रचना
हे ! ईश्वर,
कितनी अलग है,एकदूसरे से,
तुम्हारी हर रचना,
कोई गोरा तो कोई काला,,
कोई अमीर तो कोई गरीब,
कोई ज्ञानी तो कोई अज्ञानी,
पर तुम विराजमान हो,
हर एक रचना में,
बसे हो सबमें ,
आत्मा बन कर,
तुम्हारी हर रचना ,
चाहे सुख दे या दुःख,
तुम्हारा ही रूप है,
कोई छेड़ देती है,
मेरे दुःख के तारों को,
तो कोई मुझे सुख के,
अमृत में डुबो देती है,
तुम ही जुड़ते हो मुझसे,
हर रचना के रूप में,
और जीवन का कोई,
पाठ पढ़ा जाते हो,
पवित्र और सुंदर है,
तुम्हारी हर रचना,
कि वो मेरे जीवन के,
ज्ञान रुपी सागर में,
ज्ञान कि चंद,
बूंदे डालती है,
जब तुम्हारी ,
किसी रचना ने,
मेरे घावों को कुरेदा,
तो उसके चहरे में,
तुम्ही मुस्कुरा रहे थे,
समझा रहे थे मुझे कि,
मेरा उस रचना से मिलना,
बहुत ज़रूरी था,
ताकि मेरी दुःख से,
पहचान हो,
और जब दर्द से,
वाकिफ हो जाऊं में,
भूल से भी,
किसी के दर्द का,
कारण ना बनूँ ,
दर्द से भरे लोगों के लिए,
वो करूँ,
जो मेरे लिए,
कोई ना कर पाया ....
सिम्मी मैनी
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