सुकूनकहाँ हो तुम?
कब से तलाशती हूँ तुम्हे
कभी ढूँढती हूँ तुम्हे
लम्बी गाड़ी में
तो कभी
महंगी साडी में
खोजती हूँ तुम्हे
हीरे मोती की
चमक में
तो कभी
सिक्कों की खनक में
कभी संग में
तो कभी
सत्संग में
पर तुम नहीं मिलते
तुम्हारी तलाश
तुमसे दूरी का एहसास
और बड़ा देती है
हर रास्ता, हर विधि
हर दर, हर कोशिश
बेकार हो जाती है
तो थक कर
बैठ जाती हूँ
एकाएक ख्याल आता है
पूरा घर,नगर
देश, विश्व ,ब्रह्माण्ड
छान डाला
तुम्हारी तलाश में
पर खुद को
खोजना बाकी है
अपने अन्दर झांकती हूँ
तो तुम बैठे हो मेरे अन्दर
कहीं शांत भाव से
ऐ सुकून
तुम्हे पाने में मैंने
यूं ही व्यर्थ
गवां दी ज़िन्दगी
सिम्मी मैनी
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