Sunday, 11 May 2014

दरिया

 

          दरिया

आज फिर एक  ख्याल ने
दिल पर दस्तक दी है कि
गर में इक दरिया हूँ
तो मेरा काम बहना है
बिना रुके ,बिना थमे
हर पल , हर क्षण
सिर्फ मंज़िल कि और बहना
इस बहते जीवन में
रिश्तों के  कई मुकाम आते हैँ
कुछ चट्टान बन राह रोकते है
और कुछ
लक्ष्य कि ओर  पहुँचाते हैं
कर्मानुसार इन रिश्तों से
मिलने और बिछड़ने का समय
पहले से निर्धारित है
उसमें कोई चूक नहीं
हर रिश्ता मुसाफिर  के सफ़र मेँ
आने वाला एक स्टेशन है
बस घडी भर रुकना है और
आगे  बढ़ जाना है
यह जान कर भी
इन रिश्तों में मोह
और दोषारोपण कैसा ?

सिम्मी मैनी
12/05/2014

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