Thursday, 6 September 2012

पैंसिल - रबड़

          पैंसिल - रबड़ 

मेरे हाथों में कर्मों कि पैंसिल 
तेज़ी से जीवन के,,,,
कागज़ पर दौड़ती
कई गलतियाँ करती
कभी छोटी तो कभी बड़ी
पर,,,,,,
रुक कर देखने का समय कहाँ?
इस अंधी दौड़ में
और,,,,,,,
जीवन के यह कहानी
घिसी  हुई पैंसिल के साथ
यूँ ही बढती जाती

फिर,,,,
एक दिन जब टूटता 
सिक्का इस पैंसिल का तो
होश उड़ जाते,,,,
और अपनी भूल नज़र आती
उफ्फ्फ्फ़!!!!
इतना काला कागज़ मेरे जीवन का
और इतनी साड़ी गलतियाँ?
क्या यह छोड़ कर जाऊँगी मैं?
नहीं! नहीं!,,,,,,
चलो पीछे चलती हूँ
ज्ञान का रबड़ लेकर
आज सभी सड़े गले संस्कारों,संकल्पों और सोच को
मिटा दूँगी ,,,
परमात्मा के दिए इस ज्ञान के रबड़ से
और फिर होगा हाथों में 
एक साफ़ चमकता जिंदगी का नया कागज़
शुद संकल्पों के सिक्के से बनी कर्मों कि पैंसिल 
अब चलेगी इस कागज़ पर
और इस ज़िन्दगी का इन्साफ कर जाएगी

सिम्मी मदन  मैनी        
07 sept 2012

Wednesday, 15 August 2012

मैं और चाँद

मैं और चाँद

आज दिल ने फिर चाहा 
कि ,,,,,,
छू लूं ,,,,
उस  चाँद को 
जो रोज़ रात मेरी छत पर 
चमकता है 
सफ़ेद दूधिया गेंद सा 
शीतलता का प्रतीक 
सुहागनों का भगवान
और,,,,,,,,,
बुझे दिलों को राहत देता 
सुन्दर उर्जा स्रोत 

मन कि सीढ़ी पर चढ़ कर
मैं पहुंची चाँद पर,,,,
उफ्फ़ !!!!!!!
तुम कितने विरान हो
ऊबड़ खाबड़ ,,,,
नज़रें तलाश  रही है
तुम्हारी रोशनी की
एक किरण
पर तुम्हारी अपनी रोशनी कहाँ ?

ऐ !चाँद 
तुम तो बिल्कुल मेरे जैसे हो 
उसकी रहमत ही चमकाती है तुम्हे
और तुम इतना मान पाते हो
पल भर को सोचो ,,,,,,
अगर यह गृह 
सूरज के चक्कर ना लगाते 
तो तुम,,,,
किसकी  रोशनी पा कर
खुद पर इतराते 
और इतना मान पाते

शायद तुम और मैं दोनों ही
उसकी दया और प्रेम के बिना 
इस ब्रह्माण्ड में
अनजान से कहीं खो जाते
अनजान से कहीं खो जाते 

सिम्मी मैनी 
15 august 2012

Friday, 20 July 2012

ठीक तो है ना ?

   ठीक तो है ना ?

ज़रा रुकिए
मैं अभी मसरूफ हूँ       
अपने साथ 
बरसों बाद,,,,
खुद को देख रही हूँ
और,,,,
ठहर  कर
खुद से पूछ रही हूँ
सिम्मी !!!!!
तू ठीक तो है ना?

शरीर तो थका था मेरा
पर वो तो,,,,
सिर्फ इशारा था
बीमार तो मैं थी
सबका हाल चाल पूछती
सबको सहलाती 
समझाती ,,,
उनके घावों पर
मरहम लगाती
खुद को कैसे भूल गयीं?

आज वक़्त मिला
तो जाना
सबसे पहली जिम्मेदारी 
अपने लिए
अगर मैं ही ठीक नहीं तो
कैसे सम्भालूंगी उन्हें
जो अपने हैं

आज खुद को सहलाया
अपने घावों पर
प्रेम का मरहम लगाया
तो मेरा चोला भी 
साफ़ नज़र आने लगा
अब सोचा है
इस सफ़र में
घड़ी दो घड़ी रुक कर
अपना हाल चाल 
पूछ लिया करुँगी 
और दर्द से 
आज़ाद हो जाऊँगी
मेरा इरादा तो पक्का है
और ,,,
आपका क्या ख्याल है?

सिम्मी मैनी 

Thursday, 19 July 2012

संकल्प

    संकल्प       

यह मेरे संकल्प हैं
या फिर चुम्बक 
ना जाने कैसे
इतनी तेज़ रफ़्तार से
अपने जैसी परिस्थिती
मेरे जीवन में 
खींच लाते हैं
हाँ !!
बिखरी जो पड़ी हैं
ढेरों परिस्थितियां 
इस विस्तृत ब्रह्माण्ड में 
अपने जैसे संकल्प के 
इंतज़ार में,,,,,,,
इधर मैंने सोचा
और उधर पाया

अब तो अपने
हर विचार पर
नज़र रखती हूँ
जांचती रहती हूँ उन्हें
पल पल
कहीं भटक ना जायें
भूले से भी,,,,,
ना आ जाए कहीं 
नफरत और बेचारगी
इस चंचल मन 
और,,,,,,
तेज़ी से
दौड़ते दिमाग में 

जानती हूँ
बस क्षण भर में उतरेगी
संकल्प से मिलती परिस्थिती 
मेरे जीवन में
और फिर मैं 
प्रभु से पूछूंगी 
मेरे साथ ही ऐसा क्यों ?
और परमात्मा का
फिर वही पुराना जवाब
मुझसे क्या पूछती हो?
अपने संकल्पों से पूछो
अपने संकल्पों से पूछो 

सिम्मी मैनी 

Tuesday, 17 July 2012

रोटी

       रोटी

जब  प्रेम का आटा
लगाव के पानी में 
पड़ता है,,,,,,
तो,,,,,
माँ के हाथों में
आटे का पेडा  नहीं
संतान का भविष्य 
पनपता है

जब दुआओं का बेलन
भविष्य के पेड़े  पर
चलता है,,,,
तो,,,,
उम्मीद कि मंद आंच पर
रोटी के रूप में ....
हर माँ का सपना फलता है

माँ के शुद्ध संकल्पों की 
रोटी जब पकती है
तो ईश्वर भी उसपर
अपनी रहमत की
वर्षा करता है
माँ के भजनों का घी
जब रोटी में रचता है
तो,,,,,
पेट की नहीं
आत्मा की भूख 
तृप्त करता है

माँ के विचारों का
हर एक निवाला
किसी शख्स की
इंसानियत
तो किसी की
हैवानियत 
बयां करता है

अगर शुद्ध भाव से 
भरा हो निवाला 
तो प्रसाद का
और अगर,,,,
नफरत से भरपूर हो तो
आत्मा के लिए
विष का काम करता है

जब भी तवे पर सिकती 
रोटी देखती हूँ
तो जानती हूँ
आज मंद आंच पर
किसी का 
वजूद पकता है
वजूद पकता है
                        
सिम्मी मैनी 

Thursday, 28 June 2012

मेरा मकान खाली करो

मेरा मकान खाली करो 

भाई !!!
बड़ा डंका बजता है
तुम्हारे नाम का
और,,,,
खूब मान भी पाते हो
बचपन से बच्चों को
घुट्टी की तरह 
पिलाये जाते हो 

घुट्टी का काम किया है
तो दौड़ते हो ,,,,
इन रगों में भी
पर,,,,,,,
बड़ी अजीब बात है 
ऐ ! सत्य
तुम पनाह भी
मुझमें लेते हो
और,,,,
साथ भी नहीं निभाते

जिस जिस्म से,,,,
तुम्हारी सांसें चलती हैं
उसका तो कुछ
मान करो,,,,
बस हर बार 
यही कहते हो
"मेरा साथ सरल नहीं
पर,,,
अंतिम जीत मेरी"

अब बस भी करो
और मत बनाओ  मुझे 
सालों बीते ,,,,
अरे अब तो,,,
मेरा जाने का 
वक़्त हुआ
या तो अपनी
जीत का जलवा 
दिखाओ  मुझे 
नहीं तो चलो,,,,,
जल्दी से,,,
मेरा मकान खाली करो
मेरा मकान खाली करो 

सिम्मी  मैनी

29 जून , 2012

Wednesday, 27 June 2012

ख्वाब

   ख्वाब

मेरी दुआ है कि
कोई आँख 
रूखी ना रहे
हर आँख में हरदम
एक बड़ा ख्वाब
तैरना चाहिए
हर बड़ी उपलब्धी 
हर बड़ा बदलाव
पहले एक ख्वाब था
जो किसी दिलवाले ने देखा

कौन जानता था कि 
हम हवा में परिंदों से
उड़  पाएंगे ,,,,,
या फिर कभी चाँद की
सैर को जाएँगें,,,,
यह भी तब 
एक  खवाब होगा
एक धुंदली तस्वीर
जिस में किसी ने
विश्वास के रंग भरे होंगे 
और हिम्मत के केनवस पर 
बनी इस तस्वीर ने,,,
उस ख्वाब पर हंसने वालों के 
मुँह  सी दिए होंगे,,,,,

तो क्यों ना हम भी
दिल ख़ोल के सपने देखें 
जाने किसने कह दिया ?
जितनी चद्दर उतने पैर पसारो
मैं  तो कहती हूँ 
चलिए,,,,,,
हम  अपनी 
सोच  की हदों को बढ़ा कर
 अपने ख्वाबों की चद्दर को
 इतना  बड़ा कर लें कि
तमाम खुशियाँ भी
उसमें समाने को
कम पड़ जाएँ 

यकीन मानिये 
मैं झूठ नहीं कहती
ये सपने ही हैं
जो एक दिन 
हकीकत बन जाते हैं
मेरी आँखें तो किसी 
बड़े सपने की
तलाश में हैं 
क्या आपकी आँखों में  भी
कोई बड़ा सपना तैरता है?

सिम्मी मैनी 

अनजान मुसाफिर

       अनजान  मुसाफिर 

रेलगाड़ी कि पटरी को तकती 
मेरी थकी, सपाट ,शुष्क आँखें 
भविष्य की उलझनों में उलझी 
और,,,,,,,,
पटरी और गाड़ी के बीच
मानो चीखते  सवाल
जो सीना चीर रहे हैं 
क्या करूँ ?
 कैसे करूँ?
कल क्या होगा?
कैसे होगा ?

और  वहां ,,,,,,,
सामने की बर्थ पर
एक अनजान मुसाफिर
थोडा मगरूर
थोडा अभिमानी
और,,,
थोडा मशीनी
लाख़ों ,करोडो के हिसाब में उलझा
लेपटाप और फोन से चिपका
लंच में इंसुलिन के इंजेकशन  खाता 

बहनजी ,,,,,
ये ज़मीन देखती हैं?
जहाँ तक नज़र जाती है
सब मेरी है,,,,,
अभी मुंबई में
 फलां जमीन का सौदा है
उसकी बंद आँखों से 
अरबों ,खरबों के सपने 
झांक रहे थे,,,,,,

मेरा हाथ उसके काँधे पर
और मैं बोली 
भाई साहब ,,,,,
स्टेशन  आ गया,,,,,,,,,,,,,
उफ्फ़!!!!
अनजान मुसाफिर का सफ़र 
यहीं खत्म हुआ,,,,,,,,,
अब,,,,,,,,,,
शून्य  में चीखती आवाजें 
अरे देखो कौन है?
कहाँ से आया है?
अरे भाई !
कोई वारिस है?
या यहीं दफना दें,,,,,,,,,,

मैं सोच रही हूँ
किस भविष्य की चिंता ?
आज अनजान मुसाफिर
वर्तमान में,,,,
जीना सिखा गया 
वर्तमान में,,,,,,
जीना सिखा गया 

सिम्मी मैनी 

Friday, 15 June 2012

चौखट ,,,,,,,,,,,

   चौखट 

चौखट के उस पार 
वो खड़ी अकेली 
कुछ सहमी सी
मुरझाई सी
हर छोटी बात की
सफाई देती,,,,,,,,
जिंदगी के
टूटे टुकड़ों को समेटती 
हर पल खुद से लड़ती
तो  कभी,,,,,,,
आस  भरी नज़रों से
हम औरतों को देखती 

और ,,,,,,,
चौखट  के इस पार
हम सब औरतों की 
भारी तादाद
तमाशा देखती 
बहुमत के साथ  चलती 
घिसी पिटी लकीरों को
पीटती ,,,,,,,
इर्ष्या की आग में जलती 
सिर्फ,,,,,,,,
ऊपर वाले के नाम की
दुहाईयां देती
यहाँ,,,,,,,,,,
एक नारी दूसरी नारी
के सम्मान का हरण करती
अपनी जिम्मेदारी से भागती 
और सिर्फ ,,,
पुरुषों पर दोषारोपण करती
यह भूल कर,,,
की कल,,,
हममें में से भी
कोई एक कभी 
चौखट के उस पार
हो सकता है,,,,,,,,,

सिम्मी मैनी 

Saturday, 2 June 2012

पाठ ,,,,,

हाँ ! हाँ !
आप ही से कह रही हूँ
आभार !!!
मुझसे टकराने का
मेरा दिल दुखाने का
दुखी मत होना तुम
मेरे घाव देख कर
कि,,,,,
यह तो वक़्त कि मरहम से
भर ही जायेंगे ,,,
शुक्रिया ! तहे दिल से
जीवन का नया 
पाठ पढ़ाने का

सिम्मी मैनी 

स्त्री .........

 
 स्त्री 

मैं स्त्री
त्याग के कोयले में 
जलाकर खुद को
तुम्हारे जीवन की 
सिलवटें  निकालती
एक इस्त्री की तरह

तुम्हारा जीवन तो
संवर गया 
मेरे सपनों के
जलने से
और कायदे से
जिंदगी की
अलमारी  में
सज भी गया 

पर एक बात जान लो
अगर मैंने खुद तप कर
तुम्हे नहीं संवारा तो
तुम्हारे मुचड़े 
अस्तित्व की गठड़ी 
यहीं कहीं पड़ी
नज़र आएगी
घर के किसी कोने में 

सिम्मी मैनी 

Thursday, 24 May 2012

दाग ,,,,,,,,,



    दाग 

चांदनी तो तुम्हारी
कहलाती  है सदा
और मान भी पाती है,,,,,
पर,,,,,,,,,,,,,
ऐ चाँद !!!!!
मैं तुम्हारे 
चेहरे का 
वो दाग हूँ
जो खुद 
बदनाम होकर 
तुम्हे बुरी नज़र से 
बचाता है,,,,,,,,
और यही प्यार है,,,,,
हाँ!!!!!!!!!!!!
यही प्यार है,,,,,
और 
हर प्यार करने वाले को
अपनी मंजिल मिले 
ये ज़रूरी तो नहीं,,,,

सिमी मैनी 

Tuesday, 22 May 2012

वजूद .....





     वजूद 

लोग तो यूँ ही
आसमान को छूने 
के लिए इतनी 
जद्दो जहेद करते हैं
मैंने तो पहले से ही
अपने ख्वाबों और ख्वाहिशों को
आसमान में टांका है
ये जो ज़री वाला आसमान 
चमकता है ना,,,,
दरअसल ,,,
मेरा वजूद है

ये समेटे है
मेरी हर इच्छा 
और आशा को
जो रोज़ रात
टिमटिमाती है
और अपने होने का 
एहसास दिलाती है

आत्मा जो चाँद सी 
चमकती है
करती है पहरेदारी
मेरे सपनों की
डरती है ,,,
कहीं थक कर
मेरी कोई खवाहिश 
सो ना जाये,,,

क्या आपका वजूद भी
इस विस्तृत गगन सा
विशाल है?
जो,,,,,,
परिस्तिथियों के 
गरजते बादलों
और दर्द की कड़कती 
बिजली से भी
विचलित नहीं होता 
और उम्मीद के 
हर तारे को 
सहेज कर
रखता है

सिम्मी मैनी 

Wednesday, 16 May 2012

छाप ,,,,,

    छाप 

इस धड़कते दिल ने कभी
उम्मीदों के फर्श  पर 
ख्वाबों की खूबसूरत 
छाप छोड़ी थी
सूरज की पहली किरण  सी 
मासूम छाप,,,,,
ओस की पहली बूँद सी
पवित्र छाप,,,,,
नए रिश्तों में
अपना वजूद बनाती
सहमी, भोली छाप
प्रेम के हर पड़ाव पर
जाना चाहती थी

और फिर,,,,,,,,,,
वक़्त के चलते
ख्वाबों के फर्श  पर 
असलियत की काई 
जमने लगी,,,
और रंगीन छाप  के
रंग फीके पड़ गए,,,,
खोजने लगी
वजूद  अपना
बेरहमी की तिलकन में,,,,
और फिर उसने 
चकनाचूर फर्श में
अपने  ही
वजूद के
टूटे  टुकड़ों का
अक्स देखा

सोचती हूँ
क्यों ना
एक बार फिर 
आशा के रंग में 
पैर डुबो लूं
और जिंदगी के फर्श  पर 
आशा के नए निशां 
बना लूं,,,,
की यह निशां ही तो
मेरी पहचान हैं

सिम्मी मदन  मैनी 

Tuesday, 15 May 2012

ज़िन्दगी.....

आज के  उन्वान **** ज़िन्दगी / जीवन **** पर मेरी एक रचना   " ज़िन्दगी "  पेश  है  ,,,,,,

    ज़िन्दगी

क्या तुम बता सकते हो?
कि,,,,
मेरी  ज़िन्दगी तुमसे
और,,,,
तुम्हारी ज़िन्दगी उससे
अलग क्यों है?
किसी की ज़िन्दगी है  रंगीन 
तो किसी की हसीन 
किसी की  है बेरंग 
किसी की मस्त मलंग
किसी की है दर्द 
तो किसी की सुकून
किसी की है उल्फत
तो किसी की जूनून

रब से तो 
मिला था सबको 
एक  सुन्दर शरीर 
और सोच का 
खूबसूरत केनवस 
हम ही ने 
अपने विचारों के
ब्रश को,,,,
संस्कारों के रंगों 
में डुबो कर,,,,
अपने अनुभव से
जो चित्र 
उस केनवस पर बनाये
बस वही ज़िन्दगी बन गए
और हम सबकी 
ज़िन्दगी की परिभाषा 
एक दूसरे से
अलग हो गयीं          

सिम्मी मदन  मैनी        

Wednesday, 9 May 2012

जाने क्यों ?,,,,



जाने क्यों ?
आज  आँख
फिर से नम 
और दिल 
परेशान  है 
लगता है
वक़्त की सुई में 
क्षमा का धागा 
डाल कर
अतीत के 
जिस ज़ख़्म को
सिया था कभी
उसका कोई टांका
आज,,,,,,
किसी भारी चोट से
उधड़ गया है
और घाव फिर से
रिसने लगा है 

सिम्मी मैनी 

Sunday, 6 May 2012

मोह ....

     मोह 

जब भी कोई कहता है
वाह! क्या खूबसूरत वृक्ष  है 
तो झूम उठता है वृक्ष 
और पत्ते 
खिलखिलाने लगते हैं
ख़ुशी से,,,
लिपट  जाती हैं डालियाँ
और फल  भी
अपनी मिठास  पर 
इतराने लगते हैं
 गर्व से और भी 
तन जाता है तना 
और सब ही 
अपने  अपने गुणों की
गौरव गाथा सुनाने लगते हैं
मिल कर सभी घंटो 
चेह्चाहते हैं
अपनी प्रशंसा का
जश्न  मानते हैं

शायद ,,,,,
भूल  जाते हैं मुझे
मैं उपेक्षित जड़ यहाँ 
मिटटी  में जो दफ़न हूँ
आज भी इन्हें
अपने  खून से
सींचती हूँ
मेरे  अपने हैं  ना

तभी मुझ पर होता है
खुरपी का मज़बूत वार
मेरी सांस थम सी जाती है
झेल लेती हूँ उसे भी
मुस्कुरा कर
ताकि ये सब
सांस ले सकें

कोशिश करती हूँ
खुद को बचाने की
आज  भी,,,
कि
मेरे दम तोड़ते ही
इस अभिमानी वृक्ष  का 
वजूद मिट जायेगा
पता नहीं
मुझे किनारा करने वालों से
मुझे इतना मोह क्यों है?

सिम्मी मैनी 

Wednesday, 25 April 2012

कलम .....

    कलम 

क्यों होता है ऐसा
कभी  कभी,,,
कि,,,,,
कलम कुछ नहीं
लिख  पाती 
क्या वो भी
थक जाती है 
नहीं ,,,,,,नहीं,,,,,
शायद मेरे ही मन में
विचारों की स्याही 
थकान की बर्फ से 
जम जाती है

दुनियादारी की तीखी 
सर्द हवाओं  से
ठिठुरने लगता है 
दिलो दिमाग,,,
और हार कर
खुद को
अकेलेपन की चारदीवारी में
बंद कर लेता है
शायद एकांत में
रहना चाहता है
कुछ पल,,,,

और कुछ देर बाद
यही बांवरा मन
ख़ामोशी में
किसी हरकत की
आवाज़ सुनना चाहता है
सन्नाटे की खिड़की
खोलता है दिमाग

और अब,,,,
कलम में जमी 
विचारों  की 
पत्थर सी स्याही
जीने के जस्बे की 
मंद आंच  से 
पिघल जाती है
और कलम 
एक  बार  फिर 
रफ़्तार पकड़ लेती है,,,,,,,,,
क्या आपके साथ भी  
ऐसा ही होता है?

सिम्मी मैनी 

Sunday, 15 April 2012

भूख ............

    भूख 

उफ्फ्फ!!!!
यह भूख  भी 
इंसान को
क्या से क्या 
बना देती है
इतनी बलवान 
है यह भूख
कि उसूलों ,आदर्शों को
जड़ से हिला देती है

भूख पेट की
सम्मान की
प्रशंसा की
पहचान की
धन की
मान की
तालियों की
गडगडाहट की
नाम की

जब लेती है
भूख अंगड़ाई 
तो तूफ़ान 
आते हैं
और इस ज़लज़ले में
कमज़ोर लोग
अपना अच्छा बुरा
कहाँ सोच पाते हैं?

गिरवी होते हैं ज़मीर
और हम
नामुराद भूख के
गुलाम बन जाते हैं
बस शांत करनी है भूख
और आगे बढ़ना है
क्या हमें अपने स्वाभिमान 
की कब्र पर
अपनी खोखली 
पहचान का
नया इतिहास गढ़ना है??

सिम्मी मैनी         भूख