चुप रहो
ज़रा चुप रहो, कोई सुन लेगा,
पर कैसे चुप रहूँ?
की आखें सब बोलती हैं,
बोलती हैं सांसे ,
और राज़ सब खोलती हैं,
आजकल लोग चेहरे को पढने की भाषा जानते हैं,
समझते हैं खोखली हंसी ,
और बनावटी आंसुओं को पहचानते हैं,
तो मैं क्यूँ बनूँ अपराधी,
बेचारे शब्दों को कैद कर,
सोचती हूँ आज़ाद करूँ इन्हें आज,
और मैं भी मुक्त हो जाऊं ,
कह डालूं वो सब ,जो कब से कहना चाहती हूँ,
पर आज जब कुछ कहने की हिम्मत जुटाई,
तो शब्दों ने मुख से बाहर आने से इंकार कर दिया,
और मुझे समझाने लगे,
हमें यहीं रहने दो,
हमें तो कैद में रहने की आदत है,
क्योंकि हम नारी के शब्द हैं,
और सच कहना तो फिर भी आसाँ हैं,
पर बाद में जो होगा उसे सहना बहुत मुश्किल
सिम्मी मदन मैनी

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