Monday, 14 February 2022

चुनाव (choice)

           चुनाव (choice)


कौन कहता है कि हम 

हर बीतते पल के साथ मिट रहे हैं 

मुझे तो हर  बीतता पल बना रहा है 

हर घडी में कुछ चुन रही हूँ 

और यही चुनाव मुझे बनाता जा रहा है 

मैं चुनाव करती हूँ खुद को व्यक्त करने का

मेरा हर चुनाव मेरे व्यक्तित्व का आईना है 


मैं  क्या कहती हूँ ,कैसे कहती हूँ 

क्या करती हूँ कैसे करती हूँ 

कैसे लोगों में उठती बैठती हूँ 

क्या सुनती हूँ ,क्या बोलती हूँ 

कैसी तस्वीरें बनाती हूँ 

क्या गाती  हूँ 

क्या लिखती हूँ 

क्या पढ़ती हूँ 

कैसा खाती हूँ 

क्या बनाती  हूँ 

कैसा व्य्वहार  रखती हूँ 

कैसे जीवन में आने वाली चुनौतियों का सामना करती हूँ 

सुख और दुःख में कैसी प्रतिक्रिया देती हूँ 


हर फिसलते पल के साथ मैं इन सब का चुनाव 

अपनी सोच और संस्कारों के मुताबिक करती हूँ 

हर पल मुझ में अनुभव जुड़ता जा रहा है 

जो ना सिर्फ मुझे पूरा कर रहा है 

अपितु  मुझे मेरे जीवन उद्देश्य की तरफ धकेल रहा है 


तो क्यों  न मैं  अपना हर चुनाव 

ईमानदारी और समझदारी से करूँ 

कि यही चुनाव  मेरा कर्मों का खाता बना रहा है 

और अगले  जन्म  तक मेरा साथ निभाएगा 





 

Monday, 7 February 2022

साथी या बैसाखी

                साथी या बैसाखी 


प्रियतम आज तुमसे जुड़ जाऊंगी मैं 

पर सिर्फ इतना चाहती हूँ कि 

तुम मेरे साथी बनना बैसाखी नहीं 


प्रेम तो करना मुझसे 

पर बांध मत लेना खुद से 

क्योंकि   कैद में पंछी  रोते  हैं गाते  नहीं 

कैसा   भी दाना  डालो 

आज़ादी की प्यास  मन से जाती नहीं 

प्रियतम  तुम मेरे साथी बनना बैसाखी नहीं 


दिन रात निहारना मुझे 

और इस क्षणभंगुर शरीर के भीतर 

मुझ तक पहुँच जाना 

गुफ़्तगू  करना मेरे सपनो से 

और दोस्ती का रिश्ता निभाना 

मालिक और गुलाम की बात

 मुझे रास  आती नहीं 

प्रियतम  तुम मेरे साथी बनना बैसाखी नहीं 


इठलाऊँगी मैं भी 

जब एक फूल की तरह 

नज़ाकत से संभालोगे मुझे 

पर ध्यान रहे 

फूल की खुशबू  हर दिल तक पहुँचती है 

सिर्फ माली को आती नहीं 

प्रियतम  तुम मेरे साथी बनना बैसाखी नहीं 


रंग पैलेट


              रंग पैलेट 

हाँ ! रंगरेज़ हूँ मैं 
ज़िन्दगी के हर रंग को ओढ़ा है मैंने 
 
कैसी रंग बिरंगी भावनाओं से 
सजी है मेरी ज़िन्दगी 
कभी करती ज़िंदगी खुशहाल तो कभी उदास 
हर रंग की अपनी महिमा ,अपनी भूमिका  

कहीं छलकता है
 सुर्ख लाल रंग प्यार वाला 
तो कहीं चटक पीला उम्मीद वाला 
कहीं समृद्ध हरा खुशहाली वाला 
तो कहीं पवित्र श्वेत शुद्धता वाला 
कहीं आसमानी नीला स्थिरता वाला 
तो कहीं गेरुआ नारंगी उमंग वाला 

पर जब कभी फैलता 
रहस्यमयी  काला  उदासी वाला 
तो वीरान हो जाती ज़िन्दगी 
फिर मैं अपनी सकारात्मक सोच से चुनती हूँ 
कोई प्यारा रंग ईश्वरीय रंग पैलेट  से 
और ज़िंदगी में घोल  देती हूँ 
ताकि ज़िन्दगी फिर से मुस्कुराने लगे 

मेरे रंग पैलेट  में रंग कम तो हो सकते हैं 
पर वह  कभी खाली  नहीं रहता 
रंगरेज़ में हुनर होना चाहिए
मौजूदा रंगो  को मिला कर 
नए रंग  बनाने का 
और 
प्रभु को शुक्राना करने का 
जिसने उसका रंग पैलेट ख़ूबसूरती से  सजाया 
तो ज़िंदगी का इंद्रधनुष सदा ही 
अपनी छटा  बिखेरता रहता है 

Thursday, 27 February 2020

           थोड़ा और चल लूँ 


सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा

बस इतना हो जाये
फिर नहीं कमायूँगा
पर जाने क्यों ?
इतना कभी पूरा होता ही नहीं
चाहतों वाला हिस्सा कभी सोता ही नहीं
अच्छा घर और सैटल्ड  बच्चे
अभी आरज़ू है मेरी
तभी तो करता हूँ  काम
उसमें नहीं होने देता की देरी
आरज़ू पूरी करनी कितनी मुश्किल है
किस किस को समझायूँगा
सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा


कोशिश सेहतमंद होने की
काम के साथ साथ चलती है
लेखिन दिल्ली की ज़हरीली हवा में भला
बिमारियाँ कब टलती  हैं
कभी इस सीमेंट के जंगल के बाहर
एक छोटा आशियाँ  बनायूँगा
सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा


चाहत अभी मन में अंगड़ाई लेती है
अपनों के लिए कुछ खास  करने की
एक दिन इन सबको वर्ल्ड टूर कराऊंगा
सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा


औसत 25000 दिनों की ज़िंदगी से
18000 दिन यूँही निकल गए
बचे हुए इन 7000 दिनों में
जाने क्या कर पायूँगा
सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा


जानता हूँ मन की शांति ही
असल मंज़िल है मेरी
शिवानी ,सद्गुरु ,बुद्धा में
तभी तो आस्था  है मेरी
खुद से पूछता हूँ
क्या में भी कभी
इन सा हो पायूँगा
सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा


जन्म ,परिवार, रिश्तेदारी और रुतबे में कुदरत
तूने सिर्फ अपनी चलाई
मैंने काठ जोड़ कर तेरा हुकम माना
सोचा इसी में होगी भलाई
पर इस अदद ज़िंदगी का एक हिस्सा
मैं अपने हिसाब से चलायूँगा
सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा


जाने कैसे कहते हैं ?
 कि  वो अपनी ज़िंदगी अच्छी जी गया
कौन जाने चाहतों का कौन सा हिस्सा वो
मन ही मन में पी  गया
कहीं मैं  अपनी चाहत वाली ज़िंदगी जीने से पहले
तो नहीं मर जायूँगा


सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ 
फिर में रुक जायूँगा 

नीरज चैकर
27 . 02 . 2020 























Monday, 30 July 2018

स्कूल के वो दिन


स्कूल के वो दिन

क्या तुम्हें याद है
मॉर्निंग असेम्ब्ली से बंक मारना
और उस समय में 
अपना होम्वर्क पूरा करना
यूँ ही कभी सुबह सुबह ड्यूटी ले लेना
ताकि लम्बी असेम्ब्ली से जान बच जाए
ज़ीरो पिरीयड के ख़त्म होने पर अफ़सोस करना
और टीचर के ना आने की दुआएँ माँगना
हौले हौले बातें करना
और बार बार घड़ी देख कर
पिरीयड के ख़त्म होने का इंतज़ार करना
लंच का रीसेस से पहले ही ख़त्म हो जाना
और गरमी में पानी की लम्बी क़तार में लगना
कभी कभी टीचर के ना पढ़ाने पर
ज़ोरदार जशन मनाना
साल शुरू होने पर
कापी किताबों को ब्राउन पेपर से कवर करना
और ख़ूब मेहनत करने की नाकाम क़सम खाना
पेपर पास आने पर तेज़ ताप चढ़ जाना
और पढ़ाई बनाने वाले को गालियाँ निकालना
अपने जन्म दिन पर फ़्रेंड्ज़ को ट्रीट देना
और अपने पैदा होने पर इतराना
छुट्टी के बाद भाग कर बस में सीट मलकना
और घर आने पर ख़ुशी से झूम जाना
जब बच्चें थे तो बड़े होने का
इंतज़ार करते रहे
आज बड़े होकर जाना
कि बीते स्कूल के दिन ही
ज़िंदगी के बेहतरीन दिन थे
तुम ही कहो
सच है ना

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन ....







  
कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन ....

यादों जे पिटारे को ज्यूँ ही खोला
कई मासूम और प्यारी समृतियाँ
मचल कर झोली में आ गिरी 
मैं उन्हें झटपट बटोरने लगी
कि कहीं कोई मेरे दामन से छूट ना जाए
यहीं तो मेरे जीवन के सबसे क़ीमती पल हैं
जिन्हें वक़्त की माला में पिरो के रखा है
तुम्हारा बचपन वो ख़ज़ाना है
जो हर पल मुझे अमीर कर जाता है
तुम दोनो का मुझसे घंटो बतियाना
और सवालों की झड़ी लगा देना
मुझे कैसे ऊर्जा से भर देता था
दिन भर की थकान
बस एक तुम्हारी मुस्कुराहट से
कम हो जाती थी
स्कूल का पूरे दिन का ब्योरा
बस एक ही साँस में
दे देते थे तुम दोनो
घंटों कहानियाँ सुनते थे मुझसे
और जब चिपक कर सोते थे मुझसे
तो मेरा चेहरा किस की तरफ़ होगा
इस बात पर बहस छिड़ जाती थी
अंशुम बहुत रोए थे तुम
जब तुम्हें कोट पैंट पहनाकर
पीछे पूँछ लगा कर स्कूल भेजा था
मैं भी क्या करती
जनवरी की कड़क सर्दी में भी भला कोई
बच्चे को हनुमान बनने को कहता है
ईशान जब एक दिन
मैं थक कर सो रही थी
और तुम्हारी मीठी आवाज़
जब मुझे नींद से ना जगा सकी
तो तुम कैसे घबरा कर बोले थे
लगता है मम्मी मर गई 😊
मैं तो सुन कर जी उठी थी उस पल
आज तुम दोनो बड़े हो गए
अब कोई झगड़ा नहीं इस बात पर
कि मेरे साथ कौन सोएगा
तुम्हारी लम्बी कहानियाँ
हाँ , हूँ में बदल गईं
पर सच कहूँ तो वो दिन बहुत अच्छे थे
काश कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन

अर्ध शतक

               अर्ध शतक 

इस बार का जन्मदिन कुछ ख़ास है 
ज़िंदगी का अर्ध शतक पूरा किया हैं मैंने 
पर इस बार ज़िंदगी को  देना होगा 
हर बीते पल का हिसाब 
कैसे कटे यह पचास साल 
कहीं बीते लमहों से कोई 
बेइंसाफ़ी तो नहीं की मैंने 

ज़िंदगी एक 
खुली किताब की तरह 
आँखों के सामने है 
हर सफ़े पर गढ़ें हैं 
कुछ रोते हँसते 
और 
मीठे कड़वे सच 

पलट कर देखती हूँ 
अपनी ग़लतियों को 
और ग्लानि से मुक्त होकर 
इन ग़लतियों को 
अनुभवों का नाम देती हूँ

अपनी छोटी छोटी उपलब्धियों पर
गर्व महसूस करती हूँ 
और कोशिश करती हूँ 
उस दूरी को नापने की 
जो आज तक मैंने तय की 

बहुत कुछ पाया और गँवाया 
बहुत कुछ सीखा और सिखाया 
बहुत कुछ नकारा और अपनाया 
और यूँही जीवन के कई वर्ष 
हाथ से रेत की तरह फिसल गए 

पलों को बाँध पाना उतना ही कठिन है 
जैसे रेत को मुट्ठी में समेटना 
बस इतना चाहती थी कि 
हर  बीतता लम्हा
पवित्र ओस की बूँद की तरह 
जीवन कमल के पत्ते पर चमचमाए 
नाकि दुखों के कीचड़ से मिल कर 
अपनी ख़ूबसूरती और अस्तित्व खो दे 
और ऐसा ही हुआ 

ज़िंदगी की लहरें 
जाने कितने ज्वार भाटे झेल गईं 
और मिट कर बार बार फिर बनी 
लहरों का सफ़र अब भी जारी है 
और अंतिम क्षणों तक चलता रहेगा 
हर बार किनारा दूर होगा 
और हर बार मैं उछल कर 
उस किनारे को छू लूँगी 
क्यूँकि हर लहर चाहे 
जितने हिचकोले खाए 
किनारा तो पा ही लेती है 
और एक दिन पहुँच जाती है 


अपने मुक़ाम तक 

Thursday, 5 July 2018

अलग किरदार पर एक तासीर





अलग किरदार पर एक तासीर 

तुम्ही कहो ना कैसा होता बचपन 
अगर इसमें नानी और दादी की 
कहानी ना होती 
क्या यूंही मज़े से बीतती ज़िन्दगी 
अगर माँ की गोद में चढ़ कर 
हर अच्छी और बुरी बात 
जानी ना होती 


सच कहती हूँ 
बढ़ने में  भला क्या लुत्फ़ आता 
अगर  बहनों की कुछ बातें नकारी 
और कुछ मानी ना होती 
बूढ़ी सी हो जाती ज़िंदगानी 
अगर इसमें सखियों ने 
राज़ की कुछ बातें 
जानी ना होतीं

कैसा होता ससुराल में वो पहला दिन
अगर सास ने माँ बनकर
कलाई थामी ना होती
 कैसे ढाल पाती खुद को  नए घर में
अगर ससुराल में बहनों सी
ननद ,देवरानी और जेठानी ना होती


घर में घर वाली बात ना होती शायद
अगर इसमें बेटी की
कुछ शैतानी ना होती
कौन संभालता वंश की परंपरा को
अगर बहू घर की लक्ष्मी और रानी ना होती
रिश्तों की दास्तान  अधूरी  सी होती शायद
अगर परिवार में
ताई ,चाची ,बुआ ,मौसी ,मामी ना होती


श्रद्धा से सिर  झुक जाता है उसके सजदे में
जिसने औरत को बनाया
और दी इतने सारे किरदारों को
निभाने की अपार  क्षमता


किरदार भले ही कोई हो हमारा
पर हमारी तासीर तो एक ही है
फिर क्यों रिश्तों में बाँटें
इस मानवता के बंधन को
क्या एक औरत को समझने के लिए
एक औरत ही होना काफी नहीं


चलो थाम लें दामन
और एक ऐसी दुनिया बनायें 
जिसमें एक दूसरे को
नीचे खींचने  की जगह
थोड़ा ऊपर उठाएं
और हर बढ़ते कदम के साथ
जो चौखट के उस पार अकेली है
उसे अपना बनाएं









  





Wednesday, 4 July 2018

तुम्हे बेचती हूँ

तुम्हे बेचती हूँ
तुमसे मिलने लोग 
जाने कहाँ कहॉ जाते है
तुम्हें मंदिर में सजाते हैं
छप्पन भोग खिलाते हैं
माँगते है दुआएँ 
और
दान दक्षिणा चढ़ाते हैं
पर मैं तुम्हें टोकरी में भर कर
रोज़ बाज़ार में बेचती हूँ
मोल भाव करते है तुम्हारा
तुम्हें मंदिर में बिठाने वाले
माफ़ करना कई बार तुम्हारा दाम
पचास पैसे और गिरा देती हूँ
 तुम तो जानते ही हो
कि हर रोज़
 तुम्हें बाज़ार में बेच कर
मेरा पेट पलता 
 

उस पार

 उस पार · 
जानती हूँ मैं कि
समय की बाड के उस पार
तुम रहते हो

तभी तो तुम्हारे इन्तज़ार में
अपना सभी सामान समेटे
मैं बैठी हू इस पार

कौन जाने तुम कब आकर
हाथ थाम लो

इन गठरियों में मेरी कमाई है
कुछ करम और संस्कार
जो साथ जाने हैं

पीछे छूट जाएँगे
खट्टी मीठी यादों के
कुछ चहचहाते पंछी

और मै टूटकर
कल फिर जीवन वृक्ष पर उभरूँगी
नव पल्लव की तरह

कोख

कोख


कितनी तरह के विचार बहते हैं
तुम्हारी कोख में

कहीं उजले विचारों की गंगा 
मुझे महकाती है
तो कहीं शक्ति से भरे विचारों का
लाल सरोवर
मेरे मन की प्यास बुझाता है

पर यहीं कहीं बहता है
काले भय से भरे विचारों का नाला
जो मुझे डराता है
और कमज़ोर बनाता है

मै तो अभी बारिश की पहली बूँद सा
अनछुआ और पावन हूँ
जिस रंग में मिल गया
वैसा ही हो जाऊँगा

माँ बस तुम इस काले पानी का रूख
परमात्मा की ओर मोड़ दो
मेरा घर भर जाए
प्रेम और शक्ति के सागर से
और मै उसमें तैर कर
तुम्हारी गोद में समा जाऊँ

धूप और छांव


धूप और छांव 

धूप और छांव का खेल तो 
जीवन में चलता ही रहता है 
साया भी कभी साथ होता है 
तो कभी साथ छोड़ देता है 
पर हिम्मत और 
कुछ कर गुज़रने की तमन्ना
मंज़िल के क़रीब खींचती है
और क़दम रोके नहीं रुकते 

चाहत

चाहत 

गर दामन में 
सितारों की चाहत हो तो 
नज़रें आकाश से मिलानी होंगी 
क़तरा क़तरा होकर 
पिघलेंगे सितारे भी 
चाहत की गरमी से
और तुम्हारा अस्तित्व
अपनी चमक से
रोशन कर देंगे

बेड़ियाँ या फिर पंख

बेड़ियाँ या फिर पंख

आप अपनी बेटी को 
पाँव में अलता लगा कर 
झाँझर पहनाएँ
और पिया के घर भेजें

या फिर स्कूल के जूते पहनाकर
सुखद भविष्य की और क़दम बढ़ाने दें
पसंद आप ही की है
और फ़ैसला भी आप का

पर किसी भी नतीजे पर पहुँचने से पहले
अपने दिल से पूछ लें कि
आप आपके कलेजे के टुकड़े को
तोहफ़े में क्या पसंद आएगा ?
बेड़ियाँ ... जो उसके अस्तित्व को
पनपने से रोक दें
या फिर
पंख... जो उसकी उड़ान को
एक मुक़ाम तक ले जाएँ 

नज़र और नज़रिया

नज़र और नज़रिया

आँखों देखी हर बार सच हो यह ज़रूरी नहीं 
यह तुम्हारी आँखों का भ्रम भी हो सकता है 
नज़र हर ख़ूबसूरत चीज़ को चाहती है 
पर नज़रिया हर चीज़ को ख़ूबसूरत बनाता है 

बीता वक़्त


बीता वक़्त 

बीते वक़्त में झाँकना भी
 अपने आप में एक कला है 
अगर पलट कर देखना है 
बीते वक़्त को 
तो अदा से देखो
जान जाओगे कि
जो मेहंदी आज रंग लायी है जीवन में
उसका पिसना ज़रूरी था
जो फूल आज महकते है बगिया में
वो काँटों के बिना नहीं मिलते शायद
और गर इस भेद को समझ लिया
तो हर बीता कठिन लम्हा ही
तुम्हारे आज मुस्कुराने की
वजह बन जाएगा 

जीवन यात्रा का घड़ा

जीवन यात्रा का घड़ा 


जीवन यात्रा का घड़ा 
हम सब 
अपनी सोच के मुताबिक़ उठाती  हैं 

कोई सिर  माथे लेती है जीवन की चुनौतियों  को
और ईश्वर का वरदान समझ कर ग्रहण करती है

कोई जिम्मेदारी समझ  कर काँधे पर संभालती  हैं
और अंत तक इसका साथ निभाती है 

तो कोई
इस यात्रा में आने वाली चुनौतियों  को 
एक बच्चे की तरह बाहों में भरती है
और प्यार से सँवार कर
उनसे पार पा लेती है

हम सबका नज़रिया ही हमें
एक दूसरे से ना सिर्फ़
एक होते हुए अलग बनाता  है
बल्कि
अलग अलग रास्तों से
अपनी मंज़िल तक पहुँचाता है

Tuesday, 3 July 2018

परछाई

परछाई

आस -पास  नज़र आती हर औरत
मेरी ही परछाई है
कुछ तो है
जो एक -सा है हममें


आँखों की प्यास वही है
दिल में  धड़कते जज़्बात वही हैं
टूट कर बिखरना
और बिखर कर जुड़ना वही है


रिश्तों की डोरियाँ एक-सी
जीने का एहसास वही है
माँ की ममता वही
और बहन का प्यार वही है


बेटी की शरारत एक-सी
पत्नी का श्रृंगार वही है
फिर अपनी ही परछाई से
ईर्ष्या और नफरत कैसी


बस कहने की बात है कि
अंधेरे में साया भी साथ छोड़ देता है
साया तो मुझ में ही क़ैद होता है
देर तो अंधेरे से उजाले में
जाने भर की है


आओ दूर करें
इस जलन के अंधेरे को
सब मिल कर चमक उठें
और जान लें कि
एक दूसरे को उठाने में
कैसा आनंद है












Tuesday, 20 June 2017

घरौंदा विपिन उर्वशी का

   घरौंदा विपिन उर्वशी का

मकान तो सब बना लेते हैं
या फिर विरासत में पा लेते हैं
पर घर तो किसी
किस्मत वाले का बनता है
घर की नीँव धन से नहीं
मन से बनती है
और आज ऐसे ही एक घर में
आप सबका स्वागत है
यह भवन सीमेंट के स्तंभों पर नहीं
टिका है उर्वशी और विपिन की उम्मीदों पर
गौर से देखिए यह ऊँची दीवारें
जो बनी  हैं साहिबा और साहिल के सपनों से
इन दीवारों की सिचाईं में खपा है
ढेर सारा खून पसीना
कड़ी मेहनत की खुशबू
इस घर के हर कोने से आती है
आनंद की रंगोली से सजा है प्रवेश द्धार
और प्रेम का वंदनवार उसकी शान बढ़ाता है
इस घर में आने वाला हर मेहमान
सम्मान और आदर सत्कार का स्वाद चखता है
ये संगमरमरी फर्श जोड़ता है
घर के हर सदस्य को उसकी मिट्टी  से 
और अर्श को छूती  छत पर
चमकते हैं भविष्य के सुनहरे सपने
बड़ी खिड़कियों से बह कर आती हैं 
ढेर सारी दुआएं और शुभ कामनाएं
रसोईघर में पवित्रता का प्रसाद पकता है
जो आत्मा को शान्ति  से भर देता है
इस घर पर ईश्वर की रेहमत बरसती है
और सर्वगुणों का इन्द्रधनुष
इस घर की छठा में चार चाँद लगता है
भला कौन ऐसे घर में नहीं आना चाहेगा
जिसमें पाँव रखते ही
किसी मंदिर में
प्रवेश करने का एहसास हो
मेरी दिल से दुआ है कि
आप दिन दुगनी और रात चौगुनी तरक्की करें
आपके खवाब सदा ऊंचे
और पैर ज़मीन पर रहें
आपको यहाँ वो सब खुशियाँ नसीब हों
जिनकी कभी आपने आरज़ू की थी
और
आपका यह घरौंदा सदा चेहकता रहे

सिम्मी मदन मैनी 










Monday, 1 May 2017

बेबी बुआ

     बेबी बुआ
 खोज में हैं नज़रें
किसी ऐसी शै को
जो आपके सजदे में रख सकूँ
पर इस पूरी कायनात में
कोई ऐसी चीज़ कहाँ
जो आपकी बराबरी कर सके
तो क्यों ना तोहफे में
अपने दिल के जज़्बात बयां करूँ

भाभी ,बाउजी ने
अपने घर की देहलीज़ पर
सात दिए जलाए
पर उनमें रोशनी की किरण
तब फूटी
जब बेबी बुआ घर में आई
सब भाईयों की लाड़ली
और भाभी ,बाउजी के दिल की धड़कन
छोटी बेबी को खुदा ने
शिक्षा ,संवेदना ,सहनशीलता
और तन ,मन की ख़ूबसूरती से नवाज़ा

परी  सी  बेबी बुआ जब
एक अनजान सफर पर निकली
तो परिस्थितियों की कड़ी धूप से
अनजान थी
पर हिम्मत और शुभ संस्कारों की विरासत
उनका रास्ता आसान करती चली गई


आपने न सिर्फ अपने घर में
बल्कि दूसरों के दिलों में भी
प्रेम और शिक्षा के ऐसे दिए जलाए
की हर ज़र्रा आप पर फ़िदा हो गया
और ईश्वर ने
 आपकी  तकलीफ के  हर कॉँटे को
उपलब्धी के फूल में तबदील कर दिया

आज हम सब की ओर  से
बस यही दुआ है कि
परमात्मा आपकी हर मनोकामना पूरी करे
और गर्म हवा का झोंका
कभी आपको ना छूने पाए
पूरे परिवार की छाया आपके सर पर बनी  रहे
और आप हर वर्ष यूँ ही हँसते खेलते
अपना जन्म  दिल मनाती  रहे 

सिम्मी मदन मैनी