Monday, 12 May 2014

ऊर्जा (energy)



        ऊर्जा ( energy)

आज फिर एक नई सुबह
 चाय के प्याले के साथ
सोफे पर बैठी मैं
और
वही अनगिनत विचारों की
उठती तरंगें
लगता है जैसे
हर दीवार ,फर्नीचर , झूमर
और तस्वीर
मुझसे बात करने लगी है
कुछ प्रेम और सुकून कि तरंगें हैं
जो बह कर मुझ तक आ रही हैं
मैं हैरान सी
उन सब को देखती हूँ
ऐसा भी होता है कभी ?
भला ईंट , पत्थर , लकड़ी
और कांच भी  कभी बात करते हैं ?
तभी दीवार मुस्कुरा कर कह्ती  है
क्यों नहीं ?
जो विचारों की  ऊर्जा तुम हमें देती हो
वही लौट कर तुम तक वापिस जाती  है
तभी तो मन्दिर ,मस्जिद ,गुरूद्वारे में
तुम्हे सुकून मिलता है
हम भी भाव  और सोच पढ़ लेते हैं
अगर तुम्हारी सोच पवित्र है
तो तुम्हारा घर ही  मन्दिर है
मेरा  श्रद्धा से नतमस्तक  हो जाती हूँ
जैसे घर में उस  प्रभु से मिलन हो गया

सिम्मी मदन  मैनी 
13/05/2014



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