छाप
इस धड़कते दिल ने कभी
उम्मीदों के फर्श पर
ख्वाबों की खूबसूरत
छाप छोड़ी थी
मासूम छाप,,,,,
ओस की पहली बूँद सी
पवित्र छाप,,,,,
नए रिश्तों में
अपना वजूद बनाती
सहमी, भोली छाप
प्रेम के हर पड़ाव पर
जाना चाहती थी
और फिर,,,,,,,,,,
वक़्त के चलते
ख्वाबों के फर्श पर
असलियत की काई
जमने लगी,,,
और रंगीन छाप के
रंग फीके पड़ गए,,,,
खोजने लगी
वजूद अपना
बेरहमी की तिलकन में,,,,
और फिर उसने
चकनाचूर फर्श में
अपने ही
वजूद के
टूटे टुकड़ों का
अक्स देखा
सोचती हूँ
क्यों ना
एक बार फिर
आशा के रंग में
पैर डुबो लूं
और जिंदगी के फर्श पर
आशा के नए निशां
बना लूं,,,,
की यह निशां ही तो
मेरी पहचान हैं
सिम्मी मदन मैनी

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