Monday, 29 August 2016

समय

      समय

समय का चक्र तेज़ी से
घूम रहा है
और
तेज होती जा रही है
निकलते समय की रफ़्तार

तेज़ वेग से बहते समय को
में हाथों में समेटना चाहती हूँ
पर वो फिसल रहा है मुठ्ठी से
रेत की तरह

सोच रही हूँ ,आज तक
कितने घंटे ,मिनट और सेकिंड निकल गए
और इसमें मैंने अपने लिए कितने पल जुटाए ?

मेरा अपना समय बंटा है
मेरे अपनों के बीच
बेटी,माँ ,पत्नी,भाभी और बहु बनते बनते
मैं अपने ही समय से दूर हो गई
मेरा अपना समय
 बंटा है सबके बीच
और मैं अकेली खड़ी हूँ
कैसी विडम्बना है ?
मेरी अपनी ज़िन्दगी
अपने ही समय से
कुछ पल नहीं चुरा पाती

सिम्मी मदन मैनी









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