Monday, 30 July 2018

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन ....







  
कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन ....

यादों जे पिटारे को ज्यूँ ही खोला
कई मासूम और प्यारी समृतियाँ
मचल कर झोली में आ गिरी 
मैं उन्हें झटपट बटोरने लगी
कि कहीं कोई मेरे दामन से छूट ना जाए
यहीं तो मेरे जीवन के सबसे क़ीमती पल हैं
जिन्हें वक़्त की माला में पिरो के रखा है
तुम्हारा बचपन वो ख़ज़ाना है
जो हर पल मुझे अमीर कर जाता है
तुम दोनो का मुझसे घंटो बतियाना
और सवालों की झड़ी लगा देना
मुझे कैसे ऊर्जा से भर देता था
दिन भर की थकान
बस एक तुम्हारी मुस्कुराहट से
कम हो जाती थी
स्कूल का पूरे दिन का ब्योरा
बस एक ही साँस में
दे देते थे तुम दोनो
घंटों कहानियाँ सुनते थे मुझसे
और जब चिपक कर सोते थे मुझसे
तो मेरा चेहरा किस की तरफ़ होगा
इस बात पर बहस छिड़ जाती थी
अंशुम बहुत रोए थे तुम
जब तुम्हें कोट पैंट पहनाकर
पीछे पूँछ लगा कर स्कूल भेजा था
मैं भी क्या करती
जनवरी की कड़क सर्दी में भी भला कोई
बच्चे को हनुमान बनने को कहता है
ईशान जब एक दिन
मैं थक कर सो रही थी
और तुम्हारी मीठी आवाज़
जब मुझे नींद से ना जगा सकी
तो तुम कैसे घबरा कर बोले थे
लगता है मम्मी मर गई 😊
मैं तो सुन कर जी उठी थी उस पल
आज तुम दोनो बड़े हो गए
अब कोई झगड़ा नहीं इस बात पर
कि मेरे साथ कौन सोएगा
तुम्हारी लम्बी कहानियाँ
हाँ , हूँ में बदल गईं
पर सच कहूँ तो वो दिन बहुत अच्छे थे
काश कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन

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