मेरी उपज ........
बिना मेरी इजाज़त के भला
कोई क्या देगा मुझे?
सामने वाला तो बस अपनी
दो बात कहता है
और अपने रास्ते चलता है
दर्द तो मेरी ही उपज है
जो मन में
धीरे धीरे पलता है
चुभन का बीज
बोती हूँ मन में
और माफ़ करने का
ढोंग भी करती हूँ
फिर अदृश्य आंसुओं से
सींचती हूँ
उस बीज को
और अब
नफरत की आग पर
अपमान की हांड़ी में
दर्द धीरे धीरे उबलता है
धधकता है
दर्द का ज्वालामुखी
दिल में
पर में फिर भी
मुस्कुराती हूँ
जब तक क्रोध का लावा
फैलता नहीं
आपको इस सच का
पता कहाँ चलता है
दर्द तो मेरी ही उपज है
जो मन में धीरे धीरे पलता है
शायद कमज़ोर हूँ मैं
और नासमझ भी
वरना
चुभन की जगह
माफ़ी का बीज बोती
आंसू छोड़
करती उस बीज पर
प्रेम फुहार
तो आज सच में
मुस्कुरा पाती
खिलखिला पाती
और दर्द की जगह
प्रेम गीत गा पाती
सिम्मी मैनी
No comments:
Post a Comment