Monday, 29 August 2016

आम गृहिणी

आम गृहिणी

आएँ मुझ से मिलें
मैं हूँ एक आम गृहिणी
रसोई में काम करती
पसीने में तरबतर
राजमां और पालक पनीर की सुगंध
मुझे कई बार स्वपन लोक में ले गई
मैंने कई बार बेलन को माइक
और थाली को डफली बनाया
जब बच्चों को सच बोलना सिखाया
तो देश के आने वाले
 सुन्दर भविष्य की कल्पना की मैंने
घर में झाड़ू लगाते हुए
कई बार पाया
कि जैसे में समाज की बुराईयों को
दूर हटा रही हूँ
निचुड़ते कपड़ों से निकली पानी की धार
और झाड़ पोंछ से उड़ती मिट्टी में
मैंने जो सपने संजोए
आज उन्हें हकीकत में बदल डाला
क्योंकि आज होंसला है मुझमें
सपने देखने का
आगे बढ़ने का
और कुछ कर दिखाने का
आएँ मुझ से मिलें
मैं हूँ एक
आम गृहिणी

सिम्मी मदन मैनी

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