पिंजरा
हम पिंजरे के पंछी
अपना पिंजरा पाते हैं
सलाखें सोने की हों
या फिर पीतल की
जो पिंजरे में बंद हों
कैदी ही कहलाते हैं
इस शरीर मैं बंद
हम
झटपाटते हैं
फडफडाते हैं
पिंजरे में बंद पंछी
सिर्फ रोते हैं
वो बेचारे कहाँ
गा पाते हैं
यह क्षणभंगुर शरीर ही
अपना घर है
बस इसी भ्रम में
जीते जाते हैं
एक शाश्वत सत्य
कि....
पिंजरे कि चाबी उसके हाथ
और पिंजरे पर समय का ताला
समय आने पर खुलेगा ताला
और हम उड़ जायेंगे
अपने वतन
और फिर एक और नया पिंजरा
हमारे इंतजार में
जानते तो सब हैं हम
पर ना जाने क्यों?
इस पिंजरे के मोह में
फँसते जाते हैं
फँसते जाते हैं
सिम्मी मैनी

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