अर्ध शतक
ज़िंदगी का अर्ध शतक पूरा किया हैं मैंने
पर इस बार ज़िंदगी को देना होगा
हर बीते पल का हिसाब
कैसे कटे यह पचास साल
कहीं बीते लमहों से कोई
बेइंसाफ़ी तो नहीं की मैंने
ज़िंदगी एक
खुली किताब की तरह
आँखों के सामने है
हर सफ़े पर गढ़ें हैं
कुछ रोते हँसते
और
मीठे कड़वे सच
पलट कर देखती हूँ
अपनी ग़लतियों को
और ग्लानि से मुक्त होकर
इन ग़लतियों को
अनुभवों का नाम देती हूँ
अपनी छोटी छोटी उपलब्धियों पर
गर्व महसूस करती हूँ
और कोशिश करती हूँ
उस दूरी को नापने की
जो आज तक मैंने तय की
बहुत कुछ पाया और गँवाया
बहुत कुछ सीखा और सिखाया
बहुत कुछ नकारा और अपनाया
और यूँही जीवन के कई वर्ष
हाथ से रेत की तरह फिसल गए
पलों को बाँध पाना उतना ही कठिन है
जैसे रेत को मुट्ठी में समेटना
बस इतना चाहती थी कि
हर बीतता लम्हा
पवित्र ओस की बूँद की तरह
जीवन कमल के पत्ते पर चमचमाए
नाकि दुखों के कीचड़ से मिल कर
अपनी ख़ूबसूरती और अस्तित्व खो दे
और ऐसा ही हुआ
ज़िंदगी की लहरें
जाने कितने ज्वार भाटे झेल गईं
और मिट कर बार बार फिर बनी
लहरों का सफ़र अब भी जारी है
और अंतिम क्षणों तक चलता रहेगा
हर बार किनारा दूर होगा
और हर बार मैं उछल कर
उस किनारे को छू लूँगी
क्यूँकि हर लहर चाहे
जितने हिचकोले खाए
किनारा तो पा ही लेती है
और एक दिन पहुँच जाती है
अपने मुक़ाम तक
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