यह शीर्षक क्यों ?
प्रस्तुत कविता संग्रह किसी कवयित्री की कलम से निकले आलंकृत शब्द नहीं हैं। यह तो एक आम औरत के वो जज़्बात ,एहसास और भावनाएँ हैं जिनसे हर नारी कभी ना कभी हो कर गुज़रती है। मैं स्वयं को कोई कवयित्री नहीं मानती और ना ही ऐसा समझती हूँ की मुझे हिंदी साहित्य का कोई गूढ़ ज्ञान है। मैं तो एक साधारण औरत हूँ। पर मुझे लगता है की हर साधारण नारी में एक असाधारण नारी छिपी रहती है। वह नारी जो शायद स्वयं अपनी क्षमता से अनजान है। वह नारी जिसके सपने ,उम्मीदें और हुनर समय और जिम्मेदारियों के बादलों में कहीं धुंधले पड़ गए हैं। जीवन का अर्ध शतक पूरा होने को है और इस छोटे से सफर में मैंने अपने आस पास की महिलाओं को ना सिर्फ बड़े करीब से देखा बल्कि उन्हें पढ़ा और बारीकी से जाना भी। इस शीर्षक में अबला शब्द का उपयोग औरत की बेचारगी को दर्शाने के लिए नहीं किया गया है अपितु इस बात से सभी को परिचित करना है कि जैसे हम सभी में अच्छा और बुरा दोनों पक्ष विद्धमान रहते हैं ,उसी प्रकार कमज़ोरी और ताकत भी नारी के व्यक्तित्व के दो पहलू हैं।कोई भी नारी ना तो पूरी तरह कमज़ोर है और ना ही ताकतवर। नारी का जीवन तो एक ऐसे सफर की तरह है जिसमें वह अपनी अनंत दृणता,साहस और इच्छाशक्ति से हर कमज़ोरी और हार को जीत में बदलने की क्षमता रखती है। हममें से ऐसा कौन है जिसका कभी किसी भावनात्मक ,आर्थिक या शारीरिक कमज़ोरी से सामना ना हुआ हो? एक माँ अपने बच्चे के सामने ,पत्नी पति के सामने और बेटी माता पिता के सामने प्रेमवश कई बार कमज़ोर पड़ जाती है। कोई शारीरिक विशमता से जूझती है तो किसी को आर्थिक तंगी से दो चार होना पड़ता है। यदि इन कठिनाइयों के समक्ष अपने घुटने टेक दे तो वो हार जाता है और यदि कोई धृढ इच्छा शक्ति से उस पर जीत हासिल कर ले तो ईश्वर भी उसके समक्ष नतमस्तक होता है। नारी के अबला से सबला होने के इस सफर में यदि कोई नारी अपने जीवन की ज़िम्मेदारी उठाती है तो परमात्मा भी उसे आपार शक्ति से नवाज़ता है ,उसका पथ प्रदर्शित करता है और उसकी जीत का जश्न मनाता है।
आइए नारी के अस्तित्व के इस सफर पर एक नज़र डालें। नज़र डालें उसके जीवन से जुड़े उस हर पहलू पर जिससे होकर वो गुज़रती है और तप कर सोने से कुंदन हो जाती है।
सिम्मी मदन मैनी
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