Monday, 30 July 2018

अर्ध शतक

               अर्ध शतक 

इस बार का जन्मदिन कुछ ख़ास है 
ज़िंदगी का अर्ध शतक पूरा किया हैं मैंने 
पर इस बार ज़िंदगी को  देना होगा 
हर बीते पल का हिसाब 
कैसे कटे यह पचास साल 
कहीं बीते लमहों से कोई 
बेइंसाफ़ी तो नहीं की मैंने 

ज़िंदगी एक 
खुली किताब की तरह 
आँखों के सामने है 
हर सफ़े पर गढ़ें हैं 
कुछ रोते हँसते 
और 
मीठे कड़वे सच 

पलट कर देखती हूँ 
अपनी ग़लतियों को 
और ग्लानि से मुक्त होकर 
इन ग़लतियों को 
अनुभवों का नाम देती हूँ

अपनी छोटी छोटी उपलब्धियों पर
गर्व महसूस करती हूँ 
और कोशिश करती हूँ 
उस दूरी को नापने की 
जो आज तक मैंने तय की 

बहुत कुछ पाया और गँवाया 
बहुत कुछ सीखा और सिखाया 
बहुत कुछ नकारा और अपनाया 
और यूँही जीवन के कई वर्ष 
हाथ से रेत की तरह फिसल गए 

पलों को बाँध पाना उतना ही कठिन है 
जैसे रेत को मुट्ठी में समेटना 
बस इतना चाहती थी कि 
हर  बीतता लम्हा
पवित्र ओस की बूँद की तरह 
जीवन कमल के पत्ते पर चमचमाए 
नाकि दुखों के कीचड़ से मिल कर 
अपनी ख़ूबसूरती और अस्तित्व खो दे 
और ऐसा ही हुआ 

ज़िंदगी की लहरें 
जाने कितने ज्वार भाटे झेल गईं 
और मिट कर बार बार फिर बनी 
लहरों का सफ़र अब भी जारी है 
और अंतिम क्षणों तक चलता रहेगा 
हर बार किनारा दूर होगा 
और हर बार मैं उछल कर 
उस किनारे को छू लूँगी 
क्यूँकि हर लहर चाहे 
जितने हिचकोले खाए 
किनारा तो पा ही लेती है 
और एक दिन पहुँच जाती है 


अपने मुक़ाम तक 

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