Wednesday, 23 July 2014

एक बहुत जानी पहचानी कहावत है  " चिंता  चिता  समान ",,,,,सब जानते हैं ,,,सुनते हैं  पर चिंता की दलदल में फिर भी धँसे चले जाते हैं ,,,,,कल क्या होगा? ,,,कैसे होगा ?,,,,और भी ना जाने कितने सारे प्रशन दिमाग पर जैसे पहरा देते हैं ,,,,कठिन हालात में यह प्रश्नों का बवंडर दिलो दिमाग का सुकून हर लेता है और हम खुशी से कोसों दूर हो जाते हैं ,,,,,,,,भूत और भविष्य जैसे वर्तमान को निगल जाते हैं ,,,,सब कुछ होते हुए भी व्यक्ति निर्धन हो जाता है क्योंकि वह प्रेम, शांति, शक्ति ,पवित्रता , ज्ञान और ख़ुशी किसी भी गुण का अनुभव नहीं कर पाता ,,,,,,,,,चिंता तन और मन दोनों को घायल कर देती है और इंसान अपनी सोचने , समझने ,निर्णय लेने और परखने की शक्तियाँ खो बैठता है ,,,,,,,,,,,,और इसके कारण उसका जीवन अंधकारमय हो जाता है ,,,,,,,,चिंता एक ऐसा चश्मा है जो व्यक्ति को दृष्टिहीन बना देती है और जीवन में कोई   आशा की किरण दिखाई नहीं देती  ,,,,,,चिंता एक ऐसा विष है जो अंतर को खोखला कर देती है ,,,,,,,,,चिंता हमारे बहुमूल्य समय को निगल जाती है ,,,,जितना समय हम चिंता में बिताते हैं यदि प्रभु के चिंतन में बिताएँ  तो कठिन से कठिन समस्या का समाधान हो सकता है ,,,,परमात्मा का स्मरण हमें कष्ट से उभरने की शक्ति प्रदान करता है ,,,,,,और हम पहाड़ जैसी समस्या को एक छोटे स्पीड ब्रेकर की तरह पार कर लेते है ,,,,,,,,,,,,,,,,,


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