Thursday, 16 October 2014

प्रेशर कुकर

               

                 प्रेशर कुकर

गैस चूल्हे पर सीटियाँ  बजाता
कुकर
शायद कोई सन्देश देना चाहता है
आंच पर चढ़ा कुकर
मुझे आवाज़ लगता है
दौड़ कर जाती हूँ मैं
और आँच धीमी कर देती हूँ
उफ्फ !!!!!!!
गर भूल जाती तो ?
फट जाता कुकर
एक बादल की तरह
और बिखर जाता
तहस नहस होकर
मेरी रसोई में

कितना मिलता है ना कुकर
मेरे मन से ,,,,
जब भी पकते हैं नकारात्मक विचार
इस भोले मन में ,,,
कुछ देर तो मन
चुप रहता है
फिर बजती है सीटी
परेशानी और टेँशन  की
गर ना दिया ध्यान
और ना  किया  इन विचारों की
आंच को कम  तो
कुछ और तेज़ सीटियाँ
किसी बिमारी की
सारी ऊर्जा खींचते हुए
और अंत में
 डिप्रेशन का एक धमाका
और बिखर जाता है
अस्तित्व और आत्म सम्मान
चिथड़े चिथड़े होकर


जल जाती है ख़ुशी
लापरवाही की आग में
और हम सोचते हैं
कि ,,,,
काश वक़्त रहते
मन की आवाज़ को सुन लेते
और धधकते मन
पर आध्यातम का पानी डाल देते
तो नकारात्मक विचारों की आंच
कुछ शांत हो जाती और
यह भोला मन बच जाता

सिमी  मदन मैनी





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