Monday, 21 November 2011

मीठा एहसास.....

      मीठा एहसास

आज मैंने तुम्हे किसी के
नज़दीक   जाते देखा
आज मैंने  उसे तुम्हारे
आगोश में समाते देखा
किस तरह बिना बताये
तुमने  बाँहों में भर लिया उसे
आज मैंने उसे सदा के लिए
 खामोश हो जाते देखा

किस प्यार से सुला लिया तुमने
 उसे अपनी गोद में
आज तुम्हारे ही कारण
उस अनजान मुसाफिर के अपनों पर
भावनाओं  का बवंडर छाते  देखा
देखा दर्द का एक ज़लज़ला
देखी आंसुओं से भरी आँखें
और जुड़े हाथ........
प्रभु  से कुछ मांगते
आज मैंने तुम्हे धनवान को
भिखारी  बनाते देखा
देखे खामोश मंत्र बुदबुदाते होंठ
किसी  को बचाने की आस में
आज मैंने अस्पताल को
मंदिर  बन जाते देखा


ऐ मौत ! कैसे तुम
बिना  दस्तक दिए
पहुँच  जाती हो
जीवन  के द्वार पर?
और किसी अनजाने को
अपना  बना लेती हो
मचा देती हो
भयंकर  कोहराम
अपने आने पर
और अपने पीछे
दिलों  को चीरता
एक सन्नाटा छोड़ देती हो


बस क्या ऐसे ही चुन लती हो
किसी  को भी ?
जो तुम्हारे मन को
भा  जाये.....
और अचानक
साथ  चलने का
हुक्म सुना देती हो


सोचती हूँ कहीं अगला नंबर
मेरा  तो नहीं?
जो आ गयी
तुम  मेरे द्वार पर
तो सुनो......
मेरा  बोरिया, बिस्तर तैयार है
निपटा रही हूँ
प्रभु  के दिए सब काम धीरे धीरे
कल पर कुछ नहीं छोड़ती
जानती हूँ तुम्हारी ताकत
तुम पल भर की भी
मोहलत  नहीं दोगी

जब तुम आयोगी
तो  मैं चुपचाप
सो  जाऊँगी
तुम्हारी  गोद में
बिना किसी शिकायत के
चाहती हूँ तुम
बन  जाओ  मेरे लिए
एक हसीन खवाब
और एक मीठा एहसास
जो एक दिन सबको होगा...

सिम्मी मैनी


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