Thursday, 29 December 2011

जीत का परचम...............

          जीत का परचम...............

चल उठ फिर से
कि दौड़ में फिसलने वाले
हारा नहीं करते
तू ही है- जो इस तूफ़ान का सामना कर सके
तू ही है- जो समेट सके टूटे सपनो के टुकड़ों को
तू ही  है- जो अँधेरे में दीप जला सके
तू ही है- जो धारा के विपरीत दिशा में बह सके
तू ही है- जो झेल सके कुदरत के शूल
तू ही है- सह जाये दूसरों की नज़रों के गहरे तीर
             और फिर भी स्थिर रहे
तू ही है- जो संभाल सके जीवन का भार
तू ही है- जो बनी है कईयों के जीवन का आधार
तू ही है- जो लड़ सकती है हर कठिनाई से
तू ही है- जो न सुख में उछ्लेगी और न दुःख में डोलेगी
तू ही है- लक्ष्मी, सरस्वती , और दुर्गा
ज़रा झांक खुद में
और अपनी ताकत को पहचान
डर मत, अभी यह तेज़ हवाओं का शोर है
जो थम जाएगा ,तेरे उठते ही
चल उठ... खड़ी  हो जा
कि कमज़ोर हैं
वक़्त कि यह हवाएं तेरे सामने
देखना तुझ से टकराकर लौट जाएँगी
और छोड़ जाएँगी एक असीम शांति
जो एहसास कराएगी तुझे
कि तुझसा हिम्मतवाला
दूसरा  और कोई नहीं
और देखना तू ही लहराएगी
जीत का परचम...............


सिम्मी मदन मैनी




Friday, 23 December 2011

कोई नहीं जानता.........

             कोई नहीं जानता

हम ही सोचते हैं कि
हमें कोई नहीं जानता
पर यकीन मानिये
खुली किताब है हम

हर बात लफ़्ज़ों में बयां हो
ये ज़रूरी तो नहीं
कि चेहरे पर जो आँखें हैं
वो भी बतियाने का
काम करती हैं

जुबां कुछ कहती है
दिमाग कुछ सोचता है
पर ये जो दिल है कमबख्त
कुछ कहने से पहले
सोचता ही नहीं
मजबूर कर देता है
भावों को
और
आंसू भी हैं
इसके आधीन

पलट देता है
जीवन के सभी पन्ने
और आसानी से
सब पढ़ लेते हैं उन्हें
और हम इसी
भ्रम में जीते हैं कि 
हमारी असलियत
कोई  नहीं जानता

सिम्मी मैनी






खुद की दोस्त .....

            खुद की दोस्त 

मैं खुद की दोस्त हूँ
सबसे पक्की ,सबसे सच्ची
मैं खुद ही गिरी
और खुद ही
उठ खड़ी हुई


खुद ही बिखरी
और खुद ही जुड़ गई
सिर्फ एक मैं हूँ
जिसने खुद को कभी
हैरत भरी नज़रों से नहीं देखा
चोट लगी कभी
तो खुद ही संभल गयी
खुद को पुचकारा
और खुद ही अपने
घाव पर मरहम लगाया
खुद ही ढूंढी राह
और उस पर बढ चली




खुद ही अपनी गलतियों
से सीख ली और
खुद ही अपनी उपलब्धिओं पर
अपनी पीठ थपथपाई
खुद ही गिरते पड़ते जीवन के
कई पाठ सीख गयी




कभी कुछ नहीं
छिपाया खुद से
और सदा समय पड़ने पर
अपना साथ दिया
कभी कोई प्रशनचिंह
नहीं लगाया अपने अस्तित्व पर
और सदा खुद को मान दिया




खुद से सदा प्रेरणा ली
एक बेहतर इन्सान बनने की
खुद की कमियों को स्वीकार
और खुद की खूबियों को
निखारा खुद ही


घंटो बात की खुद से
समय पड़ने पर
और खुद ही ढूँढ निकाले
उन सब प्रश्नों के उत्तर
जिनके लिए लोग अक्सर
दूसरों का सहारा
ढूँढा करते हैं
क्योंकि
मैं खुद की दोस्त हूँ
सबसे पक्की ,सबसे सच्ची


सिम्मी मदन  मैनी







Monday, 19 December 2011

ईर्ष्या ...........

             ईर्ष्या

आज भागदौड़ के ज़माने में
हर दूसरे व्यक्ति का
 रक्तचाप बढ रहा है
क्योंकि दौड़ रही है ईर्ष्या
खून के साथ रगों में
पूरे वेग से
मार रही है ईर्ष्या
प्रेम और अपनेपन को
और अब तो खून भी
पानी बनने लगा है


सबसे बेहतर होने की चाह
और धन और नाम की भूख
आत्मा को निरंतर
 खोखला  कर रही है
ईर्ष्या रुपी नागिन
बिना फुम्फ्कारे
डस रही है शांति को
और एक ऐसी खाई का
निर्माण कर रही है
जिसे भरना नामुमकिन हो
अपने हो रहे हैं दूर
और पाप के शस्त्र संभाले हम
जुटे हैं जीतने की होड़ में
ईर्ष्या भी उम्र के साथ
बड़ी हो रही है


काश हम ईर्ष्या को
नया रूप दें
और ऊपर चढ़ने वालों की सीढ़ी
 खींचने की जगह
हम अपने लिए
 एक ऐसी सीढ़ी बनायें
जो हमें भी किसी
मुकाम पर ले जाये

सिम्मी मैनी





सादगी.......

चरित्र.....

Friday, 16 December 2011

ख़ुशी ....

             ख़ुशी

आओ मिलो मुझसे
मैं ही हूँ ख़ुशी
लाखों करोडो निगाहें
भटकती हैं
मेरी तलाश में
मानो मैं कोई
धुंदला तारा हूँ
बादलों से भरे
आकाश में

मैं कोई चीज़ नहीं
एक एहसास हूँ
दूर मत जाओ खुद से
मैं तुम्हारे पास हूँ
जानते हो
मेरे ही कारण तुम
करते हो कठिन परिश्रम
चाहते हो मान सम्मान
ढूँढ़ते हो ऊंचा ओहदा
बटोरते हो धन की खान




कई रास्ते अपनाते हो
मुझे पाने को
तुम सोचते  हो
धन के साथ आऊंगी मैं
या फिर शोहरत के पास मंडराऊँगी
नाम और शान में ढूँढ पाओगे तुम मुझे
या तुम्हे सम्मान मिलते ही
तुममे समां जाऊँगी


मैं एकटक चुप्पी साधे
रंगमंच पर होते
इस नाटक को देख रही हूँ
देख रही हूँ हर पात्र को
पूरी लगन से
अपना पाट निभाते

मेरे न मिलने पर
तुम दूसरों को
दोषी ठहराते हो
लक्ष्य साधा है मुझपर
पर गलत दिशा में जाते हो
कायर हो तुम
तभी तो मुझ से
बेगाने हो
अभी तुम जीवन के
रहस्य से अनजाने हो
तुम वो मृग हो
जो कस्तूरी की इच्छा में
बेइंतिहा  भागता है
और अचेत हो जाता है
तब संसार का कोई सुख उसे
ख़ुशी न दे पाता है


लगता है तुम डरते हो
खुद के भीतर जाने से
तभी तो शिकायत है
तुम्हे पूरे ज़माने से
तुम तो स्वयं
कस्तूरी की खान हो
यदि खुद को जान लो
तो "ख़ुशी" तुम्हारा नाम हो
आँखें बंद करो
और महसूस करो मुझे
तुम हैरान हो जाओगे
बस आत्मा में भर लोगे मुझे
और खुद पर इतराओगे
और जान जाओगे कि मैं
लेने का नहीं
देने का नाम हूँ

सिम्मी मैनी

सच और झूठ ...........

          सच और झूठ

सच का छोटा दिया
 टिमटिमा रहा है
और काट रहा है अँधेरा
तभी आया झूठ रुपी तूफ़ान
और सभी आ गये
 उसकी चपेट में


तेज़ हवा के झोंके
बुझाना चाहते हैं
सच का दिया
पर लौ पूरी तेज़ी से
लड़ रही है
तेज़ तूफ़ान से

झूठ  के निकल आये हैं
लाखों करोडो हाथ
अब सच को खुद पर
यकीन नहीं रही
फडफडा रहा है
आज भी
अपना अस्तित्व
बचाने को

लचकीला झूठ
 बदल रहा है रूप
अपनी सफाई में
और सच रुपी
कड़क पुतला
जूझ रहा है
तूफ़ान से
कि तेज़ हवा का एक
झोंका ही काफी है
उसे मिटाने को


सच पड़ा है बेबस
किसी कोने में
और अपमानित
हो रहा है
लोग उड़ा रहें  हैं खिल्ली
चढ़ रहा है झूठ
सीढियाँ कामयाबी की
और सच थामे खड़ा है
वो सीढ़ी
ताकि कोई गिर न जाये


पर कोई नहीं गिरता
रौंदते हुए सच के हाथ
सभी चढ़ते हैं
कामयाबी की सीढियाँ
कुचले जाते हैं
सच के हाथ
और अपमानित सच
आदर्शों और किताबी बातों की
मरहम घाव पर लगाता है


पर क्या कभी भरेंगे यह घाव?
झगड़ रहें है सच और झूठ
आत्मा में डेरा डाले


मानती हूँ झूठ के
काले बादल छायें हैं
पर देखो बादल के किनारे पर
अब भी सच की सुनहरी लकीर
चमक रही है


सिम्मी मैनी













Friday, 9 December 2011

सुकून........

        सुकून

कहाँ हो तुम?
कब से तलाशती हूँ तुम्हे
कभी ढूँढती हूँ तुम्हे
लम्बी गाड़ी में
तो कभी
महंगी साडी में
खोजती हूँ तुम्हे
हीरे मोती की
 चमक में
तो कभी
 सिक्कों की खनक में
कभी संग में
तो कभी
सत्संग में


पर तुम नहीं मिलते
तुम्हारी तलाश
तुमसे दूरी का एहसास
और बड़ा  देती है
हर रास्ता, हर विधि
हर दर, हर कोशिश
बेकार हो जाती है
तो थक कर
बैठ जाती हूँ

एकाएक ख्याल आता है
पूरा घर,नगर
देश, विश्व ,ब्रह्माण्ड
छान डाला
 तुम्हारी तलाश में
पर खुद को
खोजना बाकी है

अपने अन्दर झांकती हूँ
तो तुम बैठे हो मेरे अन्दर
कहीं शांत भाव से
ऐ सुकून
तुम्हे पाने में मैंने
यूं ही व्यर्थ
गवां दी ज़िन्दगी


सिम्मी मैनी











Tuesday, 6 December 2011

पिघलती आइसक्रीम ........

                  पिघलती आइसक्रीम


रेड लाइट पर रुकी है गाडी
और बच्चे कर रहे हैं हल्ला गुल्ला
बच्चों की ख़ुशी देख झूम रहा है मन
तभी मैंने देखी दूर दो नन्ही आँखें
जो टकटकी लगाए देख रही हैं
बच्चों की आइसक्रीम

ठहर गयी वह दो आँखें
मानों इशारा कर रही हों
अपने पैरों को
गाड़ी के पास आने का
तभी उम्मीद भरे दो हाथ
बढ़ते हैं गाड़ी की खिड़की में
नज़रें,हाथ और भाव
सभी चाहते हैं
पिघलती आइसक्रीम की चंद बूंदे




बस और नहीं खाना
चिल्लाता है ईशान
और फ़ेंक देता है आइसक्रीम
गाड़ी से बाहर
चमक उठती हैं
वो दो बेबस आँखें
मिट्टी में पड़ा कोन देख कर
हाथों पैरों में जान आ जाती है
नन्हे हाथ बड़ी सफुर्ती से झाड देते हैं मिट्टी
और पिघलती आइसक्रीम की चंद बूंदे
तृप्त कर देती हैं उस पिघलते मन को

पहली बार स्वादिष्ट आइसक्रीम
 खाने का एहसास
साफ़ छलक रहा है चेहरे से
वो दो आँखें फिर ढूँढने लगती हैं
 किसी पिघलती आइसक्रीम को
मैं अपनी आइसक्रीम
उन हाथों में थमा देती हूँ
आज उसे आइसक्रीम खाते देख
वो सुकून मिलता है
जो बरसों मंदिर ,गुरूद्वारे,गिरिजाघरों में ढूँढा
आँख से आंसू बहने लगते हैं

तभी एक आवाज़ आती है
आंटी और आइसक्रीम है क्या?
हरी बत्ती हो जाती है
गाड़ी पकड़ लेती है रफ़्तार
पर वो दो नन्ही आँखें
आज भी पीछा कर रही हैं मेरा
और मांग रही हैं
पिघलती आइसक्रीम की चंद बूंदे


सिम्मी मैनी






Saturday, 3 December 2011

साथ छोड़ जाते हो .....

            साथ छोड़ जाते हो

तुम सदा साथ चलते हो

हँसती हूँ तो हँसते हो

रोती  हूँ तो रोते  हो

मेरी हर एक अदा

भाती है तुम्हे


तभी तो  हर वक़्त

पीछा  करते हो

डरते हो मैं कहीं

खो ना  जाऊँ

इतना प्रेम करते  हो मुझसे


पर ऐ  मेरे  साये

अँधेरा  होने पर

तुम भी क्यूँ


साथ छोड़  जाते हो..........


सिम्मी मैनी





बस इतना चाहती हूँ .....

                बस इतना चाहती हूँ


बाँट सकूँ  तो बाँटू  खुशियाँ

जुटा   सकूँ तो  जुटाऊं  लोग

कमा सकूँ तो कमाऊँ प्रेम

माँग सकूँ तो माँगूं  दुआ


दे सकूँ तो दूँ अपनापन


छोड़ सकूँ तो छोडूँ  ईर्ष्या

घटा सकूँ तो घटाऊँ द्वेष

समां   सकूँ तो  समां लूँ  नफरत


पी सकूँ तो पी लूँ क्रोध


हँस सकूँ तो हँस लूँ  खुद  पर


सीख सकूँ  तो सीखूँ  जीना


और क्या कहूँ  मैं तुमसे प्रभु


मैं तो बस इतना चाहती हूँ


सिम्मी मैनी






Friday, 2 December 2011

हाथ किसने छोड़ा था?

 हाथ किसने छोड़ा था?


यह जो हलके से
मेरी ऊँगली थामे है,
यह कौन है?
तुम हो या मेरा साया
जिसके स्पर्श मात्र
के एहसास से
चन्दन सी महक
उठती है काया
सोचती हूँ
यह कौन है?
तुम हो या मेरा साया


मेरी उंगली थामे तुम
मेरी परछाई बन जाते हो
काँटों भरी राह देख
अभिभावक की तरह
हर कठिनाई पार कराते हो
वाकिफ हो जीवन के हर सच से
तभी तो मंजिल तक पहुचाने का
पूरा भार उठाते हो


मैं ही भटक जाती हूँ राह
और तुम्हारा हाथ छोड़
भागती हूँ एक अनजानी दौड़ में
जब थक जाती हूँ तो
निगाहें ढूँढती हैं तुम्हे




अरे !तुम तो पास ही खड़े हो
अब तुम अपना हाथ
मेरी और बढ़ाते हो
मैं थाम लेती हूँ हाथ तुम्हारा
और डर से मुक्त हो जाते हूँ
एक अजीब सुकून मिलता है मुझे
टकटकी लगाये देखती हूँ तुम्हे
कभी शिकायत करती हूँ
तो कभी नाराज़ होती हूँ
पर तुम विचलित नहीं होते

मंद मंद मुस्कुराते हो
और हलके से कहते हो
हाथ किसने छोड़ा था?
जब तुम्हारी आस्था
डगमगाती है मुझ पर
तो तुम ही छोड़ देती हो मेरा साथ
भरोसा रखो मुझ पर
और देखो-
मैं हूँ सदा तुम्हारे साथ

सिम्मी मैनी



Saturday, 26 November 2011

पधारो माहरे देस.....

         पधारो माहरे देस

बड़ी हसीन है मेरे ख्वाबों की दुनिया,
वक़्त वहां कैसे बीत जाता है,
पता ही नहीं चलता,

ना कोई दुःख है वहां,
और ना ही कोई अकेलापन ,
ना कोई उदासी है वहां,
और ना ही बोझिल मन,

बस मैं और मेरे गीत,
घंटों वहां बतियाते हैं,
जब कोई सुर छेड़ देती हूँ,
तो सभी राग मिल कर
,ताली  बजाते हैं,

तानपुरा झूम उठता है,
मेरे एक इशारे पर,
और सारे गम,
छूमंतर हो जाते हैं,
सुर ,आलाप और तान सभी,
मेरी महफ़िल में गाते हैं,
वंदन करती हूँ ,
जब कभी प्रभु का,
देवता भी खुद,
चल कर आते हैं,
सुंदर सा बस घर है मेरा,
जिसमे देते सब सुख पहरा,


आप भी सादर आमंत्रित हैं,
मेरी स्वर्ग सी  दुनिया में
केसरिया बालम आवो नी,
पधारो माहरे देस.......................

सिम्मी मैनी

मैं पत्थर हूँ

आँख का पानी  भी सूख गया,
दर्द की आग में जल कर,
अब जो आँख से आंसू नहीं बहते,
तो आप कहते हैं कि,
मैं पत्थर हूँ.......

सिम्मी मैनी




मैं कुछ नहीं लिखूंगी

        मैं कुछ नहीं लिखूंगी

आज मैं कुछ नहीं लिखूंगी,
क्योंकि ,
मेरे जज़्बात सोना चाहते हैं,
ख्याल किसी बहार वाले से,
मिलना नहीं चाहते ,
और एहसास अकेले में,
रोना चाहते हैं,

सिम्मी मैनी

Friday, 25 November 2011

रचना .....


                      रचना

 हे ! ईश्वर,
कितनी अलग है,
 एकदूसरे से,
 तुम्हारी हर  रचना,
कोई गोरा तो कोई काला,,
कोई अमीर तो कोई गरीब,
कोई ज्ञानी तो कोई अज्ञानी,

पर तुम विराजमान हो,
हर एक रचना में,
बसे हो सबमें ,
आत्मा बन कर,
तुम्हारी  हर रचना ,
चाहे सुख दे या दुःख,
तुम्हारा ही रूप है,


कोई छेड़ देती है,
मेरे दुःख के तारों को,
तो कोई मुझे सुख के,
अमृत में डुबो देती है,
 तुम ही जुड़ते हो मुझसे,
हर रचना के रूप में,
और जीवन का कोई,
पाठ पढ़ा  जाते हो,

पवित्र और सुंदर है,
तुम्हारी हर रचना,
कि वो मेरे जीवन के,
ज्ञान रुपी सागर में,
ज्ञान कि चंद,
बूंदे डालती है,

जब तुम्हारी ,
किसी रचना ने,
मेरे घावों को कुरेदा,
तो उसके चहरे में,
तुम्ही  मुस्कुरा रहे थे,
समझा रहे थे मुझे कि,
मेरा उस रचना से मिलना,
बहुत ज़रूरी था,
ताकि मेरी दुःख से,
पहचान हो,
और जब दर्द से,
वाकिफ हो जाऊं में,
भूल से भी,
किसी के दर्द का,
कारण ना बनूँ ,
दर्द से भरे लोगों  के लिए,
वो करूँ,
जो मेरे लिए,
कोई ना कर पाया ....

सिम्मी मैनी


सुहाना सफ़र.....

            सुहाना सफ़र

निकल पड़े हैं ,
दोस्ती के सुहाने सफ़र पर,
पर हैं कुछ डरे डरे ,
दिल कहता है चलें वहां,
जहाँ दोस्ती के रंगमंच पर,
महानता का पाट ना बजाना पड़े,
जहाँ मुझे तुम्हारे सामने ,
एक और मुखौटा ना लगाना पड़े,
गुणों  का तो सभी करते हैं सत्कार,
जहाँ मुझे तुमसे अपने,
 अवगुणों  को ना छुपाना पड़े,

मुमकिन है में तुम्हारे सांचे में,
ढल जाऊं कभी,
पर पहले मुझे  अपना तो लो,
मुमकिन है मैं भी भा जाऊं तुम्हे,
पर पहले मुझे आजमा तो लो,

दोस्ती किसी को विरासत में नहीं मिलती,
देने पड़ते हैं कई इम्तिहान कड़े,
कितने अलग है तुम और मैं,
एक दूसरे से,
दिन और रात की तरह,
पर जब दिन और रात मिलते हैं,
तो दुनिया देखती  है,
और ख़ूबसूरती की,
मिसाल देती है,
काश छू ले हमारा रिश्ता भी ,
उस ऊंचाई को,
कि हम दोस्ती के सबसे ऊंचे ,
शिखर पर हों खड़े,
निकल पड़े हैं दोस्ती के,
 सुहाने सफ़र पर,
पर हैं कुछ डरे डरे ..........

सिम्मी मैनी 

मेरे बाऊ जी

            मेरे बाऊ जी
आज भी याद मुझे,
मैं जब रोती थी,
तो घोडा बन जाते थे बाऊ जी,
मुझे साईकिल चलाना,
 सिखाते थे बाऊ जी,
मेरी तोतली बोली सुन ,
फूले नहीं समाते थे बाऊ जी,
जब मम्मी को गुस्सा आता था,
तो डांट के कहर से बचाते थे बाऊ जी,
हर शाम हारमोनियम पर ,
एक गीत सिखाते थे,
और मेरे बेसुरा गाने पर भी,
पीठ थपथपाते थे बाऊ जी,
जब मैं पिठ्ठू खेलने को,
 फीटियां ढूँढा करती थी ,
तो बड़े पत्थर को तोड़ ,
फीटियाँ बनाते थे बाऊ जी,
जब मेरा घर का काम करने का,
मन नहीं होता था तो,
बहाने से पास बिठाते थे बाऊ जी,
हर रोज़ खट्टी इमली,बुड्डी माई का चाटा,
और गली के पापड़ मम्मी से छुप कर,
खिलाते थे बाऊ जी,
जब कॉलेज बस मैं नहीं जाना होता था,
तब ऑटो के पैसों का जुगाड़ कराते थे बाऊ जी,
सदा सुखी रहो ,
बस यह एक लाइन ,
सदा  दोहराते थे बाऊ जी,

पर आज कोई हाथ सुरीला गाने पर भी ,
पीठ उस तरह नहीं थपथपाते ,
आज कोई मिर्चे नहीं वारता मुझ पर,
और ना ही कोई झूठी तारीफ़ करता है,
क्या आप उन्हें ढूँढने में ,
मेरी मदद करेंगे,

सफ़ेद पठानी सूट,
और तिलेदार जुत्ती,
कुल्ले वाली पगड़ी,
हाथ में सागवान की छड़ी ,
आँखों पर चश्मा ,
लम्बा कद और गोरा रंग,
हीरो से दिखते हैं बाऊ जी,
अगर कहीं मिल जाएँ ,
तो कह दीजियेगा कि,
सिम्मी उन्हें सालों से,
ढूँढ रही है.....

सिम्मी मैनी 

Thursday, 24 November 2011

मैं एक नारी हूँ


मेरी यह रचना जग को जीवन देने वाली सामान्य नारी को समर्पित है......


                 मैं एक नारी हूँ

मेरी बंद आखों में,
मुझे अपने कितने ही रूप ,
नज़र आते हैं,
मैं हूँ एक माँ,
एक बेटी, एक बहिन,
एक पत्नी,
इस सृष्टि की जीवनदायिनी ,
केवल एक नए  जीव को ,
जनम देने के एहसास से,
सर गर्व से ऊंचा हो जाता है मेरा,
पर  मेरे इस्पाती वजूद के पीछे ,
छिपा है मेरा कोमल मन,
जो छलनी हो जाता है,
देख अपनी बेबसी और अपमान,

कहीं मेरे हाथो में हैं सुहाग के चूड़ियाँ,
तो कहीं माथे पर चमकता सिन्दूर,
कहीं पैरों में बंधे घुंघरू,
जो छीन रहें हैं चेहरे का नूर,
कहीं भाई सौगंध लेता है रक्षा की ,
तो कहीं पिता बेटी को छलता है,
कहीं बिकता है तन रोटी के लिए,
तो कहीं मन हक़ मांगने से डरता है,
कहीं मैं हूँ घर की लक्ष्मी,
तो कहीं बिठा दी जाती हूँ ,
लक्ष्मी के लिए सरे बाज़ार,
मेरा तन चीरती खोखली नज़रें,
कभी मेरा मन नहीं देख पाती,

रूप कोई भी हो मेरा,
पर मेरा रुतबा छोटा नहीं होता,
जब  तक इन्सान खुद ना चाहे,
वो अपना सम्मान नहीं खोता,
अपने किसी भी रूप के आगे,
सर श्रधा  से झुक जाता है मेरा,

मैं एक माँ हूँ ,
जिसने तुम्हे चलना सिखाया ,
एक बहन,
जिसके राखी ने तुम्हे कई बार बचाया ,
एक माशूका,
जिसके बाहों में,
तुमने अपने मकसद को पाया,

तुमने पूछ ही लिया है,
तो गर्व से कहती हूँ,
की मैं एक नारी हूँ.....

सिम्मी मदन  मैनी



पहली उडान......

यह रचना मुझे अति प्रिय है lयह रचना दो वर्ष पहले मैंने उस रात लिखी जब ईशान, अन्शुम ने मुझे बताया कि वो बाहर जा कर पढना चाहते हैं l इस रचना में मेरा दर्द और चिंता दोनों छिपे हैं l यह रचना मैंने लिखी ज़रूर है पर यह विचार ईशान ,अन्शुम के हैं l यह रचना एक माँ की भेंट है अपनी संतान को l


           पहली उडान

माँ अब मुझे जाने दो,
और भरने दो जीवन की पहली उड़ान ,
मुक्त करो मुझे चिंता और प्रेम के बंधन से,
भरोसा करो खुद की परवरिश पर,
जनता हूँ कई सपने संजोये हैं तुमने,
पर तुमने कैसे सोचा टूटने दूंगा उन्हें,
सिर्फ इसलिए,
कि मेरी सोच कि राह अलग है,
जब सोच को मिल जाएगी पसंद कि राह,
तो जी लूँगा पूरी ज़िन्दगी पहली उड़ान में,
देख लेना तुम्हे पहुँच  कर  दिखाऊँगा वहां,
जहाँ तुम्हारा सपना न पहुंचा होगा कभी,
और अगर थक कर गिर भी जाऊं ,
तो बस प्रेम भरी निगाह से देख लेना मुझे,
और हौले से कान में कहना,
में हूँ ना,
सिर्फ तुम्हारा ये कहना,
कर देगा मुझमे नई सफुर्ती का संचार,
फिर से उठ कर उड़ने लगूंगा में,
और प् लूँगा अपने मंजिल,
माँ अब मुझे जाने दो,
और भरने दो जीवन कि पहली उड़ान......

सिम्मी मैनी.

Wednesday, 23 November 2011

बात ही कुछ और है .....

          बात ही कुछ और है

अब आप इसे मेरा गुरुर कहें,
तो गुरुर ही सही,
पर उसकी और मेरे रिश्ते की,
बात ही कुछ और है,

मैं बस कहती जाती हूँ,
और घंटो आराम से सुनता जाता  है वो,
मैं कुछ मांगू तो सही,
ज़मीन आसमान एक कर,
मेरी पसंद लाता है वो,
अगर कभी उदास होती हूँ,
तो मुझसे मिलने को मचल उठता है,
अगर पलक से एक आंसू गिर जाये,
तो तड़प जाता है वो,
अगर मैं रूठ जाऊं कभी  ,
तो मेरे सभी नाजो नखरे उठता है वो,
घर के चक्कर लगता है,
और सपने में आ कर ,
मनाता है वो,
नींद न आये जो मुझे,
तो लोरी गा कर  सुलाता है वो,
गलती करता है तो ,
डांट भी देती हूँ मैं उसे,
बड़ी मासूम शक्लें बनाता है वो,

सिर्फ वो है जो मुझे,
 सम्पूर्णता  का एहसास कराता है,
हर कहीं मुझे नज़र आता है वो,
रिश्ता तो आप सबका भी,
होगा उसके साथ,
पर प्रभु और मेरी तो,
बात ही कुछ और है.....

सिम्मी मैनी

मेरी सोच ......

मुखौटा

मुखौटा 

Tuesday, 22 November 2011

हाथ थाम लेना

मैं जो भी करती हूँ ,
जानती हूँ की तुम देखते हो,
लिए बैठे  हो  कहीं,
हाथ में कलम और खाता ,
मेरे हर कर्म का लेखा जोखा ,
उस खाते में भर लेते हो,

मेरे हर कर्म से पहले ,
 आवाज़ लगाते हो मुझे,
 ठीक और गलत की पहचान करा देते हो,
संभव नहीं की साथ तुम्हारा, 
ले जाये गलत राह पर,
फिर ठीक राह को क्यूँ?
काँटों से सजा देते हो,

गूंजती रहती  है रात दिन,
तुम्हारी आवाज़ मेरे कानों में,
और तुम नज़दीक होने का,
एहसास करा देते हो,
कई बार तुम्हारी आवाज़ को अनसुना कर,
चलना चाहती हूँ सरल राह पर,
पर तुम संस्कारो और उसूलों की बेड़ियाँ ,
पांव में पहना देते हो,

ज़रा बताओ? आसन राह पर चलने वाले,
जो तुम्हे अनसुना कर देते हैं,
क्यों पहुँच जाते हैं शिखर पर,
और मुझ पर हँसते   हैं,
और क्यों मैं सही गलत का ,
ताना बना बुनती हूँ?

क्यों आवाज़ देते हो मुझे?
और सच का आईना दिखाते हो,
कभी हमसफ़र बन साथ दो,
थाम लो ऊँगली और ले चलो उस पार,
कि हर कोई सुने तुम्हारे आवाज़,
और तुम्हारे कहने से चले,


ज़रा सोचना आज,
और जिन हाथों में कर्मों के लेखे जोखे कि ,
कलम थामी है,
उसमे मेरा हाथ थाम लेना

सिम्मी मैनी 




मैं कितनी सुन्दर हूँ .....

              मैं कितनी सुन्दर हूँ

पोंछ रही हूँ दर्पण,
और निहार रही हूँ खुद को,
छोटा कद, थोडा गुदा शरीर ,
बालों से झांकती हलकी सफेदी,
 उम्र का तकाज़ा करती ,
चेहरे की बारीक लकीरें ,
और सांवला रंग,

आज देखती हूँ दर्पण ,
एक नए अंदाज़ से,
और पाती हूँ ,
कि मैं कितनी सुंदर हूँ

आज भी झूठ बोलने में झटपटाहट होती है,
आज भी दूसरों के पीड़ा देख  आँख नम  हो जाती है,
आज भी किसी का दिल दुखाने से डर लगता है,
आज भी दुआ के लिए हाथ उठते हैं,
आज भी एहसास जीवित है मुझमे,
आज भी लोग मुझ पर भरोसा करते हैं,
कहते हैं दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता,
यकीन मानिये उसी ने बताया मुझे,
कि मैं बहुत सुंदर हूँ,
आप ही कहिये ,कहीं यह मेरा भ्रम तो नहीं ....

सिम्मी मदन  मैनी


Monday, 21 November 2011

मीठा एहसास.....

      मीठा एहसास

आज मैंने तुम्हे किसी के
नज़दीक   जाते देखा
आज मैंने  उसे तुम्हारे
आगोश में समाते देखा
किस तरह बिना बताये
तुमने  बाँहों में भर लिया उसे
आज मैंने उसे सदा के लिए
 खामोश हो जाते देखा

किस प्यार से सुला लिया तुमने
 उसे अपनी गोद में
आज तुम्हारे ही कारण
उस अनजान मुसाफिर के अपनों पर
भावनाओं  का बवंडर छाते  देखा
देखा दर्द का एक ज़लज़ला
देखी आंसुओं से भरी आँखें
और जुड़े हाथ........
प्रभु  से कुछ मांगते
आज मैंने तुम्हे धनवान को
भिखारी  बनाते देखा
देखे खामोश मंत्र बुदबुदाते होंठ
किसी  को बचाने की आस में
आज मैंने अस्पताल को
मंदिर  बन जाते देखा


ऐ मौत ! कैसे तुम
बिना  दस्तक दिए
पहुँच  जाती हो
जीवन  के द्वार पर?
और किसी अनजाने को
अपना  बना लेती हो
मचा देती हो
भयंकर  कोहराम
अपने आने पर
और अपने पीछे
दिलों  को चीरता
एक सन्नाटा छोड़ देती हो


बस क्या ऐसे ही चुन लती हो
किसी  को भी ?
जो तुम्हारे मन को
भा  जाये.....
और अचानक
साथ  चलने का
हुक्म सुना देती हो


सोचती हूँ कहीं अगला नंबर
मेरा  तो नहीं?
जो आ गयी
तुम  मेरे द्वार पर
तो सुनो......
मेरा  बोरिया, बिस्तर तैयार है
निपटा रही हूँ
प्रभु  के दिए सब काम धीरे धीरे
कल पर कुछ नहीं छोड़ती
जानती हूँ तुम्हारी ताकत
तुम पल भर की भी
मोहलत  नहीं दोगी

जब तुम आयोगी
तो  मैं चुपचाप
सो  जाऊँगी
तुम्हारी  गोद में
बिना किसी शिकायत के
चाहती हूँ तुम
बन  जाओ  मेरे लिए
एक हसीन खवाब
और एक मीठा एहसास
जो एक दिन सबको होगा...

सिम्मी मैनी


,

प्रेम से परिचय

                  प्रेम से परिचय

तुम्ही ने कराया मुझसे प्रेम का पहला परिचय,
ऐ चाँद ! तुम चमक रहे हो आकाश में,
स्थिर,अटल,और शांत हो अपने तारों के साथ,
नेहला रहे हो पृथ्वी को अपने चांदनी से,
तुम्हारी रोशनी पड़ती है मुझपर,
मैं समुद्र की तूफानी लहरों से आया,
एक छोटा रेत  का कण ,

मैं चमक उठती हूँ तुम्हारी रोशनी में,
भर जाती हूँ प्रेम और सम्पूर्णता के अहसास से,
छूना चाहती हूँ तुम्हे,
पर कहाँ तुम और कहाँ मैं,
तुम ठहरे  नभ में चमकने वाले शांत शशि,
और मैं धरा की धूल,
भला कोई मेल है हमारा?
हाथ उठाती हूँ और महसूस करती हूँ तुम्हे,
तुम्ही ने मेरी प्रेम से कराई है पहचान,


प्रेम जो महान है,
प्रेम जो सम्मान है,
प्रेम जो पवित्र है,
मानो वादियों में फैला इत्र है,
प्रेम न कोई बंधन है,
और न सजा,
प्रेम तो बस प्रेम है,
प्रेम वासना नहीं उपासना है,
प्रेम भक्ति का आगाज़ है,
प्रेम एक मीठा साज़ है,
प्रेम पाने की चाहत नहीं,
प्रेम राहत है,
प्रेम मोह नहीं तपस्या है,
प्रेम सुकून है,
दीवानगी है जूनून है,


मैं तुम्हे नहीं पा सकती,
पर प्रेम केवल पाने को तो नहीं कहते,
प्रेम लेने का नहीं देने का नाम है,
पर मैं तुम्हे क्या दे सकती हूँ,
लो देती हूँ मैं तुम्हे दुआएं ,
कि चमकते रहो तुम सदा तारों के साथ,
और बिखेरते रहो अपनी चांदनी धरती पर,
कभी पड़ जाये तुम्हारी रोशनी जो मुझ पर,
तो चमक उठूँ  मैं भी,
और तुम्हे खुद मैं समां लूँ,

देखो यह मेरा स्वार्थ नहीं,
बल्कि ,पवित्र एहसास है,
जो शायद कभी तुम तक पहुँच जाये,
ऐ चाँद! तुम्हे ने कराया मुझसे,
प्रेम का पहला परिचय.....

सिम्मी  मदन मैनी 

Sunday, 20 November 2011

चुप रहो

                                                        चुप रहो


शोर मत करो ,कोई सुन लेगा,             
ज़रा चुप रहो, कोई सुन लेगा,
पर कैसे चुप रहूँ?
की आखें सब बोलती हैं,
बोलती हैं सांसे ,
और राज़ सब खोलती हैं,

आजकल लोग चेहरे को पढने की भाषा जानते हैं,
समझते हैं खोखली हंसी ,
और बनावटी आंसुओं को पहचानते हैं,
तो मैं क्यूँ बनूँ अपराधी,
बेचारे शब्दों को कैद कर,
सोचती हूँ आज़ाद करूँ इन्हें आज,
और मैं भी मुक्त हो जाऊं ,
कह डालूं वो  सब ,जो कब से कहना चाहती हूँ,                                                     

पर आज जब कुछ कहने की हिम्मत जुटाई,
तो शब्दों ने मुख से बाहर आने से इंकार कर दिया,
और मुझे समझाने लगे,
हमें यहीं रहने दो,
हमें तो कैद में रहने की आदत है,
क्योंकि हम नारी के शब्द हैं,
और सच कहना तो फिर भी आसाँ हैं,
पर बाद में जो होगा उसे सहना बहुत मुश्किल 

सिम्मी मदन  मैनी 

आत्मविश्वास

                                                           
आत्मविश्वास 

तेजी  से भागती हैं सांसे
और माथे पर चमकती हैं 
पसीने की  चंद बूंदे 
शिथिल होती काया
बैठने  की जगह ढूँढते पैर
सोचती  हूँ
इतना  कैसे थक गई?
नीचे  नज़र जाती है
आश्चर्य होता है खुद पर
मैं  इतना ऊपर चढ़ आई 

जीवन कि चढाई का सफ़र
साफ़ नज़र  आता है 
दूर से झांकते  नज़र आते हैं 
जीवन के सभी पड़ाव
जो मैंने तय किये
सफ़र की शुरुवात में
कभी  सोचा न था कि
 इतनी हिम्मत
 जुटा पाऊँगी
कभी ख्याल न आया था कि
 इस ऊँचाई  को छू पाऊँगी

अतीत के थपेड़े
आज भी
मन कि मज़बूत नींव
हिलाना चाहते हैं
कटु यादों की तूफानी लहेरें
आज भी
प्रेम और शांति के बन्धनों को
तोड़ने   के लिए  बेताब हैं
पर मैं कितनी
शांत और अटल हूँ
बालों कि सफेदी और
चेहरे  की हल्की झुरियां
एहसास  दिलाती हैं कि
समय  कितना बलवान है

पर वक़्त की
तेज़ तलवार के आगे
मेरा आत्मविश्वास
बन  कर खड़ा है
एक  मज़बूत ढाल
जीवन  की किताब के
कई  पन्नों पर पड़ी है
 दुखों और मुसीबतों की धूल
पर उनके बीच चमक रहा है
 मेरा आत्मविश्वास
एक दिव्य शक्ति के समान

इसकी तेज़ रोशनी  में
मैं  नहा जाती हूँ
और वो  रोशनी
चुपके  से
मेरे  कानों में कहती है
चल उठ.....
अभी  तो शिखिर को
छूना है.....

यह भी तेरे जीवन का
एक  पड़ाव है
अपने लक्ष्य प्राप्ति की
 कल्पना से
मन विभोर हो उठता है
अपनी गरिमा को
महसूस  करती हूँ मैं
और अपने ही
आत्मविश्वास के  आगे
सर श्रद्धा से झुक जाता है
नमन करती हूँ मैं उसे
और पैर खुद्बाखुद
मंजिल  की और
कूच करते हैं .......

सिम्मी मदन मैनी  

Friday, 18 November 2011

जीवन का सार

कई बार जीवन मैं छोटी छोटी घटनाएँ भी हमें बहुत कुछ सिखा जाती हैं l  यह कविता मैंने उस रात लिखी जिस रात मेरे चेहरे पर  खौलते  तेल की चंद  बूंदे गिरी l यकीन मानिए इन चंद बूंदों ने मेरी जड़ो को हिला दिया l


                                      जीवन का सार 
आज खाना बनाते हुए 
खौलते तेल की चंद बूंदे
जो  मेरे चेहरे पर पड़ी 
तो मुझे जीवन का
सार  सिखा गयी ,

बदसूरत चेहरे के अहसास से
सिहर  उठी मैं ,
और भागी
आईने  की ओर ,
देख रही हूँ खुद को
आईने  में हर कोण से 
और सोच  रही हूँ कि
किस तरह छिपाऊँ
अपने चेहरे को आँचल से 
कि आप मेरे चेहरे के
दाग  न देख पाएं


रात भर करवटें बदलती रही 
और सोचती रही कि 
आज वैध का मरहम
ठीक  कर देगा चेहरे के दाग 
पर सालों से
आत्मा  पर जो दाग 
और लाखों करोड़ों
मैल की परतें हैं 
उनके लिए मरहम
कहाँ  से लाऊँ ?
तन की सुन्दरता के लिए
चिंतित  हूँ 
और मन की कुरूपता का
एहसास  तक नहीं 

प्रभु जिस तरह
पल  भर में तुमने
छीन  लिया  रंग रूप 
उसी तरह किसी भी पल
तुम   छीन सकते हो ,
मेरा नाम, मेरी पहचान
मेरा रुतबा, मेरा सम्मान
और अगर इसी पल
ले  लिए मेरे प्राण
तो जीवन व्यर्थ ही
 गुज़र गया मेरा

नींद से उठ बैठी मैं ,
और पता चला कि,
अभी बहुत कुछ
करना  बाकी है
छोटी से ज़िन्दगी
और  बड़े बड़े काम,
चलो जब जागे
 तभी सवेरा

आज खाना बनाते हुए 
खौलते तेल की चंद बूंदे
जो  मेरे चेहरे पर पड़ी 
तो मुझे जीवन का
 सार सिखा गयी ......

सिम्मी मैनी 


Thursday, 17 November 2011

सीधी बात मेरी अति कविता है जोकि मेरे कविता संग्रह "जीने की कोशिश में" से है l

कविता करार देते हैं

कौन कहता है कि मैं कविता लिखती हूँ,
कहाँ जानती हूँ मैं व्याकरण की बारीकियां,
और कहाँ है मुझे ? गूढ़ शब्दों का ज्ञान,
नहीं आते मुझे सजे संवरे आलंकृत शब्द,
और कहाँ पढ़े हैं मैंने वेद पुराण ?
मेरा तो दिल बस यूँही इशारा करता है हाथ को,
और हाथ झट से कलम उठा लेते हैं,
बिखर जातें हैं भावनाओं के मोती कागज़ पर,
और आप उसे कविता करार देते हैं l

Friday, 4 November 2011

स्वागतम शुभ स्वागतम

स्वागतम, शुभ स्वागतम

सिम्मी मैनी के ब्लॉग में आपका स्वागत है. मेरे इस ब्लॉग में मेरी स्वरचित एवं मुझे प्रिय कवितायें पढ़ पाएंगे l
मैं एक आम गृहणी हूँ ,एक पत्नी, एक माँ, एक बेटी एक बहु l. जीवन की व्यस्तता  में कई बार मुझे ऐसे पल मिले जब मैंने अपने मन के भावों को कागज़ पर उतार लिया  और उसने कविता का रूप ले लिया l

 मेरी कविताओं की भाषा अति सहज है और इसमें भारी  भरकम शब्द और व्याकरण की बारीकियां  नहीं हैं l
 इन कविताओं में सिमटी है मेरी पूरी ज़िन्दगी ,पूरे जीवन के खुशियाँ और गम l यह केवल मेरे भावों की अभिव्यक्ति   है l

इस ब्लॉग में आप सितम्बर ,2008 में प्रकाशित मेरे कविता संग्रह  "जीने की कोशिश में " की  कवितायेँ भी पढ़ पाएँगे l आशा करती हूँ मेरे गुणी पाठक  इसे पसंद करेंगे  l  आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं l

सिम्मी  मैनी