Tuesday, 30 August 2016

अनचाही मेहमान

  
हर माता पिता अपनी बेटी से आपार प्रेम का दावा करते हैं।  बड़ी उम्मीद के साथ उसे डोली में बिठा कर विदा करते हैं।   पर यदि दुर्भाग्यवश  बेटी को मायके लौटना पड़ता है तो  माता पिता का व्यवहार और चिंता से बेटी के कोमल मन पर क्या बीतती है उसे शब्दों में पिरोने की एक छोटी सी कोशिश। 


  अनचाही मेहमान 

बाबुल मुझको देख कर 
जाने क्यों परेशान है 
प्रेम लुटाते नैना थे जो 
आज क्यों हैरान है 
कोई बताए ,बोलो ना 

मैं वही हूँ ,घर वही 
गलियाँ ,चौबारे वही 
माँ वही ,बाबा वही 
फिर भी सब अनजान हैं 
कोई बताए ,बोलो ना 

अजनबी हूँ या पराई 
सहारों को मैं ढूँढती 
हाथ हैं जैसे हज़ारों 
अपनापन गुमनाम है 
कोई बताए ,बोलो ना 

बंद खिड़की मन की कर ली 
प्रेम भी बोझिल हुआ 
जैसे दरवाज़े पे कोई 
अनचाही मेहमान है 
कोई बताए ,बोलो ना 

ना डरूँगी ,ना मरूँगी 
बढ़ती ही जाऊँगी मैं 
अपना सहारा खुद बनूँगी 
ये मेरा अरमान है 
कोई बताए ,बोलो ना 

सिम्मी मदन मैनी 








No comments:

Post a Comment