जानती हूँ मैं कि
समय की बाड के उस पार
तुम रहते हो
तभी तो तुम्हारे इन्तज़ार में
अपना सभी सामान समेटे
मैं बैठी हू इस पार
कौन जाने तुम कब आकर
हाथ थाम लो
इन गठरियों में मेरी कमाई है
कुछ करम और संस्कार
जो साथ जाने हैं
पीछे छूट जाएँगे
खट्टी मीठी यादों के
कुछ चहचहाते पंछी
और मै टूटकर
कल फिर जीवन वृक्ष पर उभरूँगी
नव पल्लव की तरह
समय की बाड के उस पार
तुम रहते हो
तभी तो तुम्हारे इन्तज़ार में
अपना सभी सामान समेटे
मैं बैठी हू इस पार
कौन जाने तुम कब आकर
हाथ थाम लो
इन गठरियों में मेरी कमाई है
कुछ करम और संस्कार
जो साथ जाने हैं
पीछे छूट जाएँगे
खट्टी मीठी यादों के
कुछ चहचहाते पंछी
और मै टूटकर
कल फिर जीवन वृक्ष पर उभरूँगी
नव पल्लव की तरह
No comments:
Post a Comment