Thursday, 4 August 2016

वरदान

          वरदान

रूप निखरने लगा है मेरा
चेहरे की महीन लकीरों
और झुर्रियों के झुरमुट में

हर लकीर में कैद हैं
कुछ खट्टे  मीठे अनुभव
कुछ राज़
और कुछ सुनहरी यादें


 काले बालों से झाँकती है
हलकी सफेदी
जैसे काली गहरी रात में
बिखर जाती है चांदनी
और रोशन कर देती है
हर ज़र्रे को

ढलता शरीर  थिरकने लगता है
बीते वक़्त की ताल पर
और कयानात पीठ थपथपाती है मेरी
ठंडी हवा होले से
कान में फुसफुसाती है
"मुझे नाज़ है तुम पर ,,,
इसे कहते हैं ज़िंदादिली से जीना "


और
 मुझे एकाएक अहसास होता है कि
 उम्र का यह पड़ाव
 किसी वरदान से कम  नहीं
यह तो एक खज़ाना है
अनुभवों  का
जो मैं अभी अपनों में बाँट रही हूँ
और इसे  में यहीं एक दिन
 मेरे अपनों के लिए छोड़ जाऊँगी

सिम्मी  मदन मैनी









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