Friday, 16 December 2011

ख़ुशी ....

             ख़ुशी

आओ मिलो मुझसे
मैं ही हूँ ख़ुशी
लाखों करोडो निगाहें
भटकती हैं
मेरी तलाश में
मानो मैं कोई
धुंदला तारा हूँ
बादलों से भरे
आकाश में

मैं कोई चीज़ नहीं
एक एहसास हूँ
दूर मत जाओ खुद से
मैं तुम्हारे पास हूँ
जानते हो
मेरे ही कारण तुम
करते हो कठिन परिश्रम
चाहते हो मान सम्मान
ढूँढ़ते हो ऊंचा ओहदा
बटोरते हो धन की खान




कई रास्ते अपनाते हो
मुझे पाने को
तुम सोचते  हो
धन के साथ आऊंगी मैं
या फिर शोहरत के पास मंडराऊँगी
नाम और शान में ढूँढ पाओगे तुम मुझे
या तुम्हे सम्मान मिलते ही
तुममे समां जाऊँगी


मैं एकटक चुप्पी साधे
रंगमंच पर होते
इस नाटक को देख रही हूँ
देख रही हूँ हर पात्र को
पूरी लगन से
अपना पाट निभाते

मेरे न मिलने पर
तुम दूसरों को
दोषी ठहराते हो
लक्ष्य साधा है मुझपर
पर गलत दिशा में जाते हो
कायर हो तुम
तभी तो मुझ से
बेगाने हो
अभी तुम जीवन के
रहस्य से अनजाने हो
तुम वो मृग हो
जो कस्तूरी की इच्छा में
बेइंतिहा  भागता है
और अचेत हो जाता है
तब संसार का कोई सुख उसे
ख़ुशी न दे पाता है


लगता है तुम डरते हो
खुद के भीतर जाने से
तभी तो शिकायत है
तुम्हे पूरे ज़माने से
तुम तो स्वयं
कस्तूरी की खान हो
यदि खुद को जान लो
तो "ख़ुशी" तुम्हारा नाम हो
आँखें बंद करो
और महसूस करो मुझे
तुम हैरान हो जाओगे
बस आत्मा में भर लोगे मुझे
और खुद पर इतराओगे
और जान जाओगे कि मैं
लेने का नहीं
देने का नाम हूँ

सिम्मी मैनी

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