Monday, 19 December 2011

ईर्ष्या ...........

             ईर्ष्या

आज भागदौड़ के ज़माने में
हर दूसरे व्यक्ति का
 रक्तचाप बढ रहा है
क्योंकि दौड़ रही है ईर्ष्या
खून के साथ रगों में
पूरे वेग से
मार रही है ईर्ष्या
प्रेम और अपनेपन को
और अब तो खून भी
पानी बनने लगा है


सबसे बेहतर होने की चाह
और धन और नाम की भूख
आत्मा को निरंतर
 खोखला  कर रही है
ईर्ष्या रुपी नागिन
बिना फुम्फ्कारे
डस रही है शांति को
और एक ऐसी खाई का
निर्माण कर रही है
जिसे भरना नामुमकिन हो
अपने हो रहे हैं दूर
और पाप के शस्त्र संभाले हम
जुटे हैं जीतने की होड़ में
ईर्ष्या भी उम्र के साथ
बड़ी हो रही है


काश हम ईर्ष्या को
नया रूप दें
और ऊपर चढ़ने वालों की सीढ़ी
 खींचने की जगह
हम अपने लिए
 एक ऐसी सीढ़ी बनायें
जो हमें भी किसी
मुकाम पर ले जाये

सिम्मी मैनी





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