Wednesday, 27 June 2012

अनजान मुसाफिर

       अनजान  मुसाफिर 

रेलगाड़ी कि पटरी को तकती 
मेरी थकी, सपाट ,शुष्क आँखें 
भविष्य की उलझनों में उलझी 
और,,,,,,,,
पटरी और गाड़ी के बीच
मानो चीखते  सवाल
जो सीना चीर रहे हैं 
क्या करूँ ?
 कैसे करूँ?
कल क्या होगा?
कैसे होगा ?

और  वहां ,,,,,,,
सामने की बर्थ पर
एक अनजान मुसाफिर
थोडा मगरूर
थोडा अभिमानी
और,,,
थोडा मशीनी
लाख़ों ,करोडो के हिसाब में उलझा
लेपटाप और फोन से चिपका
लंच में इंसुलिन के इंजेकशन  खाता 

बहनजी ,,,,,
ये ज़मीन देखती हैं?
जहाँ तक नज़र जाती है
सब मेरी है,,,,,
अभी मुंबई में
 फलां जमीन का सौदा है
उसकी बंद आँखों से 
अरबों ,खरबों के सपने 
झांक रहे थे,,,,,,

मेरा हाथ उसके काँधे पर
और मैं बोली 
भाई साहब ,,,,,
स्टेशन  आ गया,,,,,,,,,,,,,
उफ्फ़!!!!
अनजान मुसाफिर का सफ़र 
यहीं खत्म हुआ,,,,,,,,,
अब,,,,,,,,,,
शून्य  में चीखती आवाजें 
अरे देखो कौन है?
कहाँ से आया है?
अरे भाई !
कोई वारिस है?
या यहीं दफना दें,,,,,,,,,,

मैं सोच रही हूँ
किस भविष्य की चिंता ?
आज अनजान मुसाफिर
वर्तमान में,,,,
जीना सिखा गया 
वर्तमान में,,,,,,
जीना सिखा गया 

सिम्मी मैनी 

No comments:

Post a Comment