Friday, 2 May 2014

ध्यान


 
     
ध्यान

हर दर पर जाकर
अपने प्रश्नों के उत्तर ढूँढे
और हर दर से ख़ाली लौटी हूँ
पल भर को शांती  से बैठ
अंतर में उठते इस शोर को
सुनने लगती हूँ
तो जान  जाती हूँ कि
विचारों की इस तेज़ आंधी मेँ ही
छिपा है सत्य कहीं

संकल्पों के इस बवंडर के
मध्य में जाकर टिक जाती हूँ
ध्यान में बैठ
विचारों का मंथन करती और
इनकी रफ़्तार को कुछ धीमा करती हूँ
तो अपने हि अस्तित्व की परतों के
पार निकल जाती हूँ
जहाँ असीम शांती है
प्रेम है
और मानस पटल पर
उन सभी सवालोँ के जवाब
साफ़ साफ़ दिखाई देने लगते हैं
जिनकी मुझे कब से तलाश थी

सिम्मी मदन  मैनी  
02/05/2014

1 comment:

  1. "
    सुन्दर लेखन "
    सम्मानित कवयित्री सिमी जी,


    विचारों का मंथन करती और
    इनकी रफ़्तार को कुछ धीमा करती हूँ
    तो अपने हि अस्तित्व की परतों के
    पार निकल जाती हूँ
    जहाँ असीम शांती है
    प्रेम है
    और मानस पटल पर
    उन सभी सवालोँ के जवाब
    साफ़ साफ़ दिखाई देने लगते हैं
    जिनकी मुझे कब से तलाश थी ॥ "

    ReplyDelete