मेरी यह रचना जग को जीवन देने वाली सामान्य नारी को समर्पित है......
मैं एक नारी हूँ
मेरी बंद आखों में,
मुझे अपने कितने ही रूप ,
नज़र आते हैं,
मैं हूँ एक माँ,
एक बेटी, एक बहिन,
एक पत्नी,इस सृष्टि की जीवनदायिनी ,
केवल एक नए जीव को ,
जनम देने के एहसास से,
सर गर्व से ऊंचा हो जाता है मेरा,
पर मेरे इस्पाती वजूद के पीछे ,
छिपा है मेरा कोमल मन,
जो छलनी हो जाता है,
देख अपनी बेबसी और अपमान,
कहीं मेरे हाथो में हैं सुहाग के चूड़ियाँ,
तो कहीं माथे पर चमकता सिन्दूर,
कहीं पैरों में बंधे घुंघरू,
जो छीन रहें हैं चेहरे का नूर,
कहीं भाई सौगंध लेता है रक्षा की ,
तो कहीं पिता बेटी को छलता है,
कहीं बिकता है तन रोटी के लिए,
तो कहीं मन हक़ मांगने से डरता है,
कहीं मैं हूँ घर की लक्ष्मी,
तो कहीं बिठा दी जाती हूँ ,
लक्ष्मी के लिए सरे बाज़ार,
मेरा तन चीरती खोखली नज़रें,
कभी मेरा मन नहीं देख पाती,
रूप कोई भी हो मेरा,
पर मेरा रुतबा छोटा नहीं होता,
जब तक इन्सान खुद ना चाहे,
वो अपना सम्मान नहीं खोता,
अपने किसी भी रूप के आगे,
सर श्रधा से झुक जाता है मेरा,
मैं एक माँ हूँ ,
जिसने तुम्हे चलना सिखाया ,
एक बहन,
जिसके राखी ने तुम्हे कई बार बचाया ,
एक माशूका,
जिसके बाहों में,
तुमने अपने मकसद को पाया,
तुमने पूछ ही लिया है,
तो गर्व से कहती हूँ,
की मैं एक नारी हूँ.....
सिम्मी मदन मैनी
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