कलम
क्यों होता है ऐसा
कभी कभी,,,
कि,,,,,
कलम कुछ नहीं
लिख पाती
क्या वो भी
थक जाती है
नहीं ,,,,,,नहीं,,,,,
शायद मेरे ही मन में
विचारों की स्याही
थकान की बर्फ से
जम जाती है
दुनियादारी की तीखी
सर्द हवाओं से
ठिठुरने लगता है
दिलो दिमाग,,,
और हार कर
खुद को
अकेलेपन की चारदीवारी में
बंद कर लेता है
शायद एकांत में
रहना चाहता है
कुछ पल,,,,
और कुछ देर बाद
यही बांवरा मन
ख़ामोशी में
किसी हरकत की
आवाज़ सुनना चाहता है
सन्नाटे की खिड़की
खोलता है दिमाग
और अब,,,,
कलम में जमी
विचारों की
पत्थर सी स्याही
जीने के जस्बे की
मंद आंच से
पिघल जाती है
और कलम
एक बार फिर
रफ़्तार पकड़ लेती है,,,,,,,,,
क्या आपके साथ भी
ऐसा ही होता है?
सिम्मी मैनी
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