Wednesday, 4 July 2018

तुम्हे बेचती हूँ

तुम्हे बेचती हूँ
तुमसे मिलने लोग 
जाने कहाँ कहॉ जाते है
तुम्हें मंदिर में सजाते हैं
छप्पन भोग खिलाते हैं
माँगते है दुआएँ 
और
दान दक्षिणा चढ़ाते हैं
पर मैं तुम्हें टोकरी में भर कर
रोज़ बाज़ार में बेचती हूँ
मोल भाव करते है तुम्हारा
तुम्हें मंदिर में बिठाने वाले
माफ़ करना कई बार तुम्हारा दाम
पचास पैसे और गिरा देती हूँ
 तुम तो जानते ही हो
कि हर रोज़
 तुम्हें बाज़ार में बेच कर
मेरा पेट पलता 
 

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