Friday, 25 November 2011

सुहाना सफ़र.....

            सुहाना सफ़र

निकल पड़े हैं ,
दोस्ती के सुहाने सफ़र पर,
पर हैं कुछ डरे डरे ,
दिल कहता है चलें वहां,
जहाँ दोस्ती के रंगमंच पर,
महानता का पाट ना बजाना पड़े,
जहाँ मुझे तुम्हारे सामने ,
एक और मुखौटा ना लगाना पड़े,
गुणों  का तो सभी करते हैं सत्कार,
जहाँ मुझे तुमसे अपने,
 अवगुणों  को ना छुपाना पड़े,

मुमकिन है में तुम्हारे सांचे में,
ढल जाऊं कभी,
पर पहले मुझे  अपना तो लो,
मुमकिन है मैं भी भा जाऊं तुम्हे,
पर पहले मुझे आजमा तो लो,

दोस्ती किसी को विरासत में नहीं मिलती,
देने पड़ते हैं कई इम्तिहान कड़े,
कितने अलग है तुम और मैं,
एक दूसरे से,
दिन और रात की तरह,
पर जब दिन और रात मिलते हैं,
तो दुनिया देखती  है,
और ख़ूबसूरती की,
मिसाल देती है,
काश छू ले हमारा रिश्ता भी ,
उस ऊंचाई को,
कि हम दोस्ती के सबसे ऊंचे ,
शिखर पर हों खड़े,
निकल पड़े हैं दोस्ती के,
 सुहाने सफ़र पर,
पर हैं कुछ डरे डरे ..........

सिम्मी मैनी 

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