Sunday, 6 May 2012

मोह ....

     मोह 

जब भी कोई कहता है
वाह! क्या खूबसूरत वृक्ष  है 
तो झूम उठता है वृक्ष 
और पत्ते 
खिलखिलाने लगते हैं
ख़ुशी से,,,
लिपट  जाती हैं डालियाँ
और फल  भी
अपनी मिठास  पर 
इतराने लगते हैं
 गर्व से और भी 
तन जाता है तना 
और सब ही 
अपने  अपने गुणों की
गौरव गाथा सुनाने लगते हैं
मिल कर सभी घंटो 
चेह्चाहते हैं
अपनी प्रशंसा का
जश्न  मानते हैं

शायद ,,,,,
भूल  जाते हैं मुझे
मैं उपेक्षित जड़ यहाँ 
मिटटी  में जो दफ़न हूँ
आज भी इन्हें
अपने  खून से
सींचती हूँ
मेरे  अपने हैं  ना

तभी मुझ पर होता है
खुरपी का मज़बूत वार
मेरी सांस थम सी जाती है
झेल लेती हूँ उसे भी
मुस्कुरा कर
ताकि ये सब
सांस ले सकें

कोशिश करती हूँ
खुद को बचाने की
आज  भी,,,
कि
मेरे दम तोड़ते ही
इस अभिमानी वृक्ष  का 
वजूद मिट जायेगा
पता नहीं
मुझे किनारा करने वालों से
मुझे इतना मोह क्यों है?

सिम्मी मैनी 

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