Monday, 29 August 2016

चरित्र

 
        चरित्र

सड़क पर सिसकती वो औरत
आस पास पड़े निवाले संभाल रही थी
माथे पर पड़ी गहरी लकीरें
और होठों से बहता खून
लगातार पड़ते पत्थर
और लोगों में
उसे मार डालने का जुनून
मुझे डरा रहा था

भीड़ भरी थी इज़्ज़तदार समाज के ठेकेदारों से
बेरहमी के आसमान में चमकते बुज़दिल सितारों से
तानों की बौछार उस पर पड़ती रही
और वो चुप्पी से उन इज़्ज़तदारों से लड़ती रही
खून से लथपथ वो कराह रही थी
और लोगों की उठती उँगलियाँ
उसे बेबस बना रही थी

तभी एक तेज़ आवाज़ गूंजी
चरित्रहीन औरत तन बेचती है अपना
और उसी से
पूरा करती है हर सपना
मैंने घृणा भरी दृष्टि से उसे देखा
मैं  कोशिश करने लगी
उसके चरित्र को आंकने की
और उसके सपनों में झाँकने की


तभी भीड़ चीरते चार बच्चों ने
उसकी ऊँगली थाम ली
उम्मीद भरी निगाह से देखते हुए बोले
"दीदी !आज भी खाना नहीं लाई ?"
अपने चेहरे से रिसते लहू को पोंछते हुए
वो बचे खुचे निवाले उन मासूमों को खिलाने लगी
बच्चे खाना खाते हुए मुस्क़ुरा रहे थे
और मैं बुत  बनी खड़ी सोच रही थी
कि  आखिर चरित्र की परिभाषा क्या है ?

सिम्मी मदन मैनी






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