पतंग
मैं एक पतंग हूँ
जिसकी डोर
तुम्हारी उंगलियों में फंसी है
तुमने जब फरिश्ता बनना चाहा
तो मुझे ढील दी
और जब ताकत का
एहसास दिलाना चाहा
तो खींच लिया
तेज़ हवा के थपेड़ों से
जूझ रही हूँ मैं
और इस डर से उड़ रही हूँ
कि जाने कब खींच ली जाऊँ
अपनी उँगलियों पर भरोसा कर
इस पतंग को ढील दो
क्योंकि जब पतंग किसी
मुकाम पर पहुँचेगी
तो उसमें भी
नाम तुम्हारा होगा
सिम्मी मदन मैनी
जिसकी डोरतुम्हारी उंगलियों में फंसी है
तुमने जब फरिश्ता बनना चाहा
तो मुझे ढील दी
और जब ताकत का
एहसास दिलाना चाहा
तो खींच लिया
तेज़ हवा के थपेड़ों से
जूझ रही हूँ मैं
और इस डर से उड़ रही हूँ
कि जाने कब खींच ली जाऊँ
अपनी उँगलियों पर भरोसा कर
इस पतंग को ढील दो
क्योंकि जब पतंग किसी
मुकाम पर पहुँचेगी
तो उसमें भी
नाम तुम्हारा होगा
सिम्मी मदन मैनी
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