Wednesday, 14 September 2016

मेरे ख़्वाब

मेरे ख़्वाब

मेरे ख़्वाब यही कहीं
बिखरे पड़े हैं
कुछ छिपे हैं
परदे के पीछे
तो कुछ
चद्दर की सिलवटों में
सिमटे बैठे हैं

कुछ वहाँ छत के ऊपर
तार पर सूख रहे हैं
रंग बिरंगे से
हवा में लहराते

कुछ ख़्वाबों की तो अब
कोपलें फूटने लगी हैं
गमले में हर रोज़
आशा की खाद
और उम्मीद का पानी जो पड़ता है


अपनों के साथ की बहार
ख्वाबों की महक से
मेरा आँगन भर देती है

तो कई बार अपनों की बेरुखी से
शुष्क हो जाते हैं सपने
और सिकुड़ने लगते हैं
जैसे उनका अपना कोई
अस्तित्व ही ना हो


सालों से यह लुक्का छुपी का खेल
चल रहा है
मेरे और सपनो के बीच

कई बार धुंधले पड़  जाते हैं
झाड़ पोंछ की मिट्टी में
तो अचानक कभी
उफन कर गिर पड़ते हैं
 चूल्हे  पे चढ़े दूध के साथ

कभी कभी तो
 संगमर्मर के फर्श में भी
चमकते दिखलाई पड़ते हैं
तो कभी खुले आसमान में
 शरारत से टिमटिमाते हैं

कभी तो पा लेंगे अपनी मंज़िल
और उंचाईयों से झाँकते
 मुझे मुस्कुरा कर कहेंगे
कि गर्व हैं उन्हें इस बात का
 कि वो मेरी कोख से जन्मे है

 सिम्मी मदन  मैनी






Sunday, 11 September 2016

आभार

                                                               आभार

मेरा यह कविता संग्रह समर्पित है मेरी माँ  "श्रीमती कृष्णा चैकर" जी को। यह उन्ही की परवरिश ,संस्कारों और आशीर्वाद का नतीजा है कि  मेरे मन में उपजे भाव आज आपके समक्ष एक कविता संग्रह के रूप में प्रस्तुत हैं। मेरी माँ एक आम गृहणी है और उनका सम्पूर्ण जीवन घर परिवार के इर्द गिर्द ही घूमता रहा। मुझे याद नहीं कि उन्होंने कभी मुझे  आदर्शों और सिद्धांतों के बारे में बैठा कर सिखाया या समझाया हो। वह तो अपने आप में एक मिसाल है जिन्हें देख कर मैंने  सब सीखा। उनकी सहनशीलता ,सन्तुष्टता , ईमानदारी और बिना किसी शर्त के प्रेम करने की भावना सराहनीय है। कठिन  परिस्थितियों में वही अपनी दूरदर्शता से मेरा पथ प्रदर्शित करती रहीं और मैं सभी तरह की   परिस्थितियों का सामना करती बस आगे बढ़ती चली गई।

सिम्मी मदन मैनी


यह शीर्षक क्यों ?


                                                                यह शीर्षक क्यों ?

प्रस्तुत कविता संग्रह किसी कवयित्री की कलम से निकले आलंकृत शब्द नहीं हैं। यह तो एक आम औरत के वो जज़्बात ,एहसास और भावनाएँ हैं जिनसे हर नारी कभी ना कभी हो कर गुज़रती है।  मैं स्वयं को कोई कवयित्री नहीं मानती और ना ही ऐसा समझती हूँ की मुझे हिंदी साहित्य का कोई गूढ़ ज्ञान है। मैं  तो एक साधारण औरत हूँ। पर मुझे लगता है की हर साधारण नारी में एक असाधारण नारी छिपी रहती है। वह नारी जो शायद स्वयं अपनी क्षमता से अनजान है। वह नारी जिसके सपने ,उम्मीदें और हुनर समय और जिम्मेदारियों के बादलों में कहीं धुंधले पड़ गए हैं।  जीवन का अर्ध शतक पूरा होने को है और इस छोटे से सफर में मैंने अपने आस पास की महिलाओं को ना सिर्फ बड़े करीब से देखा बल्कि उन्हें पढ़ा और बारीकी से जाना भी। इस शीर्षक में अबला शब्द का उपयोग औरत की बेचारगी को दर्शाने के लिए नहीं किया गया है अपितु इस बात से सभी को परिचित करना है कि जैसे हम सभी में अच्छा और बुरा दोनों पक्ष विद्धमान रहते हैं ,उसी प्रकार कमज़ोरी और ताकत भी नारी के व्यक्तित्व के दो पहलू हैं।कोई भी नारी ना तो पूरी तरह कमज़ोर है और ना ही ताकतवर।  नारी का जीवन तो एक ऐसे सफर की तरह है जिसमें वह अपनी अनंत दृणता,साहस और इच्छाशक्ति से हर कमज़ोरी और हार को जीत में बदलने की क्षमता रखती है। हममें से ऐसा कौन है जिसका कभी किसी भावनात्मक ,आर्थिक या शारीरिक कमज़ोरी से सामना ना हुआ हो? एक माँ अपने बच्चे के सामने ,पत्नी पति के सामने और बेटी माता पिता के सामने प्रेमवश कई बार कमज़ोर पड़ जाती है। कोई शारीरिक विशमता से जूझती है तो किसी को आर्थिक तंगी से दो चार होना पड़ता है। यदि इन कठिनाइयों के समक्ष अपने घुटने टेक दे तो वो हार जाता है और यदि कोई धृढ इच्छा शक्ति से उस पर जीत हासिल कर ले तो ईश्वर भी उसके समक्ष नतमस्तक होता है। नारी के अबला से सबला  होने के इस सफर में यदि कोई नारी अपने जीवन की ज़िम्मेदारी उठाती है तो परमात्मा भी उसे आपार शक्ति से नवाज़ता है ,उसका पथ प्रदर्शित करता है और उसकी जीत का जश्न मनाता है।

आइए नारी के अस्तित्व के इस सफर पर एक नज़र डालें। नज़र डालें उसके जीवन से जुड़े उस हर पहलू पर जिससे होकर वो गुज़रती है और तप कर सोने से कुंदन हो जाती है।

सिम्मी मदन मैनी







Tuesday, 30 August 2016

सुन री बहना

     
सुन री बहना

सुन री बहना सखी सहेली
थाम  ले मेरा दामन
रिश्तों में मत बाँधो
है ये मानवता का बंधन
मैं हूँ तेरे जैसी ,तू बिल्कुल मेरे जैसी

सास ,बहु,ननद ,भोजाई
किसी रूप में आएँ
तोड़े ना बस ,रिश्ते जोडें
सुख आपार लुटाएँ
मैं हूँ तेरे जैसी ,तू बिल्कुल मेरे जैसी

जलन ,द्वेष  ना ईर्ष्या मन में
प्रेम की जोत जलाएँ
करुणा ,स्नेह ,समर्पण मिल कर
बस हरदम बरसाएँ
मैं हूँ तेरे जैसी ,तू बिल्कुल मेरे जैसी


एक दूजे के मर्म को समझें
जख्मों को सहलाएँ
जो चौखट के पर अकेली
अपना उसे बनाएँ
मैं हूँ तेरे जैसी ,तू बिल्कुल मेरे जैसी


सिम्मी मदन मैनी

अनचाही मेहमान

  
हर माता पिता अपनी बेटी से आपार प्रेम का दावा करते हैं।  बड़ी उम्मीद के साथ उसे डोली में बिठा कर विदा करते हैं।   पर यदि दुर्भाग्यवश  बेटी को मायके लौटना पड़ता है तो  माता पिता का व्यवहार और चिंता से बेटी के कोमल मन पर क्या बीतती है उसे शब्दों में पिरोने की एक छोटी सी कोशिश। 


  अनचाही मेहमान 

बाबुल मुझको देख कर 
जाने क्यों परेशान है 
प्रेम लुटाते नैना थे जो 
आज क्यों हैरान है 
कोई बताए ,बोलो ना 

मैं वही हूँ ,घर वही 
गलियाँ ,चौबारे वही 
माँ वही ,बाबा वही 
फिर भी सब अनजान हैं 
कोई बताए ,बोलो ना 

अजनबी हूँ या पराई 
सहारों को मैं ढूँढती 
हाथ हैं जैसे हज़ारों 
अपनापन गुमनाम है 
कोई बताए ,बोलो ना 

बंद खिड़की मन की कर ली 
प्रेम भी बोझिल हुआ 
जैसे दरवाज़े पे कोई 
अनचाही मेहमान है 
कोई बताए ,बोलो ना 

ना डरूँगी ,ना मरूँगी 
बढ़ती ही जाऊँगी मैं 
अपना सहारा खुद बनूँगी 
ये मेरा अरमान है 
कोई बताए ,बोलो ना 

सिम्मी मदन मैनी 








Monday, 29 August 2016

मैं बहती जाऊँगी

मैं बहती जाऊँगी


मैं बहती जाऊँगी
ऊँची दुनिया की फांद दिवारें
अम्बर को , छू जाऊँगी


प्रश्नों की माला कंठ दबाती
सांसे भी तेज़ाब हुई
अब तक सिर्फ जवाब दिए हैं
अब आवाज़ उठाउंगी


घूमे क्यों गुमनाम लुटेरा
अपनों और बेगानों में
मुझे सजा और उसे आज़ादी
अब मैं ना सह पाऊँगी


चोट है गहरी ज़ख़्म हैं रिसते
मन में टीस हज़ारों हैं
फिर भी खुद के घाव भरूँगी
मंज़िल को पा जाउंगी

मैं बहती जाऊँगी
ऊँची दुनिया की फांद दिवारें
अम्बर को , छू जाऊँगी

सिम्मी मदन मैनी







मैं भी खेलूँगी

मैं भी खेलूँगी

मैं भी खेलूँगी मईया
भाई के संग संग
खिलने दे बाबुल मुझको
मैला ना कर मन


स्वर्ग बनाऊँगी मैं
घर को सजाऊँगी मैं
आने दे बगिया में
मैला ना कर मन

हाथ बटाऊंगी मैं
साथ निभाऊँगी मैं
कुछ भी ना चाहूँगी
बदले में माँ सुन


कहता है मन यह मुझसे
रिश्ता पुराना तुझसे
कर्मो के बंधन हैँ
झटका ना दामन


मैं भी खेलूँगी मईया
भाई के संग संग
खिलने दे बाबुल मुझको
मैला ना कर मन


सिम्मी मदन  मैनी






स्ट्रेच मार्क्स (खाल खिंचने से पड़ने वाले निशान )

     स्ट्रेच मार्क्स (खाल खिंचने से पड़ने वाले निशान )



क्यों छिपाने लगी हो इन निशानों को ?
क्यों शर्माने लगी हो इनके दिखने से ?
पेट पर यह खूबसूरत निशां तो
 निशानी हैं तुम्हारी ताक़त की

ताक़त एक नए जीव को जन्म देने की
ताक़त उसे खुद में पनाह देकर पालने की
ताक़त खुद
 की हदों को खींच कर बड़ा करने की
ताक़त अपने बल पर एक नया रिश्ता कायम करने की

यह निशां घृणा नहीं ,सम्मान के काबिल है
इनका नज़र आना इस बात का सुबूत है
कि तुम एक आत्मा को धरती पर
किसी खास उद्देश्य से ला सकती हो
ईश्वर ने यह वरदान
 सिर्फ और सिर्फ तुम्हे दिया है

सिम्मी मदन मैनी


   सफ़ेद दाग ( leukoderma )


तन पर बिछते सफ़ेद दाग
अब झाँकने लगे हैं
कपड़ों के परतों से
लगातार फ़ैल रहे हैं
शरीर के हर हिस्से पर
शायद अपनी पहचान बनाना चाहते हैं

मैंने उनसे होले से पुछा
क्या झगड़ा है तुम से मेरा ?
तुम क्यों मुझ पर हावी होना चाहते हो ?
तुम्हारे होने से
लोग दूर भागने लगे हैं मुझसे

तभी सफ़ेद दाग
बड़ी मासूमियत से बोले
तुम्हे नहीं लगता कि
हम उन काले दागों से बेहतर हैं
जो तुमसे दूर भागने वालों की
आत्मा पर पहरा देते हैं

कम से कम
तुम्हारी आत्मा पर तो
 कोई दाग नहीं 


यह सुन कर
मैंने अपने सफ़ेद दागों को
कपड़ों की परतों से आज़ाद कर दिया
अब वो भी मेरे संग
 खुली हवा में सांस लेने लगे
और उन्होंने
मेरी जिस्मानी और रूहानी ख़ूबसूरती में
चार चाँद लगा दिए

सिम्मी मदन  मैनी




चरित्र

 
        चरित्र

सड़क पर सिसकती वो औरत
आस पास पड़े निवाले संभाल रही थी
माथे पर पड़ी गहरी लकीरें
और होठों से बहता खून
लगातार पड़ते पत्थर
और लोगों में
उसे मार डालने का जुनून
मुझे डरा रहा था

भीड़ भरी थी इज़्ज़तदार समाज के ठेकेदारों से
बेरहमी के आसमान में चमकते बुज़दिल सितारों से
तानों की बौछार उस पर पड़ती रही
और वो चुप्पी से उन इज़्ज़तदारों से लड़ती रही
खून से लथपथ वो कराह रही थी
और लोगों की उठती उँगलियाँ
उसे बेबस बना रही थी

तभी एक तेज़ आवाज़ गूंजी
चरित्रहीन औरत तन बेचती है अपना
और उसी से
पूरा करती है हर सपना
मैंने घृणा भरी दृष्टि से उसे देखा
मैं  कोशिश करने लगी
उसके चरित्र को आंकने की
और उसके सपनों में झाँकने की


तभी भीड़ चीरते चार बच्चों ने
उसकी ऊँगली थाम ली
उम्मीद भरी निगाह से देखते हुए बोले
"दीदी !आज भी खाना नहीं लाई ?"
अपने चेहरे से रिसते लहू को पोंछते हुए
वो बचे खुचे निवाले उन मासूमों को खिलाने लगी
बच्चे खाना खाते हुए मुस्क़ुरा रहे थे
और मैं बुत  बनी खड़ी सोच रही थी
कि  आखिर चरित्र की परिभाषा क्या है ?

सिम्मी मदन मैनी






पतंग

          पतंग


मैं  एक पतंग  हूँ
जिसकी डोर
तुम्हारी उंगलियों में फंसी है

तुमने जब फरिश्ता बनना चाहा
तो मुझे ढील दी
और जब ताकत का
एहसास दिलाना चाहा
तो खींच लिया

तेज़ हवा के थपेड़ों से
जूझ रही हूँ  मैं
और इस डर से उड़ रही हूँ
कि जाने कब खींच ली जाऊँ

अपनी उँगलियों पर भरोसा कर
इस पतंग को ढील दो
क्योंकि जब पतंग किसी
मुकाम  पर पहुँचेगी
तो उसमें भी
नाम तुम्हारा होगा

सिम्मी मदन मैनी

समय

      समय

समय का चक्र तेज़ी से
घूम रहा है
और
तेज होती जा रही है
निकलते समय की रफ़्तार

तेज़ वेग से बहते समय को
में हाथों में समेटना चाहती हूँ
पर वो फिसल रहा है मुठ्ठी से
रेत की तरह

सोच रही हूँ ,आज तक
कितने घंटे ,मिनट और सेकिंड निकल गए
और इसमें मैंने अपने लिए कितने पल जुटाए ?

मेरा अपना समय बंटा है
मेरे अपनों के बीच
बेटी,माँ ,पत्नी,भाभी और बहु बनते बनते
मैं अपने ही समय से दूर हो गई
मेरा अपना समय
 बंटा है सबके बीच
और मैं अकेली खड़ी हूँ
कैसी विडम्बना है ?
मेरी अपनी ज़िन्दगी
अपने ही समय से
कुछ पल नहीं चुरा पाती

सिम्मी मदन मैनी









आम गृहिणी

आम गृहिणी

आएँ मुझ से मिलें
मैं हूँ एक आम गृहिणी
रसोई में काम करती
पसीने में तरबतर
राजमां और पालक पनीर की सुगंध
मुझे कई बार स्वपन लोक में ले गई
मैंने कई बार बेलन को माइक
और थाली को डफली बनाया
जब बच्चों को सच बोलना सिखाया
तो देश के आने वाले
 सुन्दर भविष्य की कल्पना की मैंने
घर में झाड़ू लगाते हुए
कई बार पाया
कि जैसे में समाज की बुराईयों को
दूर हटा रही हूँ
निचुड़ते कपड़ों से निकली पानी की धार
और झाड़ पोंछ से उड़ती मिट्टी में
मैंने जो सपने संजोए
आज उन्हें हकीकत में बदल डाला
क्योंकि आज होंसला है मुझमें
सपने देखने का
आगे बढ़ने का
और कुछ कर दिखाने का
आएँ मुझ से मिलें
मैं हूँ एक
आम गृहिणी

सिम्मी मदन मैनी

Sunday, 7 August 2016

पापा से पूछ के बताऊँगी



      पापा से पूछ कर  बताऊंगी 


माँ ,,,,,,मैं कैंप में चली जाऊँ ?
 उत्साहित स्वरा  मेरे  इर्द गिर्द
चक्कर लगा रही थी

पापा को आने दो देखते हैं
मेरे   दो टूक जवाब से स्वरा का
फूल सा चेहरा मुरझा गया

माँ पापा तो दो दिन बाद आएँगे
उनका फ़ोन भी नहीं चल रहा
कल पैसे जमा करने की आखरी तारीख है
आप दे दो ना पैसे प्लीज ,,,,,,

नहीं ,नहीं भाई ,,,,
मैं ऐसे नहीं दे सकती पैसे
मैं घबरा कर बोली
पापा से पूछ कर बताऊंगी 

क्यों माँ ?
आप इतना सा निर्णय खुद नहीं ले सकते
तब तो मैं आगे से हर बात
सिर्फ पापा से पूछूंगी 
आप तो हर ज़रा सी बात के लिए
उन पर  निर्भर हो

स्वरा की यह बात
मेरे वजूद को
छलनी कर गई
ओह !मेरा यह मतलब नहीं था
मैं तो कह रही थी कि
पापा से सलाह  कर के  बताऊंगी 


अच्छा चलो बताओ कितने पैसे ?
मैं अपने डर को छुपाते हुए बोली
स्वरा का चेहरा चमकने लगा
और उस दिन
मैंने उसके हाथोँ में
चंद रुपयों के साथ थमाया
ढ़ेर सारा आत्मविश्वास
और हर परिस्थिति में
निर्णय लेने की शक्ति




Saturday, 6 August 2016

मुझे क्यों पढ़ाया ?

       मुझे क्यों  पढ़ाया ?

जब निर्णय लेने की आज़ादी ना दी
और अपना हुक्म बजाया
मैं पूछती हूँ
बाबा मुझे क्यों पढ़ाया ?

तुमने ही बोए आज़ादी के बीज
इस कोमल मन में
और फिर मेरी उड़ान से पहले
मेरे पंखों को जलाया
 मैं पूछती हूँ
बाबा मुझे क्यों पढ़ाया ?

नौकरी और शादी का चयन
जब आपके ईशारे पर होना था
तो मुझे हक़ का रास्ता क्यों दिखाया ?
मैं पूछती हूँ
बाबा मुझे क्यों पढ़ाया ?

कागज़ और कलम थमाने वाले
तुम्हारे हाथोँ ने
जब झाडू और बेलन को
मेरा भविष्य बताना था
तो बेटी और बेटे में अंतर ना करने का
स्वांग क्यों रचाया ?
 मैं पूछती हूँ
बाबा मुझे क्यों पढ़ाया ?

सिम्मी  मदन मैनी


तेज़ाब

                         तेज़ाब

 माँ !
 तुम और मैं इतने अलग क्यों दिखते हैं ?
नन्ही पीहू बोल पड़ी
क्या में भी बड़ी होकर तुमसी दिखने लगूँगी ?

लक्ष्मी ने झट से मासूम पीहू को
बाँहों के घेरे में समेट लिया

और मुस्कुराते हुए बोली
नहीं बेटा ,,,
मेरी पीहू तो परी सी दिखेगी

गले लगी पीहू ने
माँ के माथे को चूमा
और परीलोक में खो गई


लक्ष्मी अब भी तेज़ाब की जलन
सीने में महसूस कर रही थी

धधकते दिल ने अंदर से आवाज़ दी

देखना लक्ष्मी
अब किसी नारी के लिए
 मर्द को ना कहना
इतना दर्दनाक ना हो

अब कोई लक्ष्मी
यह घाव  ना  झेले

और ना ही कोई पीहू
अपनी माँ से यह सवाल पूछे

अब कभी ऐसा नहीं होगा
लक्ष्मी दृढ़ता से बोली

क्योंकि अब बाज़ार में
 तेज़ाब की बिक्री पर रोक है

रोक है  मर्द को ज़बरदस्ती
हाँ कहलवाने पर

रोक है किसी जानवर के
सरेआम घूमने पर

और यह लड़ाई मुझ अकेली की नहीं
लाखों बहने हैं मेरे साथ
हम देखेंगे कि
 भविष्य में हर एक पीहू
अपनी हाँ और ना की
मालिक खुद हो

सिम्मी मदन मैनी



Thursday, 4 August 2016

वरदान

          वरदान

रूप निखरने लगा है मेरा
चेहरे की महीन लकीरों
और झुर्रियों के झुरमुट में

हर लकीर में कैद हैं
कुछ खट्टे  मीठे अनुभव
कुछ राज़
और कुछ सुनहरी यादें


 काले बालों से झाँकती है
हलकी सफेदी
जैसे काली गहरी रात में
बिखर जाती है चांदनी
और रोशन कर देती है
हर ज़र्रे को

ढलता शरीर  थिरकने लगता है
बीते वक़्त की ताल पर
और कयानात पीठ थपथपाती है मेरी
ठंडी हवा होले से
कान में फुसफुसाती है
"मुझे नाज़ है तुम पर ,,,
इसे कहते हैं ज़िंदादिली से जीना "


और
 मुझे एकाएक अहसास होता है कि
 उम्र का यह पड़ाव
 किसी वरदान से कम  नहीं
यह तो एक खज़ाना है
अनुभवों  का
जो मैं अभी अपनों में बाँट रही हूँ
और इसे  में यहीं एक दिन
 मेरे अपनों के लिए छोड़ जाऊँगी

सिम्मी  मदन मैनी









मंगल भारी है

      मंगल  भारी  है

होगा गठबंधन कुत्ते संग
अभी प्रथा ये जारी है
नारी अपमान सहती जाएगी
क्योंकि मंगल भारी है

बढ़ते अंधविश्वास
और दबी हँसी में
इक बेटी फिर हारी है
आत्मसम्मान फिर छलनी होगा
क्योंकि मंगल भारी है

कुत्ता पहला पति बनेगा
हुआ फरमान यह जारी है
वह ही पहले मांग भरेगा
 क्योंकि मंगल भारी  है

स्वयं बेटी का करें अमंगल
खुद उसका सम्मान हरें
शिक्षित होकर डर से हारें
बेटी कुत्ते  को दान करें

बेटी के मन की व्यथा तो सोचो
वो अपनों से हारी है
क्या कसूर बेटी का इसमें ?
हुआ जो मंगल भारी है

सिम्मी  मदन  मैनी  

पराया घर

         पराया घर

यह सिन्दूर बड़ा भारी है
देखो ना फैलने लगा है
सुनहरे भविष्य के चाँद पर
एक ग्रहण की तरह
और
 बचपन भी  मरने लगा है
जिम्मेदारी के सख्त दुप्पट्टे से

बंद हो रही हैं आँखें
और कोमल सपने पनपने से पहले ही
सलाखों में कैद हो रहे हैं

बुझने लगा है मुस्कान का दिया
बंधने के डर  से
और सांसें घुटने लगी हैं

कैसे झेल पाएंगे ?
मेरे मासून कंधे इस बोझ को
अभी तो में खुद ही
 संभलना नहीं सीख पाई

बाबा ,,,,,,
क्या मैं कुछ दिन और यहाँ रह सकती हूँ ?
जहाँ मैं जन्मी
या फिर
बेटी पैदा ही पराये घर में होती है ?

सिम्मी  मदन मैनी