Tuesday, 3 July 2018

परछाई

परछाई

आस -पास  नज़र आती हर औरत
मेरी ही परछाई है
कुछ तो है
जो एक -सा है हममें


आँखों की प्यास वही है
दिल में  धड़कते जज़्बात वही हैं
टूट कर बिखरना
और बिखर कर जुड़ना वही है


रिश्तों की डोरियाँ एक-सी
जीने का एहसास वही है
माँ की ममता वही
और बहन का प्यार वही है


बेटी की शरारत एक-सी
पत्नी का श्रृंगार वही है
फिर अपनी ही परछाई से
ईर्ष्या और नफरत कैसी


बस कहने की बात है कि
अंधेरे में साया भी साथ छोड़ देता है
साया तो मुझ में ही क़ैद होता है
देर तो अंधेरे से उजाले में
जाने भर की है


आओ दूर करें
इस जलन के अंधेरे को
सब मिल कर चमक उठें
और जान लें कि
एक दूसरे को उठाने में
कैसा आनंद है












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