Thursday, 4 August 2016

पराया घर

         पराया घर

यह सिन्दूर बड़ा भारी है
देखो ना फैलने लगा है
सुनहरे भविष्य के चाँद पर
एक ग्रहण की तरह
और
 बचपन भी  मरने लगा है
जिम्मेदारी के सख्त दुप्पट्टे से

बंद हो रही हैं आँखें
और कोमल सपने पनपने से पहले ही
सलाखों में कैद हो रहे हैं

बुझने लगा है मुस्कान का दिया
बंधने के डर  से
और सांसें घुटने लगी हैं

कैसे झेल पाएंगे ?
मेरे मासून कंधे इस बोझ को
अभी तो में खुद ही
 संभलना नहीं सीख पाई

बाबा ,,,,,,
क्या मैं कुछ दिन और यहाँ रह सकती हूँ ?
जहाँ मैं जन्मी
या फिर
बेटी पैदा ही पराये घर में होती है ?

सिम्मी  मदन मैनी









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