Wednesday, 5 November 2014

 नमस्कार ,,,


प्रत्येक व्यक्ति गुणों और अवगुणों का संगम है ,,,,कोई भी इंसान कभी बुरा नहीं होता ,,बुरे  होते हैं उसके कर्म ,,,,,,और कर्म संस्कारों पर आधारित होते हैं ,,,,,,,,,,कोई भी एक ऐसी आदत जिसे वक़्त रहते रोका  ना जाये  और जो हमें विनाश की और अग्रसर करे ,,,हमारा कड़ा संस्कार है ,,,,ऐसा कोई भी कड़ा संस्कार हमारी सभी अच्छाईयों पर पानी फेर देता है ,,,,,,उनमें से ज़िद एक है ,,,,,मुझे आज भी याद है जब मेरे  बच्चे  छोटे थे तो अक्सर दूसरों की देखा देखी कई बार ऐसी ज़िद कर बैठते थे जिसे उस समय पूरा करना उनका ही नुकसान करना था ,,,,,,,,,जिद करने का हर एक का तरीका अलग होता है ,,,,,,,,,जब हम बहला फुसला कर अपनी बात मनवाते हैं वह भी ज़िद है ,,,,या फिर हम कई बार झगड़ा कर बैठते हैं ,,,,,,,,,बच्चा दुकान पर खिलौने को देख कर उसे पाने के लिए या तो माँ से झगड़ता है और या फिर उसके पैरों से लिपट जाता है और चूमा चाटी करता है ,,,,,दोनों ही सूरतों में उसका लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ उस खिलौने को पाना होता है ,,,,पर एक माँ अपने बच्चे की ज़िद से भली भाँती परिचित होती है ,,,,,वह जानती है की उस समय उसे वह चीज़ लेकर देना एक और बड़ी ज़िद को जन्म दे सकता है और उसका ज़िद करने का संस्कार और कड़ा हो जायेगा ,,,,,,,ज़िद सदा विनाश की और अग्रसर करती है ,,,,,,,,,,,,,,रावण के पास अर्थ, ज्ञान , बल और भक्ति देवताओं से कई अधिक थे पर सीता को पाने की ज़िद ने ना सिर्फ उसका अस्तित्व मिटा दिया अपितु जन्म जन्मांतर उसके नाम पर धब्बा लगा दिया ,,,,,,,,,,,,,,,आज कोई अपनी संतान का नाम रावण नहीं रखता ,,,,,,,,,,कई बार हम भी अनजाने में परम पिता से किसी गलत चीज़ की ज़िद कर बैठते हैं ,,,,,पर हमें यह विशवास होना चाहिए की सही समय आने पर हमारा पिता हमें स्वयं आवश्यकता  के सभी स्थूल और सूक्ष्म साधन उपलब्ध कराएगा ,,,,,,नाम , मान , रिश्ते , सुख सुविधाएँ खुद हमारे पास चल कर आएँगी ,,,,,,,,,,,,,,इंतज़ार  और विश्वास करना सीखना भी ज़रूरी है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,सब्र का फल सदा मीठा ही होता है

सिमी  मदन मैनी  

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