Saturday, 26 July 2014

" तुम्ही हो माता,  पिता  तुम्ही हो ,तुम्ही हो बंधु , सखा तुम्ही हो "  यह पंक्ति बचपन से सुनते आ रहे हैं ,,पर क्या इस बात  पर अटूट विश्वास भी है हमारा ? ,,,,वो हमारे मात पिता का भी मात पिता है ,,,,क्या हम उससे बिना सवाल किये उसकी दी हुई हर चीज़ को दिल से अपनाते हैं ,,,,बचपन की एक घटना मुझे याद है ,,,मुझे कुछ  skin  problem  हो गयी थी और मेरी माँ " साफी  " जो की एक कड़वी दवा है मुझे ज़बरदस्ती पिलाती थी ,,,,मैं पूरा घर आसमान पर उठा लेती ,,,पर माँ को जैसे कभी रहम नहीं आता ,,,,,,मैं घंटों उससे बात ना करती थी ,,,,,,,,माँ प्रेम करती थी सो जानती थी कि कब कितना मीठा देना है और कब कितना कड़वा ,,,,,,यदि माँ मोह वश बच्चे को दवा ना दे ,,,तो बिमारी अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाए ,,,,,माँ का निस्वार्थ प्रेम ही हमें हर दुःख से दूर रखता है ,,,हम ज़िन्दगी के सभी पाठ आसानी से पढ़ लेते हैं और एक कामयाब व्यक्ति बनते हैं ,,,,,,परमात्मा से बेहतर कोई नहीं जानता कि हमें कब ,क्या चाहिए ,,,,,,हम ही उस पर विशवास नहीं करते ,,,,जीवन के इस विशाल दरिया में वक्त आने पर वो हमें धक्का दे देता है ,,,,शायद वो जानता हैं की अब  हम   मुश्किलों की विशाल लहरों पर जीत पाने को तैयार हैं ,,,,वो एक कोच की भाँति हमें तैयार करता है ,,,,कसरत करना किसे अच्छा लगता है ? ,,,,पर यही कसरत हमारा स्टेमना बनाती है ,,,,जब हम परिस्थितियों के विशाल दरिया में होते हैं तो डर  जाते हैं ,,,,,पर भूल जाते हैं की किनारे पर वो खड़ा है और हमारे पार होने का इंतज़ार कर रहा है ,,,,,,इसी तरह एक एक करके जीवन का हर पाठ वो हमें पढता चला जाता है ,,,,इसलिए वो जब भी , जो भी , जितना भी दें ,,,,उसे सर माथे लगाएँ ,,,

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