Thursday, 1 May 2014

मंजिल

 
   
मंजिल


भागती  दौड़ती  इस भीड़  में
जहाँ सब एक दूसरे  को  देख कर
कदम बढ़ाते हैं
पास हो कर भी
इकदूजे  से दूर होते हैं
वहां मैं कई बार
अकेली पड़ जाती हूँ

ख़ामोशी से सभी को
बहाव के साथ
बहते देखती हूँ
रस्ता आसान लगता हैं
पर चाह कर भी मैं
उस पर चल नहीं पाती
जाने क्यों हर बार
विपरीत दिशा में बहने का
चुनाव कर लेती हूँ मैं

अकेले बहना आसान नहीं होता
चुप्पी  डसने लगती  हैं
और मैं अंतर में उतर कर
अपनी कमी खोजने लगतीं हूँ
बार बार बात करती हूँ ख़ुद से
कहीं साथ चलने में मुझे
परहेज़ तो नहीं
और तभी भीतर से एक आवाज़ आती हैं


किन हँसते मुखौटों को  देख़ विचलित  हो
ग़ौर से देखो उन्हें
 उन सबने  किसी हौड़ मेँ
अपने अस्तित्व को  खो दिया
और रहा सवाल तुम्हारे रास्तें क़ा
कठिन रास्तों पर चलने वाले ही
ख़ूबसूरत मंज़िलों के मालिक होते हैं

सिम्मी मदन  मैनी 





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