मैं जो भी करती हूँ ,
जानती हूँ की तुम देखते हो,
लिए बैठे हो कहीं,
हाथ में कलम और खाता ,
मेरे हर कर्म का लेखा जोखा ,
उस खाते में भर लेते हो,
मेरे हर कर्म से पहले ,
आवाज़ लगाते हो मुझे,
ठीक और गलत की पहचान करा देते हो,
संभव नहीं की साथ तुम्हारा,
ले जाये गलत राह पर,
फिर ठीक राह को क्यूँ?
काँटों से सजा देते हो,
गूंजती रहती है रात दिन,
तुम्हारी आवाज़ मेरे कानों में,
और तुम नज़दीक होने का,
एहसास करा देते हो,
कई बार तुम्हारी आवाज़ को अनसुना कर,
चलना चाहती हूँ सरल राह पर,
पर तुम संस्कारो और उसूलों की बेड़ियाँ ,
पांव में पहना देते हो,
ज़रा बताओ? आसन राह पर चलने वाले,
जो तुम्हे अनसुना कर देते हैं,
क्यों पहुँच जाते हैं शिखर पर,
और मुझ पर हँसते हैं,
और क्यों मैं सही गलत का ,
ताना बना बुनती हूँ?
क्यों आवाज़ देते हो मुझे?
और सच का आईना दिखाते हो,
कभी हमसफ़र बन साथ दो,
थाम लो ऊँगली और ले चलो उस पार,
कि हर कोई सुने तुम्हारे आवाज़,
और तुम्हारे कहने से चले,
ज़रा सोचना आज,
और जिन हाथों में कर्मों के लेखे जोखे कि ,
कलम थामी है,
उसमे मेरा हाथ थाम लेना
सिम्मी मैनी

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