प्रेम से परिचय
तुम्ही ने कराया मुझसे प्रेम का पहला परिचय,
ऐ चाँद ! तुम चमक रहे हो आकाश में,
स्थिर,अटल,और शांत हो अपने तारों के साथ,
नेहला रहे हो पृथ्वी को अपने चांदनी से,
तुम्हारी रोशनी पड़ती है मुझपर,
मैं समुद्र की तूफानी लहरों से आया,
एक छोटा रेत का कण ,
मैं चमक उठती हूँ तुम्हारी रोशनी में,
भर जाती हूँ प्रेम और सम्पूर्णता के अहसास से,
छूना चाहती हूँ तुम्हे,
पर कहाँ तुम और कहाँ मैं,
तुम ठहरे नभ में चमकने वाले शांत शशि,
और मैं धरा की धूल,
भला कोई मेल है हमारा?
हाथ उठाती हूँ और महसूस करती हूँ तुम्हे,
तुम्ही ने मेरी प्रेम से कराई है पहचान,
प्रेम जो महान है,
प्रेम जो सम्मान है,
प्रेम जो पवित्र है,
मानो वादियों में फैला इत्र है,
प्रेम न कोई बंधन है,
और न सजा,
प्रेम तो बस प्रेम है,
प्रेम वासना नहीं उपासना है,
प्रेम भक्ति का आगाज़ है,
प्रेम एक मीठा साज़ है,
प्रेम पाने की चाहत नहीं,
प्रेम राहत है,
प्रेम मोह नहीं तपस्या है,
प्रेम सुकून है,
दीवानगी है जूनून है,
मैं तुम्हे नहीं पा सकती,
पर प्रेम केवल पाने को तो नहीं कहते,
प्रेम लेने का नहीं देने का नाम है,
पर मैं तुम्हे क्या दे सकती हूँ,
लो देती हूँ मैं तुम्हे दुआएं ,
कि चमकते रहो तुम सदा तारों के साथ,
और बिखेरते रहो अपनी चांदनी धरती पर,
कभी पड़ जाये तुम्हारी रोशनी जो मुझ पर,
तो चमक उठूँ मैं भी,
और तुम्हे खुद मैं समां लूँ,
देखो यह मेरा स्वार्थ नहीं,
बल्कि ,पवित्र एहसास है,
जो शायद कभी तुम तक पहुँच जाये,
ऐ चाँद! तुम्हे ने कराया मुझसे,
प्रेम का पहला परिचय.....
सिम्मी मदन मैनी
तुम्ही ने कराया मुझसे प्रेम का पहला परिचय,
ऐ चाँद ! तुम चमक रहे हो आकाश में,
स्थिर,अटल,और शांत हो अपने तारों के साथ,
नेहला रहे हो पृथ्वी को अपने चांदनी से,तुम्हारी रोशनी पड़ती है मुझपर,
मैं समुद्र की तूफानी लहरों से आया,
एक छोटा रेत का कण ,
मैं चमक उठती हूँ तुम्हारी रोशनी में,
भर जाती हूँ प्रेम और सम्पूर्णता के अहसास से,
छूना चाहती हूँ तुम्हे,
पर कहाँ तुम और कहाँ मैं,
तुम ठहरे नभ में चमकने वाले शांत शशि,
और मैं धरा की धूल,
भला कोई मेल है हमारा?
हाथ उठाती हूँ और महसूस करती हूँ तुम्हे,
तुम्ही ने मेरी प्रेम से कराई है पहचान,
प्रेम जो महान है,
प्रेम जो सम्मान है,
प्रेम जो पवित्र है,
मानो वादियों में फैला इत्र है,
प्रेम न कोई बंधन है,
और न सजा,
प्रेम तो बस प्रेम है,
प्रेम वासना नहीं उपासना है,
प्रेम भक्ति का आगाज़ है,
प्रेम एक मीठा साज़ है,
प्रेम पाने की चाहत नहीं,
प्रेम राहत है,
प्रेम मोह नहीं तपस्या है,
प्रेम सुकून है,
दीवानगी है जूनून है,
मैं तुम्हे नहीं पा सकती,
पर प्रेम केवल पाने को तो नहीं कहते,
प्रेम लेने का नहीं देने का नाम है,
पर मैं तुम्हे क्या दे सकती हूँ,
लो देती हूँ मैं तुम्हे दुआएं ,
कि चमकते रहो तुम सदा तारों के साथ,
और बिखेरते रहो अपनी चांदनी धरती पर,
कभी पड़ जाये तुम्हारी रोशनी जो मुझ पर,
तो चमक उठूँ मैं भी,
और तुम्हे खुद मैं समां लूँ,
देखो यह मेरा स्वार्थ नहीं,
बल्कि ,पवित्र एहसास है,
जो शायद कभी तुम तक पहुँच जाये,
ऐ चाँद! तुम्हे ने कराया मुझसे,
प्रेम का पहला परिचय.....
सिम्मी मदन मैनी
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