक समान रहती है ,,,,और हम सामने वाले को सही सलाह भी दे सकते हैं और संभाल  भी सकते हैं,,,,

मोह वश ही हम सभी कुकर्म करते हैं ,,,,गलत रास्ते  का चुनाव करते  हैं ,,,,किन्तु जीवन के अंतिम सत्य को भुला बैठते हैं ,,,, हम किसी वस्तु , रिश्ते  ,  रुतबे , धन  सम्पती , सोच से भले ही कितने  attach हों ,,,अंतिम यात्रा अकेले ही करनी है ,,,,और साथ कुछ नहीं जाने वाला,,,,यहाँ तक की अपना शरीर भी मिटटी में मिल जाना है ,,,,,यदि साथ कुछ जाना है तो वह केवल हमारे कर्म हैं ,,,,कर्म यानि जो बोला , जो किया और जो सोचा ,,,,हमारी सोच ही हमारा सबसे बड़ा कर्म है ,,,,हम पहले सोचते है ,फिर बोलते हैं और उसके बाद action होता है ,,,,,,इसलिए ज़रूरी है की हम अपने विचारों पर नज़र रखें क्योंकि  यही  एक ऐसा सामान है जो अंतिम  यात्रा 
में साथ जाएगा ,,,,,,,,,,,,,जाने क्या ले जाएँगे  हम इसी अटूट सत्य को सामने लाता है ,,,,,,,


सिमी मदन मैनी 

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