Wednesday, 9 July 2014

                           
                                                 संगीत और लेखन की शुरुवात

इस जीवन यात्रा में हम सभी कोई ना कोई लक्ष्य अपने सामने लेकर चलते हैं ,,,, यही छोटे छोटे लक्ष्य जब पूरे होते  हैं तो हमारी यात्रा हमें आसान लगने लगती है ,,,, यह सपने ही हमें हमारी सम्पूर्णता , ताकत और गुणों  का  अहसास दिलाते हैं ,,,,इस जीवन में सुख , दुःख के कई स्टेशन आते हैं और हर स्टेशन पर  हम कोई एक पाठ  पढ़  लेते हैं ,,,,,मेरी जीवन यात्रा भी कुछ ऐसी ही है ,,,,मैं  सिम्मी मैनी एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी ,,,खेलते कूदते , पढ़ते लिखते जीवन तेज़ गति से भाग रहा था ,,,,छोटी छोटी आँखोँ में बड़े बड़े सपने थे ,,,किताबों से मुझे विशेष लगाव था ,,,,मैं  london  school of economics में पढ़ना चाहती थी ,,,,संगीत  बचपन से सदा दिल पर दस्तक देता  रहा पर  संगीत की कोई formal tranning नहीं थी ,,,,एक भावुक व्यक्ति होने के कारण विचारों का मंथन सदा मन में चलता रहा और बहुत बार कागज़ पर भी फ़ैल गया ,,,,मेरा संगीत और लेखन से सिर्फ इतना ही नाता था ,,,


बहुत बार हम जो सोचते हैं वैसा हो यह ज़रूरी तो नहीं ,,,,मेरी किस्मत और कर्म मुझे किसी और ही दिशा में लेजा रहे थे ,,,,कई नए रिश्ते मेरा इंतज़ार कर रहे थे और मात्र बीस वर्ष की आयु में मेरा विवाह हो गया ,,,,एक संयुक्त परिवार में अपने शिक्षा के सपने को अंजाम देना आसान नहीं था ,,,,साधन थे पर पढ़ने का वक्त नहीं था ,,,,वक्त बीतता चला गया और बीतते वक़्त के साथ में पत्नी से माँ बनी ,,,जिम्मेदारियां हर दिन वक़्त के साथ बढ़ रही थीं ,,,,किसी चीज़ की कमी नहीं थी पर अधूरी शिक्षा का सपना हर रोज़ भीतर से आवाज़ लगा रहा था ,,,विवाह को दस वर्ष बीत चुके थे ,,,एक दिन मेरे बच्चों के संगीत शिक्षक से बात करते हुए मैंने उन्हें बताया कि  मैं भी संगीत सीखना चाहती थी ,,,,बस वहीँ से मेरी संगीत की शिक्षा आरम्भ हुई ,,,शिक्षा और संगीत की तरफ रुझान इस यात्रा को रोमांचक बना रहा था ,,,रायज़ का बहुत वक़्त तो नहीं मिलता था पर चलते फिरते , खाना बनाते , उठते बैठते कुछ ना कुछ गुनगुनाती रहती थी ,,,आज सोलह वर्ष हो गए संगीत से जुड़े और वक़्त का पता ही नहीं चला ,,,,


                                                        लिखने  की प्रेरणा

हर व्यक्ति की जीवन में एक ऐसा मोड़ आता है जब वो स्वयं को भीड़ में अकेला पाता  है ,,,और वो समय खुद से बात करने का होता है ,,,भीतर झाँकने का होता है ,,,और यही  सब करते हुए हम उस परमपिता परमात्मा से कैसे जुड़ जाते हैं पता ही नहीं चलता ,,,,,मेरा ऐसा मानना है की जीवन के सबसे कठिन दौर और परिस्थितियों में हम सबसे अधिक सफलता पा सकते हैं ,,,,इस समय में या तो हम बन जाते हैं और या फिर हम बिगड़ जाते हैं ,,,,यह इस बात पर निर्भर करता है की हम किस दिशा का चुनाव करते हैं ,,,,,,मेरे जीवन में भी एक ऐसा वक़्त आया जब स्वयं को परखने का मौका मिला ,,,,हर चीज़ जैसे हाथों से फिसल रही थी ,,,,,,कुछ समझ नहीं आ रहा था की क्या करना चाहिए ,,,,निर्णय लेना कठिन था ,,,,कड़वे सच का एक एक पन्ना  धीरे धीरे नज़रों के सामने खुल रहा था ,,,,और इसी समय में जैसे हर पल उससे बात होने लगी ,,,लगता की जैसे वो अदृश्य होकर  भी सामने है और मार्गदर्शन कर रहा है ,,,,जैसे भीतर बैठ कर वो हर बात का जवाब दे रहा था ,,,,,यही बातचीत कब भजन बन कर कलम के ज़रिये कागज़ पर उतर गए ,,,,मैं खुद नहीं जानती ,,,दरअसल यही बातचीत आप इस एल्बम में सुन पाएंगे  जिसका नाम है  "जाने क्या ले जाएँगे हम ",,,,सो ईश्वर ने स्वयं जैसे मेरा हाथ थाम  लिया  और लिखने को प्रेरित करते रहे ,,,,,,,,,,,



                                                 एल्बम बनाने का ख्याल कैसे आया ?

बहुत  अरसे  से गुनगुना भी रही थी और लिख भी रही थी ,,,संगीत और लेखन मेरे जीवन का अटूट हिस्सा बन चुके थे पर cd  बनाने का ख्याल कभी मन में नहीं आया था ,,,कुछ रोज़ इस तबियत बिगड़ रही थी ,,,मैं एक दिन डॉक्टर के पास गयी और उन्हें बताने लगी की मेरा वज़न १० किलो बढ़ गया है ,,,शायद बढ़ती  उम्र के साथ कोई harmonal disbalance है ,,,अभी मेरी बात पूरी भी नहीं हुई थी की डॉक्टर साहिब ने पूछा  "आप क्या करती हैं ?",,,,,मैंने जवाब में उन्हें बताया कि  मैं एक house wife हूँ ,,,,डॉक्टर साहिब मुझे इस तरह देखने लगे जैसे मैंने कोई पाप कर दिया हो और छूटते ही  बोले " बस करना क्या है सारा दिन ,आराम करो ,खाना खाओ और बेकार के टीवी  सीरियल  देखो ,,,,,वज़न तो बढ़ना ही है ",,,,,,,,,,,डॉक्टर साहिब ने जैसे किसी घाव को कुरेद दिया था ,,,,मैंने उनकी फीस दी और क्लीनिक  से बाहर निकल आई ,,,,मन में हलचल थी ,,,और अतीत की फिल्म मन की परदे पर चल रही थी ,,,,मैं सोचने लगी की क्या मैं घर पर इसलिए हूँ की काबिल नहीं हूँ ? या फिर इसलिए की दूसरों को काबिल बनाने की क्षमता है मुझमें ? लोग इतनी आसानी से कुछ भी कह देते हैं ,,,,,एक औरत अपने सपने , सोच सब कुछ पीछे छोड़ देती है क्योंकि वो दूसरे  के सपनो को अपने पसीने और मेहनत  से  सींचती है ,,,,,,,,,,,,,डॉक्टर साहिब से यह मुलाकात मन में चुपचाप बैठे सपने को आवाज़ लगा गयी ,,,,और मैंने महसूस किया की आती जाती हर सांस के साथ शायद मैं उस सपने को जी रही थी ,,,,और एल्बम बनाने की सोच ने जड़ें पकड़ ली ,,,,क्योंकि आपसे दिल की  बात बाँट रही हूँ तो अपनी एक प्रिय  रचना आपके साथ   शेयर कर रही हूँ -


                                             आम ग्रहिणी

आएँ  मुझसे मिलें
मैं हूँ एक आम ग्रहिणी
रसोई में काम करती
पसीने में तरबतर
राजमां और पालक पनीर की सुगंध
मुझे कई बार स्वपनलोक में ले गई
मैंने कई बार बेलन को माईक
और थाली को ढफ़ली बनाया
जब बच्चों को सच बोलना सिखाया
तो देश के आने वाले सुन्दर भविष्य की
कल्पना की मैंने
घर में झाड़ू लगाते हुए '
कई बार पाया
जैसे मैं  समाज की बुराइयों को
दूर हटा रही हूँ
निचुड़ते कपड़ो से निकली
पानी की धार
और झाड़पोंछ  से उड़ती मिट्टी  में
मैंने जो सपने संजोये
आज उन्हें  हकीकत में बदल डाला
क्योंकि आज होंसला है मुझमें
सपने देखने का
आगे बढ़ने का
और कुछ कर दिखाने का
आएँ मुझसे मिलें
मैं हूँ
एक आम ग्रहिणी

सिम्मी मैनी







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