ध्यान
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हर दर पर जाकर
अपने प्रश्नों के उत्तर ढूँढे
और हर दर से ख़ाली लौटी हूँ
पल भर को शांती से बैठ
अंतर में उठते इस शोर को
सुनने लगती हूँ
तो जान जाती हूँ कि
विचारों की इस तेज़ आंधी मेँ ही
छिपा है सत्य कहीं
संकल्पों के इस बवंडर के
मध्य में जाकर टिक जाती हूँ
ध्यान में बैठ
विचारों का मंथन करती और
इनकी रफ़्तार को कुछ धीमा करती हूँ
तो अपने हि अस्तित्व की परतों के
पार निकल जाती हूँ
जहाँ असीम शांती है
प्रेम है
और मानस पटल पर
उन सभी सवालोँ के जवाब
साफ़ साफ़ दिखाई देने लगते हैं
जिनकी मुझे कब से तलाश थी
सिम्मी मदन मैनी
02/05/2014
"
ReplyDeleteसुन्दर लेखन "
सम्मानित कवयित्री सिमी जी,
विचारों का मंथन करती और
इनकी रफ़्तार को कुछ धीमा करती हूँ
तो अपने हि अस्तित्व की परतों के
पार निकल जाती हूँ
जहाँ असीम शांती है
प्रेम है
और मानस पटल पर
उन सभी सवालोँ के जवाब
साफ़ साफ़ दिखाई देने लगते हैं
जिनकी मुझे कब से तलाश थी ॥ "