कैसे गिरने दूंगा?
तुम भी ना
कुछ नहीं समझते
बस यूँ ही निकल पड़ते हो
और कागज़ पर बिछ जाते हो
इतना भी नहीं देखते
तुम मेरा मान संभाले हो
अपने हाथों में
गर टकरा गये किसी से
और धूल में गिर पड़ा वो
तो मेरा क्या होगा?
कभी सोचा है?
देखो मैं तुम्हारा अनुभव हूँ
तुम्हारा अंश हूँ
इसलिए
ना तो झूठा हूँ
और ना ही कायर
मैं विचलित होकर बोल उठी
थोड़ी चालाकी से तो चुन सकते हो
शब्दों को
और कुछ बातें बना कर भी तो
कह सकते हो
तुम देखते ही नहीं की
सब क्या सोचेंगे ?
पर मैं तुमसे अलग कहाँ हूँ
तुम्हारी परछाई हूँ
जब भी उतरूंगा लेखन के मैदान में
पूरी शान से उतरूंगा
ईमानदारी से नज़र मिलकर दौडूंगा
और गैरों के दिलों में भी घर कर जाऊँगा
भरोसा रखो खुद पर
तुम्हारा अनुभव हूँ मैं
भला तुम्हे कैसे गिरने दूंगा?
तुम्हे कैसे गिरने दूंगा?
सिम्मी मैनी
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