मैं बहती जाऊँगी
मैं बहती जाऊँगी
ऊँची दुनिया की फांद दिवारें
अम्बर को , छू जाऊँगी
प्रश्नों की माला कंठ दबाती
सांसे भी तेज़ाब हुई
अब तक सिर्फ जवाब दिए हैं
अब आवाज़ उठाउंगी
घूमे क्यों गुमनाम लुटेरा
अपनों और बेगानों में
मुझे सजा और उसे आज़ादी
अब मैं ना सह पाऊँगी
चोट है गहरी ज़ख़्म हैं रिसते
मन में टीस हज़ारों हैं
फिर भी खुद के घाव भरूँगी
मंज़िल को पा जाउंगी
मैं बहती जाऊँगी
ऊँची दुनिया की फांद दिवारें
अम्बर को , छू जाऊँगी
सिम्मी मदन मैनी
मैं बहती जाऊँगी
ऊँची दुनिया की फांद दिवारें
अम्बर को , छू जाऊँगी
प्रश्नों की माला कंठ दबाती
सांसे भी तेज़ाब हुई
अब तक सिर्फ जवाब दिए हैं
अब आवाज़ उठाउंगी
घूमे क्यों गुमनाम लुटेरा
अपनों और बेगानों में
मुझे सजा और उसे आज़ादी
अब मैं ना सह पाऊँगी
चोट है गहरी ज़ख़्म हैं रिसते
मन में टीस हज़ारों हैं
फिर भी खुद के घाव भरूँगी
मंज़िल को पा जाउंगी
मैं बहती जाऊँगी
ऊँची दुनिया की फांद दिवारें
अम्बर को , छू जाऊँगी
सिम्मी मदन मैनी

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