Thursday, 27 February 2020

           थोड़ा और चल लूँ 


सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा

बस इतना हो जाये
फिर नहीं कमायूँगा
पर जाने क्यों ?
इतना कभी पूरा होता ही नहीं
चाहतों वाला हिस्सा कभी सोता ही नहीं
अच्छा घर और सैटल्ड  बच्चे
अभी आरज़ू है मेरी
तभी तो करता हूँ  काम
उसमें नहीं होने देता की देरी
आरज़ू पूरी करनी कितनी मुश्किल है
किस किस को समझायूँगा
सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा


कोशिश सेहतमंद होने की
काम के साथ साथ चलती है
लेखिन दिल्ली की ज़हरीली हवा में भला
बिमारियाँ कब टलती  हैं
कभी इस सीमेंट के जंगल के बाहर
एक छोटा आशियाँ  बनायूँगा
सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा


चाहत अभी मन में अंगड़ाई लेती है
अपनों के लिए कुछ खास  करने की
एक दिन इन सबको वर्ल्ड टूर कराऊंगा
सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा


औसत 25000 दिनों की ज़िंदगी से
18000 दिन यूँही निकल गए
बचे हुए इन 7000 दिनों में
जाने क्या कर पायूँगा
सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा


जानता हूँ मन की शांति ही
असल मंज़िल है मेरी
शिवानी ,सद्गुरु ,बुद्धा में
तभी तो आस्था  है मेरी
खुद से पूछता हूँ
क्या में भी कभी
इन सा हो पायूँगा
सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा


जन्म ,परिवार, रिश्तेदारी और रुतबे में कुदरत
तूने सिर्फ अपनी चलाई
मैंने काठ जोड़ कर तेरा हुकम माना
सोचा इसी में होगी भलाई
पर इस अदद ज़िंदगी का एक हिस्सा
मैं अपने हिसाब से चलायूँगा
सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ
फिर में रुक जायूँगा


जाने कैसे कहते हैं ?
 कि  वो अपनी ज़िंदगी अच्छी जी गया
कौन जाने चाहतों का कौन सा हिस्सा वो
मन ही मन में पी  गया
कहीं मैं  अपनी चाहत वाली ज़िंदगी जीने से पहले
तो नहीं मर जायूँगा


सोचता हूँ , थोड़ा और चल लूँ 
फिर में रुक जायूँगा 

नीरज चैकर
27 . 02 . 2020 























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